भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

३२ हर्षचरितम् पुलकित कर रहे थे। स्नान से पवित्र ब्रह्मा जी द्वारा पितरों के लिए लुढ़काए गए पिण्डों से उसका तट उज्ज्वल हो रहा था। पास में सोये सप्तर्षियों को कुश-शय्या से सूचित हो रहा था कि उन्होंने यहाँ सूर्यग्रहण के अशौच का उपवास किया है। आचमन से पवित्र होकर इन्द्र द्वारा भेंट किए गए पूजा के फूलों से वह विविध वर्ण वाली हो रही थी। शिवपुर से गिरी मंदारमाला को वह धारण कर रही थी। आयास के बिना ही उसने मन्दराचल की कन्दराओं के चट्टान तोड़ डाले थे। अनेक दिव्याङ्गनाओं के कुचकलशों से (आहत होकर) वह डोल रही थी। घड़ियालों और चट्टानों पर निपात होने से उसके प्रवाह मुखर हो उठते थे। सूर्य की अमृत-मय रश्मिसुषुम्णा के कण, जो चन्द्रमा से उत्पन्न होते हैं, मन्दाकिनी के तीर पर तारों की तरह बिछ गए थे। बृहस्पति के यज्ञ से उत्पन्न धुवाँ नदी की रेत को धुआँसा कर रहा था। सिद्धों द्वारा बनाए गए बालू के शिवलिंग का अकस्मात् लंघन हो जाने से उत्पन्न त्रास के कारण विद्याधर इधर-उधर छट- पटा रहे थे। मानों वह मंदाकिनी गगन-सर्प की उज्ज्वल लहराती हुई केंचुल हो, त्रिभुवन- रूपी विट (धूर्त) की लीला-ललाटिका (ललाट का अलंकार) हो, पुण्यरूप सौदे की बाजार-गली हो, नरक रूपी नगर के द्वार को बन्द करने वाली भागल (अर्गला) हो, सुमेरु पर्वत रूपी राजा की अंशुक नामक महीन वस्त्र की उष्णीष (पगड़ी) पर बंधी हुई लम्बी पाट हो, कैलास रूपी हाथी की रेशमी पताका हो, मोक्ष का मार्ग हो, सतयुग के रथ की धुरा हो। आकाश में उतरी हुई सरस्वती ने भगवान् पितामह के अपत्य हिरण्य- वाह नामक महानद को देखा जो वरुण देवता के हार के समान था, जो चन्द्र-पर्वत से झरता हुआ अमृत-निर्झर के समान था, जो विन्ध्य पर्वत से बहता हुआ चन्द्रकान्त मणि के प्रवाह के सदृश था, जो दण्डकारण्य के कर्पूर वृक्ष से बहते हुए कपूरी प्रवाह के समान था। दिशाओं के लावण्यरस का वह जैसे सोता था। मानों वह आकाश लक्ष्मी के शयन के लिए गढ़ा हुआ स्फटिक का शिलापट्ट (पाटा) हो। वह महानद स्वच्छ, शिशिर और सुरस (स्वादिष्ट) जल से भरा था, उसे लोग शोण भी कहते हैं। शोण को देख कर सरस्वती का हृदय उसकी रमणीयता में रम गया और उसने वहीं डेरा डाला। उसने सावित्री से कहा—'सखी, इस महानद के तटवर्ती कछार में मोर मधुर ध्वनि करते हैं। वृक्षों के नीचे फूलों की रज बालू की तरह ढेर हो जाती है। फूलों की गन्ध से मतवाले भौंरे वीणा के समान गुंजार कर रहे हैं। इसके सामने मन्दाकिनी भी कुछ नहीं। मेरा मन यहाँ रम रहा है, मेरा हृदय भी इसी स्थान में रहने के पक्ष में है।' सावित्री ने 'तथा' कह कर सरस्वती की बात का समर्थन किया। तब सरस्वती उसे लेकर उस महानद के पश्चिमी तीर पर उतरी। वहीं एक पवित्र शिलातल से युक्त लतामण्डप को घर मान कर ठहर गई। कुछ देर तक विश्राम करने के बाद उठी और सावित्री के साथ पूजा के फूल चुन कर स्नान किया। तब उसने नदी के किनारे रेत में बैठ कर बालू का शिवलिंग प्रतिष्ठित किया और पद्मब्रह्म की स्तुति के अनन्तर सम्यक् प्रकार से कई