भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 506 में से

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पृष्ठ 83

३८ हर्षचरितम् वह मनःशिला के पंकसदृश लाल-पीले अपने ललाट के लावण्य से सारे अन्तरिक्ष को लीप रहा था। वह नई जबानी के आरम्भ में गर्वीले और उद्धत दृष्टिपात करने बाली- अपनी आँखों से सारे संसार को तृण के बराबर समझ रहा था, ऐसी आँखों की दीर्घता से मानों वह कुमुद, कुवलय और कमल से भरे हुए हजारों सरोवरों से समस्त दिशाओं को ढकने वाली शरत् को प्रवर्तित कर रहा था। उसका नासावंश मानों दीर्घ नयनों की नदी के सीमान्त में बनाया गया पुल का बाँध हो, या उसके ललाट रूपी चन्द्रकान्तमणि के शिलातल से चू कर बहता हुआ कान्ति का प्रवाह हो, ऐसे वह अपने नासावंश से सुशो- भित था। सहकार, कर्पूर, कङ्कोल, लवङ्ग और पारिजातक इन पाँच सुगन्धित पदार्थों की गंध उसके मुख से निकल रही थी, उस पर मतवाले भौंरे गुंजार रहे थे, मानों वह चन्दन वन के सहित वहाँ वसन्त को उतार रहा था। वह जब कभी अपने पास के मित्रों के साथ परिहास की भावना से मुँह ऊँचा करके हँसता था तो समस्त दिशाएँ उसके दाँतों की चाँदनी में घुल जाती थीं और मानों वह आकाश में बार बार संचरण करने वाले चन्द्रा- त्पेोक का निर्माण कर रहा था। उसके कान में त्रिकंटक नाम का गहना था, जो कदम्ब के कुड्मल के समान दो स्थूल मोतियों के बीच में पन्ने का जड़ाव करके बनाया गया था, ऐसे त्रिकंटक की प्रभा फैल रही थी, मानों उस युवक ने फूल के सहित कुन्द के हरे पल्लवों को कर्णावतंस बना लिया हो। सुगन्धिन कस्तूरी के पंक की बनी हुई पत्ररेखाओं से उसके दोनों हाथ चमक रहे थे, मानों कामदेव की पताका के बड़े बड़े मकरों से आक्रान्त शिखर वाले दो डंडे हों। मानों समुद्रमथन से क्रुद्ध गंगा की धाराओं से जकड़े हुए मन्दराचल के समान श्वेत यज्ञोपवीत से वेष्टित शरीर को वह धारण कर रहा था। कर्पूर के चूर्ण की मूठों से धूसरित उसकी छाती कान्ता के ऊँचे स्तन रूपी चक्रवाक युगल के लिए चौड़ी रेतीली जमीन थी, ऐसी छाती से वह मानों अपनी स्थूल भुजाओं के आयाम में पुञ्जीभूत दिशाओं को फैला रहा था। हारीत पक्षी के समान नील वर्ण का कस कर बँधा हुआ अधोवस्त्र उसकी पतली कमर को विभाजित कर रहा था, सामने की ओर नाभि से कुछ नीचे उसका एक कोना बहुत अच्छा लग रहा था, उस अधोवस्त्र का कच्छ भाग पीछे की ओर पल्ला खोंसने के बाद भी कुछ ऊपर निकला रहता था। दोनों ओर शरीर के मोड़ने से दाहिनी जांघ का कुछ भाग दिखाई दे जाता था। वह अपने ऊरुदण्डों से ऐरावत की सूँड़ का मानों उपहास कर रहा था, दोनों जांघों का मांस हमेशा व्यायाम करते रहने से बढ़ गया था, वे ऐसी लगती थीं मानों कठिन और विकट मगर के मुख में फँस गई हों, वे चौड़ी छाती के चबूतरे को धारण करने के लिए शिलास्तम्भ थीं। चन्दन के सुन्दर थप्पे से उसकी जाँघों में कान्ति और भी निखर उठी थी। हद से ज्यादा उभरी हुई जाँघों के भार-वहन करने से खिन्न होकर मानों उसकी टाँगें पतली हो गई थीं। कल्पवृक्ष के दो पल्लवों के समान ललछहू रंग के दोनों ओर लटकते हुए पैरों के नखों की किरणें डोलती हुईं मानों घोड़ों का चामरमाला नामक अलंकार बना रही थीं।