भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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हर्च्यत् । 'अनिर्भरतोरूभारवहनेन' इति पाठः । ऊरू एव भारः । प्रशस्ता जङ्घा जङ्घाकाण्डम् । कल्पपादपसम्बन्धितया न केवलं लौहित्यं सौकुमार्याद्युच्यते । याव- =सकलसंपत्फलप्रदत्वादिप्रकर्षान्तरम् । अतिचिरमित्यादिनानाकुलत्वमुच्यते । यद्यु- कम्—'आवृताः कुञ्चिताः स्थूलदलपाल्यग्रसंस्थिताः । विवर्ज्याश्चाकुलपदन्यासेन गमनेन च ॥' इति । विकटं चित्रम् । सुरैरिति । तद्व्यापारवैचित्र्याद्बहुत्वमग्रिमयो- रेव । एवंविधसंनिवेशसंभवात् । खलीनं कविका । लालिका कविकाशेखरम् । आयानं हयमण्डनमाला । गोलाङ्गूलः कृष्णमुखो वानरः । नीलेत्यादौ कुमुदकुन्दमृणालगौर इत्यादिवन्न पौनरुक्त्यम् । महतीति । उक्तं च—'सर्वलक्षणहीनोऽपि महाकायः प्रशस्यते' इति । आसन्नेत्यनेन विश्वसनीयत्वमुक्तम् । अनङ्गयुगेति । अनङ्गजन्मना यदुपलक्षितं युगं कालविशेषस्तस्य नूतनमदनसादृश्यात् । यद्वा-अनङ्गयोर्युगं तद- वतारमिव । द्वित्वसंख्यापूर्वकत्वात् । चन्द्रमयीमिवेति कान्तिमयत्वेन । आकर्षणाञ्जनं वशीकरणार्थं कज्जलम् । अमृतलेपमिवेति । यस्यैनं प्राप्य कौतुकं न निवर्तते, नस्य संतोष एव नास्ति । केषांचिदेव द्रव्याणां संबन्धी यो न कदाचित्कार्ये व्यभि- चरति स सिद्धयोगः । सौभाग्यं तावत्सर्वं किंचन वशीकुरुते, एवं चास्य तदेव सिद्धयोग इव तदाश्रयेण निःशेषलोकवशीकरणक्षमत्वम् । जन्मदिवसमिति । तद्गो- चरपतितानां कामोत्पत्तेः । रसायनमिवेति । यथा रसायनवशात्कश्चित्परिपूर्णश्च स्थिरश्च भवति, तद्वदेतदाश्रयेण यौवनम् । ईषदसमाप्तोऽष्टादशवर्षोऽष्टादशवर्षदे- शीयस्तम् । न परेण संश्लिष्टस्तुरङ्गो यस्य तम् । दधीचस्य तु पर्याणश्लिष्टायुक्तम् । परिणतवयस्त्वेन सत्यवादिना सावित्रीसरस्वत्यौ प्रति च विस्रम्भकारित्वमुच्यते । अन्यथोपक्रम एव संभाषणमात्रं न प्रवर्तते । सरस्वती ने घोड़ों की उस टुकड़ी के बीच में अट्ठारह वर्ष के एक अश्वारोही युवक को देखा । अर्धचन्द्र से युक्त, मोतियों की मालाओं वाला, अनेक प्रकार के रत्नों से खचित, शंख और दूध के फेन की तरह उजला छत्र उस पर छाया कर रहा था, मानों लक्ष्मी को उसे स्वयं अर्पित करने के लिये क्षीरसमुद्र ही आकाश में लहरा रहा हो । आभूषणों की निर्मल किरणें इस तरह उसका पीछा कर रही थीं मानों उसके दर्शन के अनुराग से सारी दिशाएँ एकत्र होकर अनुसरण कर रही हों । मालती की शेखरस्रज उसके नितम्ब तक लटक रही थी, मानों वह समस्त भुवनों की विजय करने से प्राप्त रूप की पताका से बिरा- जमान हो । शिखण्ड-खण्डिका नामक उसके शिरोभूषण में जड़ी हुई पद्मराग मणि की लाल किरणें फैल रही थीं, मानों दृष्टिपथ में न आने वाली वनदेवता बाल पल्लवों द्वारा मार्ग की धूल से उसकी रूखर देह को झाड़ती हो । मौलसिरी के कुद्मलों से बनी हुई मुण्डमाला से मनोहर एवं घुँघराले बालों के गुच्छों से भरे हुए अपने सिर से दिन के आतप को मन्द करता हुआ वह मानों दिन को पी रहा था। उसका ललाट शिव के ललाट के मुकुटचन्द्र के दूसरे खण्ड से मानों बना हुआ था और उसमें स्वाभाविक शोभा थी, मानों