हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
हर्च्यत् । 'अनिर्भरतोरूभारवहनेन' इति पाठः । ऊरू एव भारः । प्रशस्ता जङ्घा जङ्घाकाण्डम् । कल्पपादपसम्बन्धितया न केवलं लौहित्यं सौकुमार्याद्युच्यते । याव- =सकलसंपत्फलप्रदत्वादिप्रकर्षान्तरम् । अतिचिरमित्यादिनानाकुलत्वमुच्यते । यद्यु- कम्—'आवृताः कुञ्चिताः स्थूलदलपाल्यग्रसंस्थिताः । विवर्ज्याश्चाकुलपदन्यासेन गमनेन च ॥' इति । विकटं चित्रम् । सुरैरिति । तद्व्यापारवैचित्र्याद्बहुत्वमग्रिमयो- रेव । एवंविधसंनिवेशसंभवात् । खलीनं कविका । लालिका कविकाशेखरम् । आयानं हयमण्डनमाला । गोलाङ्गूलः कृष्णमुखो वानरः । नीलेत्यादौ कुमुदकुन्दमृणालगौर इत्यादिवन्न पौनरुक्त्यम् । महतीति । उक्तं च—'सर्वलक्षणहीनोऽपि महाकायः प्रशस्यते' इति । आसन्नेत्यनेन विश्वसनीयत्वमुक्तम् । अनङ्गयुगेति । अनङ्गजन्मना यदुपलक्षितं युगं कालविशेषस्तस्य नूतनमदनसादृश्यात् । यद्वा-अनङ्गयोर्युगं तद- वतारमिव । द्वित्वसंख्यापूर्वकत्वात् । चन्द्रमयीमिवेति कान्तिमयत्वेन । आकर्षणाञ्जनं वशीकरणार्थं कज्जलम् । अमृतलेपमिवेति । यस्यैनं प्राप्य कौतुकं न निवर्तते, नस्य संतोष एव नास्ति । केषांचिदेव द्रव्याणां संबन्धी यो न कदाचित्कार्ये व्यभि- चरति स सिद्धयोगः । सौभाग्यं तावत्सर्वं किंचन वशीकुरुते, एवं चास्य तदेव सिद्धयोग इव तदाश्रयेण निःशेषलोकवशीकरणक्षमत्वम् । जन्मदिवसमिति । तद्गो- चरपतितानां कामोत्पत्तेः । रसायनमिवेति । यथा रसायनवशात्कश्चित्परिपूर्णश्च स्थिरश्च भवति, तद्वदेतदाश्रयेण यौवनम् । ईषदसमाप्तोऽष्टादशवर्षोऽष्टादशवर्षदे- शीयस्तम् । न परेण संश्लिष्टस्तुरङ्गो यस्य तम् । दधीचस्य तु पर्याणश्लिष्टायुक्तम् । परिणतवयस्त्वेन सत्यवादिना सावित्रीसरस्वत्यौ प्रति च विस्रम्भकारित्वमुच्यते । अन्यथोपक्रम एव संभाषणमात्रं न प्रवर्तते । सरस्वती ने घोड़ों की उस टुकड़ी के बीच में अट्ठारह वर्ष के एक अश्वारोही युवक को देखा । अर्धचन्द्र से युक्त, मोतियों की मालाओं वाला, अनेक प्रकार के रत्नों से खचित, शंख और दूध के फेन की तरह उजला छत्र उस पर छाया कर रहा था, मानों लक्ष्मी को उसे स्वयं अर्पित करने के लिये क्षीरसमुद्र ही आकाश में लहरा रहा हो । आभूषणों की निर्मल किरणें इस तरह उसका पीछा कर रही थीं मानों उसके दर्शन के अनुराग से सारी दिशाएँ एकत्र होकर अनुसरण कर रही हों । मालती की शेखरस्रज उसके नितम्ब तक लटक रही थी, मानों वह समस्त भुवनों की विजय करने से प्राप्त रूप की पताका से बिरा- जमान हो । शिखण्ड-खण्डिका नामक उसके शिरोभूषण में जड़ी हुई पद्मराग मणि की लाल किरणें फैल रही थीं, मानों दृष्टिपथ में न आने वाली वनदेवता बाल पल्लवों द्वारा मार्ग की धूल से उसकी रूखर देह को झाड़ती हो । मौलसिरी के कुद्मलों से बनी हुई मुण्डमाला से मनोहर एवं घुँघराले बालों के गुच्छों से भरे हुए अपने सिर से दिन के आतप को मन्द करता हुआ वह मानों दिन को पी रहा था। उसका ललाट शिव के ललाट के मुकुटचन्द्र के दूसरे खण्ड से मानों बना हुआ था और उसमें स्वाभाविक शोभा थी, मानों
३८ हर्षचरितम् वह मनःशिला के पंकसदृश लाल-पीले अपने ललाट के लावण्य से सारे अन्तरिक्ष को लीप रहा था। वह नई जबानी के आरम्भ में गर्वीले और उद्धत दृष्टिपात करने बाली- अपनी आँखों से सारे संसार को तृण के बराबर समझ रहा था, ऐसी आँखों की दीर्घता से मानों वह कुमुद, कुवलय और कमल से भरे हुए हजारों सरोवरों से समस्त दिशाओं को ढकने वाली शरत् को प्रवर्तित कर रहा था। उसका नासावंश मानों दीर्घ नयनों की नदी के सीमान्त में बनाया गया पुल का बाँध हो, या उसके ललाट रूपी चन्द्रकान्तमणि के शिलातल से चू कर बहता हुआ कान्ति का प्रवाह हो, ऐसे वह अपने नासावंश से सुशो- भित था। सहकार, कर्पूर, कङ्कोल, लवङ्ग और पारिजातक इन पाँच सुगन्धित पदार्थों की गंध उसके मुख से निकल रही थी, उस पर मतवाले भौंरे गुंजार रहे थे, मानों वह चन्दन वन के सहित वहाँ वसन्त को उतार रहा था। वह जब कभी अपने पास के मित्रों के साथ परिहास की भावना से मुँह ऊँचा करके हँसता था तो समस्त दिशाएँ उसके दाँतों की चाँदनी में घुल जाती थीं और मानों वह आकाश में बार बार संचरण करने वाले चन्द्रा- त्पेोक का निर्माण कर रहा था। उसके कान में त्रिकंटक नाम का गहना था, जो कदम्ब के कुड्मल के समान दो स्थूल मोतियों के बीच में पन्ने का जड़ाव करके बनाया गया था, ऐसे त्रिकंटक की प्रभा फैल रही थी, मानों उस युवक ने फूल के सहित कुन्द के हरे पल्लवों को कर्णावतंस बना लिया हो। सुगन्धिन कस्तूरी के पंक की बनी हुई पत्ररेखाओं से उसके दोनों हाथ चमक रहे थे, मानों कामदेव की पताका के बड़े बड़े मकरों से आक्रान्त शिखर वाले दो डंडे हों। मानों समुद्रमथन से क्रुद्ध गंगा की धाराओं से जकड़े हुए मन्दराचल के समान श्वेत यज्ञोपवीत से वेष्टित शरीर को वह धारण कर रहा था। कर्पूर के चूर्ण की मूठों से धूसरित उसकी छाती कान्ता के ऊँचे स्तन रूपी चक्रवाक युगल के लिए चौड़ी रेतीली जमीन थी, ऐसी छाती से वह मानों अपनी स्थूल भुजाओं के आयाम में पुञ्जीभूत दिशाओं को फैला रहा था। हारीत पक्षी के समान नील वर्ण का कस कर बँधा हुआ अधोवस्त्र उसकी पतली कमर को विभाजित कर रहा था, सामने की ओर नाभि से कुछ नीचे उसका एक कोना बहुत अच्छा लग रहा था, उस अधोवस्त्र का कच्छ भाग पीछे की ओर पल्ला खोंसने के बाद भी कुछ ऊपर निकला रहता था। दोनों ओर शरीर के मोड़ने से दाहिनी जांघ का कुछ भाग दिखाई दे जाता था। वह अपने ऊरुदण्डों से ऐरावत की सूँड़ का मानों उपहास कर रहा था, दोनों जांघों का मांस हमेशा व्यायाम करते रहने से बढ़ गया था, वे ऐसी लगती थीं मानों कठिन और विकट मगर के मुख में फँस गई हों, वे चौड़ी छाती के चबूतरे को धारण करने के लिए शिलास्तम्भ थीं। चन्दन के सुन्दर थप्पे से उसकी जाँघों में कान्ति और भी निखर उठी थी। हद से ज्यादा उभरी हुई जाँघों के भार-वहन करने से खिन्न होकर मानों उसकी टाँगें पतली हो गई थीं। कल्पवृक्ष के दो पल्लवों के समान ललछहू रंग के दोनों ओर लटकते हुए पैरों के नखों की किरणें डोलती हुईं मानों घोड़ों का चामरमाला नामक अलंकार बना रही थीं।
प्रथम उच्छ्वासः ३६ मन के समान वेग वाले, लंगूर के मुँह की तरह काले रोंगटे वाले, सिन्धुवार जैसे नीले, तगड़े घोड़े पर वह सवार था। वह घोड़ा अपने खुरों से जो सामने देर तक उठे रह जाते और विकट रूप में टेढ़े होकर गिरते, जमीन को कोड़ रहा था। वह काँटेदार लगाम को प्रतिक्षण अपने दाँतों से छोड़ता तो खड़-खड़ आवाज होती। घोड़े की नाक पर सामने की ओर लगाम का कमानीदार हिस्सा और माथे पर सोने का पदक झूल रहा था। आवाज करती हुई सुवर्ण की आयान नामक माला से वह घोड़ा सुशोभित हो रहा था। अपने अश्व के पलान का एक हाथ से सहारा लेकर उसके दोनों ओर दो आसन्न परिचारक चँवर झल रहे थे। आगे आगे जो बंदीजन सुभाषित पाठ कर रहे थे उसे सुन कर उसके मुख- चन्द्र के दोनों कपोलभाग रोमाञ्चित हो रहे थे मानों उसके कर्णोत्पल का पराग झर गया हो। मानों वह अनङ्ग युग का अवतार दिखला रहा था, सारी सृष्टि को चन्द्रमय बना रहा था, सारे प्राणिलोक को विलासमय कर रहा था, राग के राज्य का प्रवर्तन कर रहा था। मानों वह नेत्र का आकर्षणाञ्जन, मन का वशीकरणमंत्र, इन्द्रियों को विवश करने वाला चूर्ण, कुतूहल का असन्तोष, सौभाग्य का सिद्धियोग, कामदेव का पुनर्जन्मदिन, यौवन का रसायन, सौन्दर्य का एकच्छत्र राज्य, रूप का कीर्तिस्तम्भ, लावण्य का मूल कोश, संसार के सारे पुण्यकर्मों का परिणाम, कान्ति रूपी लता का पहला अंकुर, ब्रह्मा जी के सृष्टिनिर्माण के अभ्यास का फल-स्वरूप, विभ्रम का प्रताप और वैदग्ध्य का यशःप्रवाह था। पार्श्वे च तस्य द्वितीयमपरसंश्लिष्टतुरङ्गमं, प्रांशुमुत्तप्तपनीयस्तम्भा- कारम्, परिणतवयसमपि व्यायामकठिनकायम्, नीचनखश्मश्रुकेशम्, शुक्तिकखलतिम्, ईषत्तुन्दिलम्, रोमशोरःस्थलम्, अनुलब्णोदारवेष- तया जरामपि विनयमित्र शिक्षयन्तम्, गुणानपि गरिमाणमिवानयन्तम्, महानुभावतामपि शिष्यतामिवानयन्तम्, आचारस्याप्याचार्यकमिव कुर्वाणम्, वलक्षवारबाणधारिणम्, धौतदुकूलपट्टिकापरिवेष्टितमौलिं पुरुषम् । शुक्तिकखलतिं शुक्त्याकारखल्वाटम् । तुन्दिलं लम्बोदरम् । अत एवास्य विकु- क्षिरिति नाम । अनुलब्णोऽनुद्धतः । उदारः श्रेष्ठः । जरामिति । जरा किल सर्वं विनयं शिक्षयति । महानुभावता महाशयता । अनुभावयति कार्यमकार्यं वा बोध- यतीत्यनुभावः । शिष्यतामिति । परशासनदक्षकर्म महानुभावतया तत एवावसी- दत इत्युक्तं भवति । आचारः शास्त्रकारप्रदर्शिता विशिष्टा नीतिः । सच सर्वस्मि- न्नाचार्यकमवलम्बते । संस्कारातिशयमापादयतीत्यर्थः । वलक्षः शुक्लः । वारबाणः कञ्चुकः । मौलयः केशाः । उस नवयुवक के बगल में एक दूसरे पुरुष को देखा । वह भी घोड़े पर सवार था।
४० हर्षचरितम् उसकी कद लम्बी थी । उसकी आकृति तपे हुए सोने के खम्भे के समान थी । अवस्था अधेड़ होने पर भी उसका शरीर व्यायाम से गँठा हुआ था । उसके दाढ़ी, मूँछ और नाखून साफ-सुथरे कटे हुए थे । बाल झड़ जाने से बिलकुल सितुहे-जैसा लगता था । उसकी तोंद निकल आई थी । छाती में बाल जम गए थे, वेष सौम्य और श्रेष्ठ था, मानों वह अपनी वृद्धावस्था को भी विनय की सीख दे रहा था, गुणों में भी गौरव भर रहा था, महानुभावता को भी शिष्य बना रहा था, आचारों का भी आचार्य हो रहा था । वह उज्ज्वल कंचुक पहने हुए और धुली हुई दुकूलपट्टिका बाँधे हुए था । अथ स युवा पुरोयायिनां यथादर्शनं प्रतिनिवृत्यातिविस्मितम- नसां कथयतां पदातीनां सकाशादुपलभ्य दिव्याकृतितत्कन्यायुगल- मुपजातकुतूहलः प्रतूर्णतुरगो दिदृक्षुस्तं लतामण्डपोद्देशमाजगाम । दूरादेव च तुरगादवततार । निवारितपरिजनश्च तेन द्वितीयेन साधुना सह चरणाभ्यामेव सविनयमुपससर्प । कृतोपसंग्रहणौ तौ सावित्री समं सरस्वत्या किसलयासनदानादिना सकुसुमफलार्घ्यावसानेन वनवासोचिते- नातिथ्येन यथाक्रममुपजग्राह । आसीनयोश्च तयोरासीना नातिचिरमिव स्थित्वा तं द्वितीयं प्रवयसमुद्दिश्यावादीत्—‘आर्य, सहजलज्जाधनस्य प्रमदाजनस्य प्रथमाभिभाषणमशालीनता, विशेषतो वनमृगीमुग्धस्य कुलकुमारीजनस्य । केवलमियमालोकनकृतार्थाय चक्षुषे स्पृहयन्ती प्रेरयत्युदन्तश्रवणकुतूहलिनी श्रोत्रवृत्तिः । प्रथमदर्शने चोपायनमिवोपनयति सज्जनः प्रणयम् । अप्रगल्भमपि जनं प्रभवता प्रश्रयेणार्पितं मनोमध्विव वाचालयति । अयत्नेनैवातिनम्रे साधौ धनुषीव गुणः परां कोटिमारो- पयति विश्रम्भः । जनयन्ति च विस्मयमतिधीरधियामप्यदृष्टपूर्वा दृश्य- माना जगति स्रष्टुः सृष्ट्यतिशयाः । यतस्त्रिभुवनाभिभावि रूपमिदमस्य महानुभावस्य । सौजन्यपरतन्त्रा चेयं देवानांप्रियस्यातिभद्रता कारयति कथां न तु युवतिजनसहोत्था तरलता । तत्कथयागमनेनापुण्यभा- कतमो विजृम्भितविरहव्यथः शून्यतां नीतो देशः ? क वा गन्तव्यम् ? को वायमपहृतहरहुंकाराहंकारोऽपर इवानन्यजो युवा ? किंनाम्नो वा समृद्धतपसः पितुरयममृतवर्षी कौस्तुभमणिरिव हरेर्हृदयमाह्लादयति ? का चास्य त्रिभुवननमस्या विभातसंध्येव महतस्तेजसो जननी ? कानि वास्य पुण्यभाञ्जि भजन्त्यभिख्यामक्षराणि ? आर्यपरिज्ञानेऽप्ययमेव
क्रमः कौतुकानुरोधिनो हृदयस्य' इत्युक्तवत्यां तस्यां प्रकटितप्रश्रयोऽसौ प्रतिव्याजहार—'आयुष्मति, सतां हि प्रियंवदता कुलविद्या। न केवल- माननं हृदयमपि च ते चन्द्रमयमिव सुधाशीकरशीतलैराह्लादयति वचोभिः। सौजन्यजन्मभूमयो भूयसा शुभेन सज्जन्निर्माणशिल्पकला इव भवादृश्यो दृश्यन्ते। दूरे तावदन्योन्यस्याभिलपनमभिजातैः सह दृशोऽपि मिश्रीभूता महतीं भूमिमारोपयन्ति। श्रूयताम्—अयं खलु भूषणं भार्गववंशस्य भगवतो भूर्भुवःस्वस्त्रितयतिलकस्य, अदभ्रप्रभाव- स्तम्भितजम्भारिभुजस्तम्भस्य, सुरासुरमुकुटमणिशिलाशयनदुर्ललितपा- दपङ्केरुहस्य, निजतेजःप्रसरप्लुष्टपुलोम्नश्च्यवनस्य बहिर्वृत्तिजीवितं दधीचो नाम तनयः। जनन्यप्यस्य जितजगतोऽनेकपार्थिवसहस्रानुयातस्य शर्यातस्य सुता राजपुत्री त्रिभुवनकन्यरत्नं सुकन्या नाम। तां खलु देवीमन्तर्वत्नीं विदित्वा वैजनने मासि प्रसवाय पिता पत्युः पार्श्वात्स्व- गृहमनाययत। असूत च सा तत्र देवी दीर्घायुषमेनम्। अवर्धतानेहसा च तत्रैवायमानन्दितज्ञातिवर्गो बालस्तारकराज इव राजीवलोचनो राजगृहे। भर्तृभवनमागच्छन्त्यामपि दुहितरि नासेचनकदर्शनमिम- ममुञ्चन्मातामहो मनोविनोदनं नप्तारम्। अशिक्षतायं तत्रैव सर्वा विद्याः सकलाश्च कलाः। कालेन चोपारूढयौवनमिममालोक्याहमिवासावप्यनु- भवतु मुखकमलावलोकनानन्दमस्येति मातामहः कथंकथमप्येनं पितु- रन्तिकमधुना व्यसर्जयेत्। मामपि तस्यैव देवस्य सुगृहीतनाम्नः शर्या- तस्याज्ञाकारिणं विकुक्षिनामानं भृत्यपरमाणुमवधारयतु भवती। पितुः पादमूलमायान्तं मया साभिसारमकरोत्स्वामी। तद्धि नः कुलक्रमागतं राजकुलम्। उत्तमानां च चिरंतनता जनयत्यनुजीविन्यपि जने किय- न्मात्रमपि मन्दाक्षम्। अक्षीणः खलु दाक्षिण्यकोशो महताम्। इतश्च गव्यूतिमात्रमिव पारेशोणं तस्य भगवतश्च्यवनस्य स्वनाम्ना निर्मितव्यप- देशं च्यावनं नाम चैत्ररथकल्पं काननं निवासः। तदवधिरेवेयं नौ यात्रा। यदि च वो गृहीतक्षणं दाक्षिण्यमनवहेलं वा हृदयमस्माकमुपरि भूमिर्वा प्रसादानामयं जनः श्रवणार्हो वा, ततो न विमाननीयोऽयं नः प्रथमः प्रणयः कुतूहलस्य। वयमपि शुश्रूषवो वृत्तान्तमायुष्मत्योः। नेय- माकृतिर्दिव्यतां व्यभिचरति। गोत्रनामनी तु श्रोतुमभिलषति नौ
४२ हर्षचरितम् हृदयम् । तत्कथय कतमो वंशः स्पृहणीयतां जन्मना नीतः । का चेय- मत्रभवती भवत्याः समीपे समवाय इव विरोधिनां पदार्थानाम् । तथा हि, संनिहितबालान्धकारा भास्वन्मूर्तिश्च, पुण्डरीकमुखी हरिणलोचना च, बालातपप्रभाधारा कुमुदहासिनी च, कलहंसस्वना समुन्नतपयोधरा च, कमलकोमलकरा हिमगिरिशिलापृथुनितम्बा च, करभोरुर्विलम्बित- गमना च, अमुक्तकुमारभावा स्निग्धतारका च' इति । अथेति । नतु गतागतिकतया सर्वचेतनाभिप्रायेण सौन्दर्यमेतयोरभिव्यज्यते । प्रतिनिवृत्य न पुनः प्रसङ्गत उपेत्य । कन्यकात्वादेतन्नानुचितम् । प्रतूर्णी वेगगामी । साधुना विनीतेन । 'उपसंग्रहणं धीराः कथयन्त्यभिवादनम्' । आतिथ्यमेवोपज- ग्राहापूजयत् । 'प्रवयाः स्यात्परिणतः' । अशालीनता धृष्टता । वनशब्देन मृगोत्सा- मान्येऽपि जनसंपर्काच्चभावमाह । उपायनं ढौकनिका । उपनयति ढौकयति । प्रग- ल्भमित्यादि । मनःकर्तृ अप्रगल्भमपि जनं वाचालयति । कीदृशम् ? प्रभवता स्वामिना प्रश्रयेण प्रत्यर्पितं दत्तमैवंविधमस्मदीयं युष्मासु मन इति बहिः प्रकाशितं यश्च परतश्च केनापि प्रभावशीलेन ढौकितं मद्यप्रगल्भमपि जनं कुलयोषित्प्रायं वाचालयति किंचन जल्पयति । अत्रापि प्रश्रयेणेति साभिप्रायम् । तथा च—'अन्य- यान्यवनितागतचित्तं चित्तनाथमभिशङ्कितवत्या । पीतभूरिसुरयापि न मोदे निर्वृ- तिर्हि मनसो मदहेतोः ॥' इत्युक्तम् । नम्रे प्रह्वे, कुब्जे च । गुणो विनयादिः, ज्या च । कोटिः प्रकर्षः, धनुःशिखा च । 'देवानांप्रियस्येति पूजावचनम् । षष्ठ्या अलुक् । अत्रागमनेत्यादिना ब्रह्मोक्तशापबुद्ध्या दधीचस्य तद्भर्तृयोग्यतया कतम इति देशोत्कर्षकूलादिकं पृच्छति—कस्येति । देवस्य । सिद्धा देवाः । अनन्यजः कामः । महतस्तेजस ऽनि । महच्च तेजः सूर्याख्यम् । अभिख्या नाम । अयमेव क्रम इति । यथास्योत्पश्यादिकं तद्वद्भवतोऽपीत्यर्थः । कला उपायः । भूरिति रेफान्तो भूवाची । भुव इति रेफान्तः पातालवाची । भूश्च भुवश्च स्वश्च भूर्भुवःस्वः, एषां त्रयमिति समासः । अदभ्रोऽनल्पः । जम्भारिरिन्द्रः । स ह्यश्विभ्यां यज्ञभागभुजौ कुर्यावामिति चिरं प्रार्थितः । तथेति प्रतिपद्य ताभ्यां भागं दददिन्द्रेणोद्यतवज्रेण रोषितः । तत- स्तेनास्य सवज्रः स्तम्भितो भुज इति । दुर्ललितोऽलभ्यविषयः । प्लुष्टपुलोम्न इति । अनवरतं रुदत्यां दुहितरि कोपान्मात्रा गृहाणेमामिति पुलोम्नो राक्षसस्योक्तम् । ततस्तां प्रतिगृह्य तत्रैव स्थापयित्वा क्वापि गते रक्षसि सा भृगुणा विवाहिता । ततः सगर्भा सती पुलोम्नागत्यापह्रियमाणतया च्यवनं गर्भमत्याक्षीत् । तेन चान्वर्थ- नाम्ना तदृक्षो दृष्टैवादहत् । अन्तर्वत्नीं गर्भिणीम् । वैजनने मासि प्रसवमासे । दीर्घायुषमिति साभिप्रायम् । रूपकुलाद्युत्कर्षे वर्णिते सत्येतदेव वरगुणवर्णनमव- शिष्यते । अनेहसा परिपूर्णेन कालेन । 'न जायते यत्र तृप्तिस्तदासेचनकं विदुः' ।
प्रथम उच्छ्वासः ४३ नप्तारं पौत्रम् । साभिसारं ससहायम् । मन्दाक्षमुपरोधम् । गव्युतिः क्रोशद्वयम् । यात्रा प्रस्थानम् । गोत्रं वंशः । समवाय एकत्रस्थितिः । बालेषु केशेष्वन्धकारं तम इति यस्या बालं प्रत्यग्रम् । भास्वती मूर्तिमती, भास्वत आदित्यस्य च मूर्तिः । न कदाचित्सन्निहितबालान्धकारा भवतीति विरोधः । पुण्डरीकं पद्मम्, सिंहश्च यस्या मुखं तत्र कथं हरिणस्य लोचने स्त इति विरोधः । पयोधरौ स्तनौ, मेघाश्च पयोधराः । कलहंसानां स्वनो यस्यां सा । सरित्कथं प्रावृड् भवतीति विरोधः । करो हस्तः, रश्मिश्च । शिला वातवञ्जीभूतं हिमम् । यत्र च हिमगिरिशिलाभिः पृथुर्मध्यभागस्तत्र कथं पद्मकोमलकान्तिः । हिमस्पर्शं पद्मानाशात् । 'मणिबन्धादा- कनिष्ठं करस्य करभो बहिः' करभश्चोष्ट्रः । विलम्बितं सविलासम् , लम्बितश्च करभो यस्याः । करभोरुः कथं विगतकरभममनेति विरोधः । कुमारभावो बाल्यम्, कुमारे च भावो भक्तिः । स्निग्धो रम्यः, प्रतीतश्च । तारकाऽक्ष्णोः कनीनिका, दैत्यभेदश्च तारकः स्कन्देन यो हतः । उस युवक ने देखकर लौट हुए अग्रगामी पैदल सैनिकों से दिव्य आकृति वाली कन्या के विषय में सुनते ही कुतूहल से भर कर देखने के लिये उत्सुक हो घोड़े को ऐंड़ लगाई और शीघ्र उस लतामण्डप के समीप पहुँच गया । कुछ ही दूर पर घोड़े से उतर गया । अपने और साथियों को उसने वहीं रोक दिया, लेकिन उस सज्जन पार्श्वचर को साथ लेकर पैदल ही विनीत भाव से आया । सरस्वती के साथ सावित्री ने उन दोनों का अभिवादन किया और वनवास के योग्य फूल, फल एवं अर्घ्य आदि से उनका क्रम से आतिथ्य-सत्कार किया । दोनों पूर्ण रूप से स्थिर हुए तो वह स्वयं बैठी और कुछ ही देर ठहर कर उस दूसरे वृद्ध सज्जन से बोली—'आर्ये, सहजलज्जाशील नारियों का पहले पहल बोल बैठना बड़ी धृष्टता होती है, विशेष कर तो उनका जो वन्य मृगी की भाँति मुग्ध कुलकुमारियाँ हैं। आँखें तो देखकर कृतार्थ हो गईं, पर केवल कर्णेन्द्रिय की वृत्ति वृत्तान्त सुनने के लिए कुतूहल से प्रेरित कर रही है। प्रथम दर्शन में ही सज्जन व्यक्ति उपहार के रूप में प्रणय को समर्पित करता है। प्रभावशाली विनय से अर्पित किया हुआ मन मद्य के समान अधृष्ट जन को भी वाचाल बना देता है। अत्यन्त नम्र स्वभाव वाले सज्जन में बिना यत्न के ही विश्वास अधिक हो जाता है, जैसे धनुष के अग्रभाग तक उसका गुण बढ़ जाता है । पहले कभी नहीं देखे गए फिर देखे जाने वाले विधाता के उत्कृष्ट निर्माण अत्यन्त धीर लोगों में आश्चर्य को उत्पन्न कर देते हैं। बात यह है कि इन महानुभाव का रूप त्रिभुवन को अभिभूत कर देने वाला है। देवानांप्रिय की सौजन्य से भरी यह अतिभद्रता ही मुझे बोलने के लिए तत्पर कर रही है, युवतियों में स्वभावतः होने वाली चंचलता नहीं। तो कहिए इन्होंने किस पुण्यहीन देश को अपनी विरह- व्यथा के द्वारा सूना कर दिया है। ये कहाँ जायँगे ? ये मानों दूसरे कामदेव हैं जो शिव के हुंकारजनित अहंकार को न मानकर उत्पन्न हो गया है। कौन हैं ये ? बढ़ी हुई तपस्या
४४ हर्षचरितम् वाले किस पिता के अमृतवर्षी स्वभाव से ये हृदय को आह्लादित करते हैं जैसे कौस्तुभ- मणि विष्णु के हृदय को ? त्रिभुवन द्वारा नमन करने योग्य और महान् तेजस्वी को उत्पन्न करने वाली प्रभात की सन्ध्या के समान कौन इनकी जननी है ? कौन से पुण्य- वान् अक्षर इनके नाम में जुटते हैं ? आर्य के सम्बन्ध में जानने के लिए इस कुतूहल भरे हृदय के प्रश्न क्रमशः ये ही हैं।' सावित्री के इतना पूछने पर विनय प्रकट करते हुए पार्श्वचर ने उत्तर दिया—'आयुष्मती, प्रिय बोलना तो सज्जनों की कुलविद्या है। केवल तुम्हारा मुख ही नहीं, प्रत्युत हृदय भी चन्द्रमय है, क्योंकि वह अमृत के शीतल फुहारों के सदृश वचनों से आह्लादित कर रहा है। आपके सदृश लोग जो सौजन्य की जन्मभूमि हैं बड़े ही शुभकर्मों से मिलते हैं, क्योंकि वे सज्जनों के निर्माण की शिल्प- विद्या के स्वरूप हैं। ऐसे कुलीन लोगों के साथ परस्पर बातचीत करना तो दूर है इनके साथ आँखें ही मिलकर अलौकिक भूमि में पहुँचा देती हैं। तो सुनिए—यह भार्गववंश का कुलभूषण, महर्षि च्यवन का पुत्र दधीच है। इसके पिता भगवान् च्यवन पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग लोक में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपनी तपस्या के प्रभाव से इन्द्र की भुजशक्ति को भी स्तम्भित कर दिया है। उनके चरण-कमल सुर-असुरों की मुकुटमणियोँ से अभ्यर्चित हैं। अपने तेज से उन्होंने पुलोमा नामक दैत्य को भस्म कर डाला है। ऐसे पिता के पुत्र इस दधीच की जननी का नाम सुकन्या है जो जगद्विजयी सहस्रों नृपतियों से अनुगत शर्याति की सुता, राजपुत्री एवं त्रिभुवन की कन्याओं में रत्न के समान है। देवी सुकन्या को गर्भिणी जान उसके पिता दसवें महीने में प्रसव के लिए उसे पति के पास से अपने घर ले गए। वहीं उसने चिरंजीवी दधीच को उत्पन्न किया। राजा के घर में राजीवलोचन यह चन्द्रमा के समान बांधवों को आनन्दित करता हुआ समय के साथ बढ़ा। पुत्री सुकन्या अपने पति के घर आने लगी, तब भी नाना ने नेत्र के सुखद और मन बहलाने वाले नाती को नहीं छोड़ा। इसने ननिहाल में ही समस्त विद्याओं और कलाओं की शिक्षा प्राप्त की। समय से इसे जवान देख और 'मेरे समान इसके पिता भी इसके मुखकमल को देखकर आनन्द का अनुभव करें' यह सोच इसके नाना ने किसी-किसी प्रकार पिता के पास भेजा है। उन्हीं सुगृहीतनामा देव शर्याति का आज्ञाकारी विकुक्षि नामक एक तुच्छ भृत्य मुझे समझें। मेरे मालिक ने पिता के पास आते हुए इसके साथ मुझे लगा दिया। वह राजकुल मेरी वंशपरम्परा द्वारा सेवित है। सम्बन्ध के पुराने हो जाने पर उत्तम लोग अपने भृत्य के प्रति कुछ लज्जा का अनुभव करते हैं। महान् लोगों की उदारता का भण्डार कभी नहीं घटता। यहाँ से दो कोस आगे सोन पार भगवान् च्यवन का निवास च्यवनाश्रम है, जो चैत्ररथ नामक कुबेर के उद्यान के सदृश है। हम दोनों की यात्रा वहीं तक है। यदि आप दोनों का हमारे ऊपर क्षणिक सौजन्य है या हृदय में किसी प्रकार की अवज्ञा नहीं, या यह जन प्रसाद को प्राप्त करने योग्य है तो हमारे प्रणय का यह कुतूहल भी उपेक्षा के योग्य नहीं।
प्रथम उच्छ्वासः ४५ आप दोनों का वृत्तान्त हम सुनना चाहते हैं । तो कहिए—किस वंश को आपने जन्म लेकर स्पृहणीय बनाया ? आपके समीप यह कौन हैं जो बहुत से विरोधी पदार्थों के समवाय की भाँति लग रही हैं । जैसा कि इनके बाल अन्धकार के समान सन्निहित हैं, फिर भी सूर्य के समान इनकी मूर्ति देदीप्यमान है । पुण्डरीक ( व्याघ्र या श्वेत कमल ) के समान इनका मुख है ( फिर भी ) आँखें हरिण के समान हैं । उगते हुए सूर्य की प्रभा के समान इनका अधर है (फिर भी ) कुमुद के सदृश इनकी मुसकान है। मतवाले हंस के समान इनकी आवाज है ( फिर भी ) इनके पयोधर ( स्तन या मेघ ) उठे हुए हैं। कमल के समान कोमल इनके हाथ हैं ( फिर भी ) हिमालय की चट्टान के समान मोटे इनके नितम्ब हैं। ऊँट के समान इनकी दोनों जाँघ हैं ( फिर भी ) चाल धीमी चलती हैं। कुमारभाव ( बाल्यकाल या कार्तिकेय का भाव ) इन्होंने नहीं छोड़ा है ( फिर भी ) इनकी आँखों के तारक (पुतले या तारकासुर ) स्नेह को व्यंजित कर रहे हैं।' सा त्ववादीत्—'आर्य, श्रोष्यसि कालेन । भूयसो दिवसानत्र स्थातुमभिलषति नौ हृदयम् । अल्पीयांश्चायमध्वा । परिचय एव प्रकटी- करिष्यति । आर्येण न विस्मरणीयोऽयमनुषङ्गदृष्टो जनः' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत् । दधीचस्तु नवाम्भोभरगभीराम्भोधरध्वनिनिभया भारत्या नर्तयन्वनलताभवनभाजो भुजंगभुजः सुधीरमुवाच—'आर्य, करिष्यति प्रसादमार्याराध्यमाना । पश्यामस्तावत्ताम् । उत्तिष्ठ । व्रजामः' इति । तथेति च तेनाभ्यनुज्ञातः शनकैरूथाय कृतनमस्कृतिरुच्चचाल । तुरगारूढं च तं प्रयान्तं सरस्वती सुचिरमुत्तम्भितपक्ष्मणा निश्चलतारकेण लिखिते- नेव चक्षुषा व्यलोकयत् । उत्तीर्य च शोणमचिरेणैव कालेन दधीचः पितुराश्रमपदं जगाम । गते च तस्मिन्सा तामेव दिशमालोकयन्ती सुचिरमतिष्ठत् । कृच्छ्रादिव च संजहार दृशम् । परिचयः संस्तवः । अनुषङ्गः प्रसङ्गः । विवृत्तप्रार्थितयापि सावित्र्या कौतुक- निवृत्तिर्मा भूदित्यात्मस्वरूपं नोक्तम् । अत एवोत्तरत्र तदनुबन्ध एवोक्तः— भूयसो दिवसानित्यादिना । स्वरूपोक्तौ च ज्ञातसरस्वतीकत्वेनापत्यजननकार्यभङ्गो भवेत् । भारती वाक् । भुजङ्गभुजो मयूरान्, भुजग इव भुजावस्येति च । उच्च- चाल गन्तुं प्रवृत्तः । उत्तम्भितान्युत्क्षिप्तनि । सावित्री ने कहा—'आर्य, समय पर सब मालूम हो जायगा। हम दोनों के मन में यहाँ बहुत दिनों तक अभी रहने की इच्छा है। यह रास्ता बहुत थोड़ा है। परिचय बढ़ने से सब बात खुल जायगी । इस बहाने मिले हुए इस जन को आर्य न भूलेंगे।' इतना कह वह चुप हो गयी । जल भर जाने से गम्भीर आवाज वाले नये मेघ की भाँति लता-भवन
४६ हर्षचरितम् के मयूरों को नचाते हुए धीर स्वर में दधीच बोल उठे—'आर्य, अवश्य ही आराधना करने पर आर्या प्रसन्न होंगी। तब तक हम पिता जी के दर्शन करें। उठिए, चलें।' पार्श्वचर के स्वीकार करने पर दधीच धीरे से उठे और नमस्कार करके चल दिए। घोड़े पर सवार होकर जाते हुए उन्हें सरस्वती निश्चल आँखें फाड़ कर देर तक देखती रही। सोन पार करके कुछ ही देर में दधीच च्यवनाश्रम पहुँचे। उनके चले जाने पर सरस्वती उसी दिशा को देर तक निहारती हुई बैठी रही। बड़ी कठिनाई से वह अपनी आँख मोड़ सकी। अथ मुहूर्त्तमात्रमिव स्थित्वा स्मृत्वा च तां तस्य रूपसंपदं पुनः- पुनर्व्यस्मयतास्या हृदयम्। भूयोऽपि चक्षुराचकाङ्क्ष तद्दर्शनम्। अवशेव केनाप्यनीयत तामेव दिशं दृष्टिः। अप्रहितमपि मनस्तेनैव सार्धम- गात्। अजायत च नवपल्लव इव बालवनलतायाः कुतोऽप्यस्या अनुराग- श्चेतसि। ततः प्रभृति च सालस्येव शून्येव सनिद्रेव दिवसमनयत्। अस्तमुपयाति च प्रत्यक्पर्यस्तमण्डले लाङ्गलिकास्तबकताम्रत्विषि कम- लिनीकामुके कठोरसारसशिरःशोणशोचिषि सावित्रे त्रयीमये तेजसि, तरुणतरतालश्या मले च मलिनयति व्योम व्योमव्यापिनि तिमिरसंचये, संचरत्सिद्धसुन्दरीनूपुररवानुसारिणि च मन्दं मन्दं मन्दाकिनीहंस इव समुत्सर्पति शशिनि गगनतलम्, कृतसंध्याप्रणामा निशामुख एव निपत्य विमुक्ताङ्गी पल्लवशयाने तस्थौ। सावित्र्यपि कृत्वा यथाक्रियमाणं सायंतनं क्रियाकलापमुचिते शयनकाले किसलयशयनमभजत। जातनिद्रा च सुष्वाप। कुतोऽपि कस्मादपि न ज्ञायत इत्यर्थः। मनुप्यतस्तथाविधस्तादृश्याः कथम- नुराग इति। कथमेतदस्या उपपद्यत इति न वाच्यम्। यदाह मुनिः—'शापभ्रं- शात्तु दिव्यानां तथा चापत्यलिप्सया। कार्यों मानुषसंयोगः शृङ्गाररससंश्रयः॥' इति। अन्यत्र-कुतः क्षितेर्नवपल्लवोऽनुरागहतो लताथो जायत इत्येवमभिलाषरूपं प्रथमं दशान्तरमालम्ब्येत्यादिना द्वितीयचिन्तनरूपमाह। अनयत् कष्टेनात्यवाह- यत्। अस्तमित्यादौ पल्लवशयाने तस्थाविति संबन्धः। प्रतीच्यां पश्चिमास्याम्। लाङ्ग- लिका फलिनी। मयूरशिखोषधिरित्यपरे, रक्तिकेत्यन्ये। कमलिनीकामुक इति सरस्वतीदयिताभिप्रायेणोक्तम्। कठोरो जरठः। सारसो लक्ष्मणः। शोणो लोहितः। शोचिर्दीप्तिः। 'ऋग्यजु सामनामानि त्रयो वेदास्त्रयी स्मृता। वेदे च पठ्यते सैषा'। त्रय्येव विद्या तपतीति। 'कृत-' इत्यादिना 'तस्थौ' इत्यन्तेन क्रियान्तरत्यागेन वैमनस्यमावेद्यते। 'वेपते श्वसते चैव मनोरथविचिन्तनैः। प्रद्वेषेणान्यकार्याणाम-
नुस्तृप्तिरपीष्यते ॥' निशामुख एवेति । न पुनरुचिते शयनकाले विमुक्ताङ्गीशयनेन निःसहाङ्गत्वमस्या दर्शयते । तस्याविति । न पुनर्निद्रामलभत । यथाक्रियमाणमित्यनेन च सरस्वतीतोऽस्या व्यतिरेकं दर्शयन्सरस्वत्या एवानङ्गावस्थामह ।
अब सरस्वती का हृदय कुछ देर तक ठहर उस दधीच के रूप-लावण्य का स्मरण करके बार बार आश्चर्य से भरने लगा । बार बार उसकी आँखें दधीच के दर्शनों के लिए उत्सुक होने लगीं । मानों उसकी बेसुध नजर को कोई उसी दिशा की ओर फेर लेता था । बिना भेजे ही मन दधीच के साथ ही चला गया । सुकुमार वनलता में नये पल्लव के समान उसके चित्त में अनुराग अंकुरित होने लगा । उसी समय से अलसाई-सी, शून्य सी, निंदियाई सी उसने दिन को व्यतीत किया । जब पश्चिम में ढलते हुए मण्डल वाले, मञ्जलिका नामक फूलों के गुच्छों के समान कान्ति वाले, कमलिनियों को चाहने वाले तथा वृद्ध सारस के सिर के समान ललाई वाले सूर्य का वेदमय तेज अस्त हो रहा था, विशाल तमाल वृक्ष के समान काला, आकाशव्यापी प्रगाढ़ अंधकार आकाश को मलिन कर रहा था तथा चलती-फिरती सिद्धाङ्गनाओं के नूपुरों की ध्वनि का अनुसरण करने वाले आकाशगंगा के हंस के समान चन्द्रमा आकाश में धीरे धीरे उदित हो रहा था उस समय सायं-सन्ध्यावन्दन करके सरस्वती रात के आरम्भ होते ही अपने अङ्गों की सुध-बुध भूल पल्लव के शयन पर पड़ रही । सावित्री भी सायंकालीन क्रियाओं से निवृत्त होकर सोने के समय पल्लवशयन पर पहुँची और नींद आते ही सो गई ।
इतरा तु मुहुर्मुहुरङ्गवलनैर्विलुलितकिसलयशयनतला निमीलितनय- नापि नालभत निद्राम् । अचिन्तयच्च—'मर्त्यलोकः खलु सर्वलोकाना- मुपरि, यस्मिन्नेवंविधानि भवन्ति त्रिभुवनभूषणानि सकलगुणग्रामगुरूणि रत्नानि । तथा हि—तस्य मुखलावण्यप्रवाहस्य निस्यन्दबिन्दुरिन्दुः । * तस्य च चक्षुषो विक्षेपाः कुमुदकुवलयकमलाक[राः । तस्य चाधरमणे- र्दीधितयो विकसितबन्धूकवनराजयः । तस्य चाङ्गस्य परभागोपकरण- मनङ्गः । पुण्यभाञ्जि तानि चक्षूंषि चेतांसि यौवनानि वा क्षणानि, येषा- मसावविषयो दर्शनस्य । क्षणं नु दर्शयता च तमन्यजन्मजनितेनेव मे फलितमधर्मेण । का प्रतिपत्तिरिदानीम् ?' इति चिन्तयन्त्येव कथंकथ- मप्युपजातनिद्रा चिरात्क्षणमशेत । सुप्तापि च तमेव दीर्घलोचनं ददर्श । स्वप्नसादितद्वितीयदर्शना चाकर्णाकृष्टकार्मुकेण मनसि निर्दयमताड्यत मकरकेतुना । प्रतिबुद्धाया मदनशराहतायाश्च तस्या वार्त्तामिवोपलब्धुम- रतिराजगाम । तथा हि—ततः प्रभृति कुसुमधूलिधवलाभिर्वनलताभिर-
४८ हर्षचरितम् ताडितापि वेदनामधत्त । मन्दमन्दमारुतविधुतैः कुसुमरजोभिरदूषित- लोचनाप्यश्रुजलं मुमोच । हंसपक्षतालवृन्तवातव्रातविततैः शोणशी- करैरसिक्ताप्यार्द्रतामगात् । प्रेङ्खत्कादम्बमिथुनाभिरनूढाप्यघूर्णत वनकम- लिनीकल्लोलदोलाभिः । विघटमानचक्रवाकयुगलविस्सृष्टैरस्पृष्टापि श्यामता- माससाद विरहनिःश्वासधूमैः । पुष्पधूलिधूसरैरदृष्टापि व्यचेष्टत मधुकरकुलैः। विलुलितं विपर्यासितम् । मर्त्यलोक इत्यादिना गुणकीर्तनम् । चतुर्थमवस्था- विशेषमाह । तदुक्तम्—'अङ्गप्रत्यङ्गलीलाभिर्भावैश्चेतसाहितेक्षणैः । नास्त्यन्यः सदृ- शस्तेन तदेतद्गुणकीर्तनम् ॥' इति । गुणा वैदग्ध्यादयः, सूत्राणि च । तद्देशेन गुरूणि बहुमानभाञ्जि । इतरत्त्र तु तिष्ठतु तावदेकः । गुणग्रामस्यापि गुणिरूपिते- नापि दुर्बहानीति यावत् । तस्येनेति । पूर्वानुभूतस्य बिन्दुरिति न केवलं लावण्यप्र- वाहाभिप्रायेण यावत्संनिवेशसादृश्यात् । विक्षेपाः परतः प्रेरणानि । कुमुदेत्याद्यु- क्तम् । शुक्लकृष्णरक्तरुचित्वाच्चक्षुषो दीधितय इति मणिशब्दाभिप्रायेण । विकसित- शब्देन लौहित्यातिशयमाह । अङ्गानि विचिन्त्यते यस्य तदङ्गं शरीरम् । परभागो वर्ण्य- स्य वर्णान्तरेण शोभातिशयः । स्त्रैणानि स्त्रीसम्बन्धीनि । का प्रतिपत्तिः किमनुष्ठेयम् ? मदन-इत्यादिनोद्वेगरूपं पञ्चममवस्थाभेदमाह । यदुक्तम्—'आसने शयने वापि न हृष्यति न तुष्यति । नित्यमेवोत्सुका च स्यादुद्वेगस्थानमाश्रिता ॥ चिन्तानिःश्वास- खेदेन हहाहाभिनयेन च । कुर्यात्तदेवमत्यन्तमुद्योगेनाभिनयेन च ॥' इति । दश किल कामावस्थाः । तदुक्तम्—'प्रथमे त्वभिलाषः स्याद्द्वितीये चिन्तनं भवेत् । अनु- स्मृतिस्तृतीये तु चतुर्थे गुणकीर्तनम् ॥ उद्वेगः पञ्चमे प्रोक्तः प्रलापः षष्ठ उच्यते । उन्मादः सप्तमे चैव भवेद्व्याधिस्तथाष्टमे ॥ नवमे जडता प्रोक्ता दशमे मरणं भवेत् ॥' इति । अरतिर्दुःखासिका हि कामवधूप्रतिपत्तिभूतेति तदागमनाभिभ्रानम् । हंस- पक्षा इव तालवृन्तं व्यजनम् । आर्द्रता स्नेहताम्, क्लिन्नतां च । प्रेङ्खद्दोलाय- मानम् । कादम्बाः कृष्णहंसाः । श्यामता शृङ्गाररसाविष्कारिवैवर्ण्यम् । यदुक्तम्— 'शृङ्गारदेवो भगवान्मुरारिः संगीयते श्यामवपुर्मुरारिः । श्यामो मनाक्चिज्झषध्वजश्च तेन शृङ्गारशंसी मुखराग उक्तः ॥' अथ श्यामता सधूमता । श्यामत्वेऽपि सधूमता इति विरोधाभासः । लेकिन सरस्वती बार बार करवट बदलने लगी, अपने पल्लवशयन को मसल डाला, आँखें मूँद लीं, फिर भी नींद नहीं आई । सोचने लगी—'निश्चय ही मर्त्यलोक समस्त लोकों में बढ़ा-चढ़ा है, जहाँ त्रिभुवन के भूषण, समस्त गुणों के गौरव से भरे, ऐसे ऐसे रत्न पड़े हैं। जैसा कि—चन्द्रमा उसके लावण्य प्रवाह का चूआ हुआ एक बिन्दु ही तो है । उसके नेत्रों के विलास ही तो सफेद, काले और लाल कमलों के आकर हैं । उसके अधरमणि की कान्ति ही तो बन्धूक की खिली हुई वनराजि है । कामदेव
प्रथम उच्छ्वासः ४५ इसके अंग के शोभातिशय का साधन है। उन युवतियों की आँखें, चित्त एवं यौवन पुण्य- वान् हैं जिन्होंने इसके दर्शन नहीं किए। मानों दूसरे जन्म का उत्पन्न अधर्म फलित हो गया, जो मैंने क्षण भर इसके दर्शन किए। इस समय क्या करूँ?' यह सोच ही रही थी कि किसी किसी तरह बहुत देर बाद नींद आ गई और क्षण भर सोई रही। सोने पर भी उसी दीर्घलोचन दधीच को देखा। स्वप्न में उसने दूसरी बार दधीच को देखा तो मानों कामदेव ने उसे बड़ी निर्दयता से कान तक खींच कर बाण मारा। जब काम के बाण से घायल सरस्वती को नींद खुली तब उसकी खबर लेने के लिए मानों अरति (वैराग्य) आई। तब वह पुष्पपराग से उज्ज्वल वनलताओं द्वारा ताड़ित न होकर भी वेदना अनुभव करने लगी। मंद मंद हवा से काँपते हुए फूलों की रज उसकी आँखों में न भी पड़ती तो भी वह आँसू बहाती। हंस पक्षियों के पंखों की हवा से फैलते हुए सोन (नदी) के फुहारों द्वारा सिक्त न होने पर भी (पसीने से) तर होने लगी। काले हंसों की जोड़ियों से युक्त वन की कमलिनी की दोलाओं पर न बैठो हुई भी चकराने लगी। विघटित होते हुए जोड़े चक्रवाकों के विरहजन्य निश्वास-धूम से स्पृष्ट न होने पर भी श्यामता (कालिख) को प्राप्त करने लगी। फूल की धूल में लोट पोट करने वाले भौरों से न काटे जाने पर भी वह उद्विग्न होने लगी।
अथ गणरात्रापगमे निवर्तमानस्तेनैव वर्त्मना तं देशं समागत्य तथैव निवारित परिजनश्छत्रधारद्वितीयो विकुक्षिरुद्दँलोके । सरस्वती तु तं दूरादेव संमुखमागच्छन्तं प्रीत्या ससंभ्रममुत्थाय वनमृगीवोद्ग्रीवा विलोकयन्ती मार्गपरिश्रान्तमस्नपयदि्व धवलितदशदिशा दृशा । कृतासनपरिग्रहं तु तं प्रीत्या सावित्री पप्रच्छ—'आर्य, कच्चित्कुशली कुमारः ?' इति । सोऽब्रवीत्—'आयुष्मति, कुशली । स्मरति च भवत्योः । केवलममीषु दिवसेषु तनीयसीमिव तनुं बिभर्ति । अविज्ञायमाननिमित्तां च शून्य- तामिवाधत्ते । अपि च । अन्वक्षमागमिष्यत्येव मालतीति नाम्ना वाणिनी वार्तां वो विज्ञातुम् । उच्छ्वसितं हि सा कुमारस्य' इति । तच्छ्रुत्वा पुनरपि सावित्री समभाषत—'अतिमहानुभावः खलु कुमारो येनैवमवि- ज्ञायमाने क्षणदृष्टेऽपि जने परिचितिमनुबध्नाति । तस्य हि गच्छतो यदृच्छया कथमप्यंशुकमिव मार्गलतासु मानसमस्मासु मुहूर्तमासक्त- मासीत् । अशून्यं हि सौजन्यमाभिजात्येन वः स्वामिसूनोः । अलसः खलु लोको यदेवं सुलभसौहार्दानि येन केनचिन्न क्रीणाति महतां मनांसि । सोऽयमौदार्यातिशयः कोऽपि महात्मनामितरजनदुर्लभो ४ ह० च०
५० हर्षचरितम् येनोपकरणीकुर्वन्ति त्रिभुवनम्' इति । विकुक्षिस्तूचावचैरालापैः सुचिर- मिव स्थित्वा यथामिलषितं देशमयासीत् । ४४ • गणरात्रं निशाबहुत्वः । तेनैव वर्त्मनेति । अनेन तस्य यदृच्छया तदाश्रयमा- गमनमिति दर्शयति । प्रधानप्रकृतेः स्थवीयसस्तथाविधव्यापारविनियोगाद्यनौचि- त्याद् । अत एव वक्ष्यति — 'यथामिलषितं देशमयासीत्' । हुडोके इत्यनेन निमित्त- परतन्त्रतया संनिकृष्टमेवैनमालुलोकेति प्रदर्शितम् । यदुक्तम् — 'पटुता धाष्ट्रर्यता इङ्गि- ताकारज्ञानं प्रतारणे देशकालज्ञता कार्येषु विषह्यबुद्धित्वं लघ्वी प्रतिपत्तिः सापाया च इति दूतीगुणाः' । भरतमुनिरपि — 'विज्ञानगुणसंपन्ना कथिनी लिङ्गिनी तथा । रङ्गोपजीविनी चापि प्रतिपत्तिविचक्षणा ॥ प्रोत्साहनेककुशलेत्यादिदूतीगुणैर्युता ॥' इति । अत एवागूढश्चाकारतःप्रभृतीत्यादि वक्ष्यते । अन्वक्षं प्रत्यक्षम् । वाणिनी दूती । उच्छ्वसितमित्यनेनातिविस्रम्भवत्ता स्याता । उच्छ्वसितं प्राण इति वा । यदृ- च्छया यथाकथंचित् । यश्च तथागच्छति यस्य निरवधानतया क्वचिदंशुकादि गलति । आभिजात्येन महाकुलीनत्वेनोपकरणीकुर्वन्त्यायततां नयन्ति । उच्चावचैः प्रकृतव- स्वसंस्पर्शिभिः, विचित्रैरिति वा । इस तरह कई रातें गुजर गईं । एक दिन उसी मार्ग से लौटता हुआ विकुक्षि परिजनों को बाहर रोक छत्रवाहक को साथ ले पहुँचा । सरस्वती ने दूर ही से सामने आते हुए उसे देखा और प्रेम से फड़क उठी । वह हिरनी की तरह गर्दन ऊँची उठाकर देखने लगी मानों मार्ग में थके हुए विकुक्षि को दिशाओं को धवलित करने वाली दृष्टि से स्नान कराने लगी । जब वह आकर आसन पर बैठ गया तब सावित्री ने प्रीतिपूर्वक पूछा— 'आर्य, क्या कुमार दधीच कुशल से हैं ?' उसने कहा—'आयुष्मती, कुमार सकुशल हैं । आप दोनों का स्मरण करते हैं । इन दिनों उनका शरीर क्षीण होता जा रहा है । पता नहीं क्यों, शून्य-शून्य से लगते हैं । और भी, मालती नाम की दूती समाचार लेकर सामने आने वाली है । कुमार का उसे प्राण ही समझना ।' यह सुनकर फिर सावित्री बोली—'कुमार सचमुच बड़े ही महानुभाव हैं, जो अज्ञातजन में भी क्षण भर की देखा- देखी में ही अपना परिचय-सम्बन्ध जोड़ रहे हैं । वे जाने लगे तो उनका मन हम लोगों में क्षण भर इस तरह लग गया जैसे मार्ग की लताओं में अंशुक फँस जाता है । आपके स्वामिपुत्र दधीच में कुलीनता के साथ सौजन्य भी है । दुनिया वाले बड़े आलसी होते हैं जो सुलभ सौहार्द वाले महापुरुषों के मन को जिस किसी वस्तु से खरीदते नहीं । महापुरुषों में ही इस तरह बढ़कर उदारता होती है जो इतर लोगों में नहीं होती और जिससे वे लोग त्रिभुवन को अपने वश में कर लेते हैं ।' विकुक्षि भी लम्बी बातचीत करके अपने अभिलषित देश की ओर चला गया ।
प्रथम उच्छ्वासः ५१ अपरेद्युरुद्यति भगवति द्युमणावुद्दामद्युतावभिद्रुततारके तिरस्कृत- तमसि तामरसव्यासङ्ग्यसनिनि सहस्ररश्मौ शोणमुत्तीर्यायन्ती, तरल- देहप्रभावतानच्छलेनायच्छं सकलं शोणसलिलमिवानयन्ती, स्फुटिता- तिमुक्तककुसुमस्तबकसमत्विषि सटाले महति मृगपताविव गौरी तुरंगमे स्थिता, सलीलमुरोबन्धारोपितस्य तिर्यग्गुत्कर्णतुरगाकर्ण्यमाननूपुरपटुरणि- तस्यातिबहलेन पिण्डालक्तकेन पल्लवितस्य कुङ्कुमपिञ्जरितपृष्ठस्य चरण- युगलस्य प्रसरद्भिरतिलोहितैः प्रभाप्रवाहैरभयतस्ताडनदोहदलोभागतानि किसलयितानि रक्ताशोकवनानीवाकर्षयन्ती, सकलजीवलोकहृदयहठहर- णाघोषयेव रशनया शिञ्जानजघनस्थला, धौतधवलनेत्रनिर्मितेन निर्मोकलघुतरेणाप्रपदीनेन कञ्चुकेन तिरोहिततनुतला, स्त्रातकञ्चुकान्तर- दृश्यमानैराश्यानचन्दनधवलैरवयवैः स्वच्छसलिलाभ्यन्तरविभाव्यमान- मृणालकाण्डेव सरसी, कुसुम्भरागपाटलं पुलकबन्धचित्रं चण्डातकमन्तः- स्फुटं स्फटिकभूमिरिव रत्ननिधानमादधाना, हारेणामलकीफलनिस्तुल- मुक्ताफलेन स्फुरितस्थूलग्रहगणशारा, शारदीव श्वेतविरलजलधरपटला- वृता द्यौः, कुचपूर्णकलशयोरुपरि रत्नप्रालम्बमालिकामरुणहरितकिरण- किसलयिनीं कस्यापि पुण्यवतो हृदयप्रवेशनमालिकामिव बद्धां धारयन्ती, प्रकोष्ठनिविष्टस्यैकैकस्य हाटककटकस्य मरकतमकरवेदिका- सनाथस्य हरीतीकृतदिगन्ताभिर्मयूखसंततिभिः स्थलकमलिनीभिरिव लक्ष्मीशङ्कयानुगम्यमाना, अतिबहलताम्बूलकृष्णिकान्धकारितेनाधरसंपु- टेन मुखशशिपीतं ससंध्यारागं तिमिरमिव वमन्ती, विकचनयनकुवलय- कुतूहलानिलीयमानयालिकुलसंहत्या नीलांशुकजालिकयेव निरुद्धार्धवदना, नीलीरागनिहितनीलिम्ना शिखिगलशितिना वामश्रवणाश्रयिणा दन्त- पत्रेण कालमेघपल्लवेन विद्युदिव द्योतमाना, बकुलफलानुकारिणीभिस्ति- सृभिर्मुक्ताभिः कल्पितेन बालिकायुगलेनाधोमुखेनालोकजलवर्षिणा सिञ्च- न्तीवातिकोमले भुजलते, दक्षिणकर्णावतंसितया केतकीगर्भपलाशलेखया रजनिकरजिह्वालतयेव लावण्यलोभेन लिह्यमानकपोलतला, तमालश्या- मलेन मृगमदामोदनिष्यन्दिना तिलकबन्दुिना मुद्रितमिव मनोभवसर्वस्वं वदनमुद्वहन्ती, ललाटलासकस्य सीमन्तचुम्बिनश्चटुलतिलकमणेरुद्भ्रमता चटुलेनांशुजालेनेव रक्तांशुकेनेव कृतशिरोवगुण्ठना, पृष्ठप्रेङ्खद् नादरसंयमन-
५२ हर्षचरितम् शिथिलजूटिकाबन्धा नीलचामरावचूलिनीव चूडामणिमकरिकासनाथा, मकरकेतुपताकेव कुलदेवतेव चन्द्रमसः, पुनःसंजीवनौषधिरिव पुष्प- धनुषः, वेलेव रागसागरस्य, ज्योत्स्नेव यौवनचन्द्रोदयस्य, महानदीव रतिरसामृतस्य, कुसुमोद्गतिरिव सुरततरोः, बालविद्येव वैदग्ध्यस्य, कौमुदीव कान्तेः, धृतिरिव धैर्यस्य, गुरुशालेव गौरवस्य, बीजभूमिरिव विनयस्य, गोष्ठीव गुणानाम्, मनस्वितेव महानुभावतायाः, तृप्तिरिव तारुण्यस्य, कुवलयदळदामदीर्घलोचनया पाटलाधरया कुन्दकुड्मलस्फुट- दशनया शिरीषमालासुकुमारभुजयुगलया कमलकोमलकरया बकुलसुर- भिनिःश्वसितया चम्पकावदातदेहया कुसुममय्येव ताम्बूलकरण्डवाहिन्या महाप्रमाणाश्वतरारूढयानुगम्यमाना, कतिपयप्रतिचारकपरिकरा मालती समदृश्यत। दूरादेव च दधीचप्रेम्णा सरस्वत्या लुण्ठितेव मनोरथैः, आकृष्टेव कुतूहलेन, प्रत्युद्गतेवोत्कलिकाभिः, आलिङ्गितेवोत्कण्ठया, अन्तःप्रवेशितेव हृदयेन, स्नापितेवानन्दाश्रुभिः, विलिप्तेव स्मितेन, वीजितेवोच्छ्वसितैः, आच्छादितेव चक्षुषा, अभ्यर्थितेव वदनपुण्डरीकेण, सखीकृतेवाशया सविधमुपययौ। अवतीर्य च दूरादेवानतेन मूर्ध्ना प्रणाममकरोत्। आलि- ङ्गिता च ताभ्यां सविनयमुपाविशत्। सप्रश्रयं ताभ्यां संभाषितात च पुण्यभाजनमात्मानममन्यत। अकथयच्च दधीचसंदिष्टं शिरसि निहिते- नाञ्जलिना नमस्कारम्। अगूढाद्याकारतः अभृत्यग्राम्यतया तैस्तैरतिपेशा- लैरालापैः सावित्रीसरस्वत्योर्मनसी। अपरेण रीत्यादावीदृशी मालती समदृश्यतेति संबन्धः। दिवि मणिरिव द्युमणिः। वियद्भूषणं सूर्यः। अभिद्रुता न्यक्कृता। तामरसं पद्मम्। व्यासो विकासः। अति- मुक्तकं पुष्पभेदः। केचिन्मालतीलताकुसुममाहुः। सटास्ति यस्येति। 'प्राणिस्था- दातो लजन्यतरस्याम्'। गौरी गौराङ्गी, पार्वती च। सजलतुरङ्गाङ्गस्पर्शपरिजिही- र्षयोरुवभ्रेत्याद्युक्तम्। प्रियमधुरशब्दत्वादश्वानामाकर्ण्यमानेत्युक्तम्। पिण्डाल- क्तकः कथितोऽलक्तकरसः। दोहदोऽभिलाषः। वाद्यविशेषानुगताङ्गुल्यघोषणा। रशना मेखला। शिञ्जानं शब्दायमानम्। निर्मोकः सर्पत्वक्। आप्रपदं प्राप्नोत्याप्रपदीनः पादं यावत्। छातस्तनुः। कुसुमभं पद्मक्रम्। नानावर्णबिन्दुन्यासः पुलकबन्धः, मणिविशेषाश्च पुलकाः। चण्डातकमधोरुकम्। कुचावेव कस्यापि पुण्यवत इवेति वक्ष्यमाणाभिप्रायेण पूर्णकलशौ। कस्यापीत्यलौकिकस्य। वनमाला पञ्चपुष्पयो- जिता स्रक्। सापि पूर्णकलशयोरुपरि बध्यते। प्रकोष्टः प्रकुञ्चनकः। वेदिका रत्न- १. तुरगाद्दूरादेवानतंन ।
प्रथम उच्छ्वासः ५३ प्रतिष्ठापीठिका । बहलं पौनःपुन्येन कृतम् । कृष्णिका कृष्णलेखा । मुखमेव तमःपारप्रतिपिपादयिष्या शशी । ताम्बूलकारणत्वेन लौहित्यमेव सम्भवतीति ससन्ध्यारागमित्युक्तम् । नील्योषधिभेदः । शितिनीलः । पल्लवः पिण्डः । बालिका कर्णोपवेधेऽलंकारः । अधोमुखेन घटादिना जलवर्षिणा लता सिच्यते । मृगमदः कस्तूरिका । तिलकबन्दुिः परिवर्तुलस्तिलकः । लासको नर्तकः । 'सुवर्ण- शृङ्खलाबद्धो नानारत्नौघमण्डितः । ललाटलम्ब्यलंकारश्चटुलातिलको मतः ॥' अव- चूल चिह्नम् । मकरिका मकराकारं रूपम् । वेला यथा सागरं क्षोभयति तद्वदेवेयं रागम् । क्षोभेन यथा सागरो दुरुत्तर एवमेतयापि रागः । यथा ज्योत्स्नया विना चन्द्रोदयो भत्रन्नपि न क्वापि विलसन्विभाव्यते तथैतया विना यौवनं सविलासम्- न्यत्र न दृश्यते । रतिप्रधानो रसः शृङ्गार एव । माधुर्यातिशययोगित्वात्प्रकृष्टत्वाच्च । ह्लादनममृतम् । यदुक्तम्- 'शृङ्गार एव परमः परः प्रह्लादनो रसः' इति । संप्रयोगो रतं रहःशयनं मोहनमिति पर्यायाः । बालविद्या न कंचन मुञ्चति, तद्वदेष वैद- ग्ध्यम् । कौमुदीति । तथाविधकान्त्यतिशयसंभवात् । ध्रियते येन धृतिः । अस्यां सत्यां धैर्यमपि । यद्वा-धृतिः प्रवेशरक्षणम् । यथा प्रविशन्कश्चिद्राजनिकटं ध्रियते केनचित्तथा धैर्यं तावत्प्रसरति । यावदेषा न दृष्टा एतस्यां दृष्टायां सर्वे धैर्यशून्या इति । 'समानविद्यावित्तशीलबुद्धिवयसामनुरूपैरालापैरकत्रासनबन्धो गोष्ठीमन- स्विता' इत्यनेनैतस्या महानुभावताया व्यभिचारित्वमुच्यते । यस्माच्चत्र मनस्विता तत्र महाशयत्वमेवावश्यं सम्भावयतीति स्थितमेव । तृप्तिरिवेति । यथा कश्चित्सञ्जा- ततृप्तिर्नान्यत्किंचित्पुनरपेक्षते तद्वदासादितमालतीकं तारुण्यम् । एतदाश्रयणेन परिपूर्णवैषयिकोपभोगप्राप्तिस्तारुण्यस्येत्यर्थः । कुसुममयेवेति । कुवलयादिभिर्न- यनादीनां विधानम् । तरुणोऽश्वोऽश्वतरः । 'वत्सोक्षाश्वर्षभेभ्यश्च तनुत्वम्' इति तनुत्वे तरप् । अत्र च व्याख्यातम् - 'तनुत्वं द्वितीयवयःप्राप्तिः' इति । अश्वतरो वा गर्दभेनाश्वायां जातः । मालतीति । एवं दधीचपरिवारभूतया मालत्या गुणवर्णन- द्वारेण सरस्वत्या एव निःसामान्यगुणातिशयो ध्वन्यते । लुण्ठनेवेति । वक्ष्यमाणं प्रार्थनादि । तया मनोरथैरुप्रेक्ष्य स्वीकृतमित्यतस्तैर्लुण्ठितेवेत्युक्तम् । लुण्ठनं च पाथेयाभिवितरणमेवमन्यत् । उत्कलिका रहुरुहिका । सविधं समीपम् । अपि च यः स्निग्धो दूरात्सविधमायाति, तस्य लुण्ठनादिसर्वमर्चनावसानं क्रियत इति ध्वनिः । पेशलैर्हृद्यैः । अगले दिन आकाश के रत्न, प्रखर किरणों वाले, तारों को भगा देने और अंधकार को हटा देने वाले, कमलों को विकसित करने के शौकीन भगवान सूर्य के उदित होते ही सोन पार करके आती हुई मालती दिखाई पड़ी । अपने शरीर की तरल प्रभा से सोन के जल को वह और भी निर्मल कर रही थी । वह बड़े तुरंगम पर सवार थी, जिसका वर्ण माधवी के फूल की भाँति था, और उसकी गर्दन पर झालर जैसी अयाल थी । मालती
५४ हर्षचरितम् विशाल सिंह पर आरूढ़ गौरी की भाँति लग रही थी। लीला से उसने अपने चरण रकाब पर रखे थे; जब पैर के नूपुर बजते तो उसका घोड़ा कान खड़े करके गर्दन टेढ़ी किए सुनता। आलते से उसके पैर रञ्जित थे। तलवे में कुंकुम लगा हुआ था। उसके पैरों की टहाका लाल कान्ति दोनों ओर फैल रही थी, मानों वह ताड़न की अभिलाषा से रक्ता- शोक के हरे-भरे वनों को खींचती आ रही थी। उसके कटि प्रदेश में करधनी बज रही थी, मानों वह जीवलोक के सारे लोगों के मन को हठपूर्वक हरने के लिए घोषणा कर रही हो। उसका सारा शरीर धुले सफेद रेशम के पैरों तक लटकते हुए झीने, साँप की केंचुल की तरह हल्के और बारीक कंचुक से ढँका हुआ था। झीने कंचुक के भीतर चन्दन के सूख जाने से उसके उज्ज्वल अंग दिखाई पड़ रहे थे जैसे सरसी के निर्मल जल के भीतर मृणाल की डंठल झलकती दिखाई देती है। झीने कंचुक के नीचे कुसुंभी रंग का लाल लहँगा झलक रहा था जिस पर रंग-बिरंगी बुंदकियाँ पड़ी हुई थीं, मानों स्फटिक की जड़ाव में मोतियाँ जड़ी हों। आँवले-जैसे बड़े बड़े मोतियों का हार गले में लटक रहा था, वह तारों भरे शरत्काल के आकाश जैसी लग रही थी जिसमें कहीं कहीं सफेद मेघ के टुकड़े घिरे रहते हैं। उसके स्तन रूपी कलश पर रत्नों की प्रालम्ब माला लटक रही थी, मानों किसी पुण्यवान् के हृदय में प्रवेश करने के स्वागत में मङ्गलार्थ घट में वनमाला बँधी हो। उसके एक हाथ की कलाई में सोने का कड़ा था जिसके ग्राहमुखी सिरों पर पन्ने जड़े हुए थे, उनकी हरित किरणें दिशाओं में फैल रही थीं, मानों स्थल-कमलिनियाँ उसे लक्ष्मी समझ कर पीछे लग गई थीं। उसके अधर पर पान चबाने से काली रेखा पड़ गई थी, मानों उसका मुखचन्द्र पिए हुए संध्याराग के सहित अन्धकार को उगल रहा हो। भौंरे उसके नेत्रों को खिले हुए कुवलय समझ कर छा रहे थे मानों उसका मुख नीले अंशुक की नकाब से ढँका हुआ था। उसके बायें कान का दन्तपत्र नीली राग द्वारा रँग कर नीला कर दिया गया था, उसका वर्ण मयूर की गर्दन की तरह था। मानों विस्तृत नीले मेघ में बिजली के समान मालती शोभ रही थी। मौलसिरी के फल जैसे लम्बोतरे तीन मोती वाली उसके कानों में एक एक बाली थी, जो नीचे लटक कर अपने आलोक के जल से भुज रूपी लता को सींच रही थी। उसके दाहिने कान पर केतकी का नुकीला टौंसा लगा हुआ था, मानों उसके लावण्य का लोभी चन्द्र अपनी जीभ से उसके कपोल को चाट रहा था। माथे पर कस्तूरी का तिलकबिन्दु तमाल की भाँति श्याम था। कामदेव का सर्वस्व होने के कारण उसके मुँह पर तिलक रूप में जैसे राजकीय मोहर लगी थी। ललाट पर सामने माँग से लटकती हुई चट्टला तिलक नामक मणि ऊपर उठती हुई किरणों के रूप में मानों उसके सिर पर लाल अंशुक की पगड़ी बँधी थी। उसके बालों का जूड़ा पीठ पर ठीक से न बाँधने के कारण ढीला होकर लटक रहा था। नीले कमल के समान चूड़ामणि मकरिका उसके सामने केशों में लगी हुई थी। वह कामदेव की पताका, चन्द्रमा
[Page Header: प्रथम उच्छ्वासः ५५]
की कुल देवता, काम को फिर से जीवित कर देने वाली संजीवन बूटी, प्रेम के समुद्र की तटी, यौवन रूपी चन्द्रोदय की चाँदनी, रति रस के अमृत की महानदी, सुरत वृक्ष की पुष्पोद्गति, वैदग्ध्य की बाल विद्या, कान्ति की कौमुदी, धैर्य की धृति, गौरव की बड़ी शाला, विनय की बीजभूमि, गुणों की गोष्ठी, महानुभावता की मनस्विता और जवानी की तृप्ति थी। उसके साथ एक बड़े अश्व पर बैठी हुई उसकी ताम्बूलकरंकवाहिनी आ रही थी जिसके अंग-अंग मानों फूल से बने थे, क्योंकि कुवलय की माला-सी बड़ी-बड़ी आँखें, पाटल पुष्प-सा अधर, कुन्द की कलियों जैसे दाँत, शिरीषमाला जैसी सुकुमार दोनों भुजाएँ, कमल जैसे हाथ, मौलसिरी की गन्ध जैसी सरस और चम्पा के समान दमकती देह थी। सरस्वती ने दधीच के प्रेम से मालती को दूर से ही मानों मनोरथ द्वारा लूट लिया, कुतू- हल से खींच लिया, मन की तरङ्गों से अगवानी की, उत्कण्ठा से आलिङ्गन किया, हृदय के भीतर रख लिया, आनन्द के आँसू से नहला दिया, स्मित के चन्दन से चर्चित किया, उच्छ्वसितों द्वारा पंखे झलने लगी, आँखों से ढँक दिया, मुख के कमल से पूजा की और आशा से उसे अपनी सखी बना लिया। तब मालती आई और आकर दूर ही से झुककर प्रणाम किया। दोनों से वह अँकवार कर मिली और तब विनयपूर्वक बैठी। सरस्वती ने भी मालती से जब विनयपूर्वक सम्भाषण किया तो उसने अपने आप को धन्यभाग समझा। मालती ने दधीच के सन्देश रूप में 'सिर से हाथ टेककर प्रणाम' को कहा। सावित्री और सरस्वती के मन को उसने अपने अग्राम्य आकार और अतिमधुर बातचीत से हर लिया।
क्रमेण चातीते मध्यन्दिनसमये शोणमवतीर्णायां सावित्र्यां स्नातुमु- त्सारितपरिजना साकूतेव मालती कुसुमशयस्तरशायिनीं समुपसृत्य सर- स्वतीमाबभाषे—'देवि, विज्ञाप्यं नः किंचिदस्ति रहसि। यतो मुहूर्त- मवधानदानेन प्रसादं क्रियमाणमिच्छामि' इति। सरस्वती तु दधीचसं- देशाशङ्किनी किं वक्ष्यतीति स्तननिहितवामकरनखरकिरणदन्तुरितमुद्भि- द्यमानकुतूहलाङ्कुरनिकरमिव हृदयमुत्तरीयदुकूलवल्कलैकदेशेन संच्छादयन्ती, गलतावतंसपल्लवेन श्रोतुं श्रवणेनेव कुतूहलाद्भावमानेनाविरतश्वाससंदोह- दोलायितां जीविताशामिव समासन्तरुणतरुलतामवलम्बमाना, समुत्फु- ल्लस्य मुखशशिनो लावण्यप्रवाहेण शृङ्गाररसेनेवाप्लावयन्ती सकलं जीव- लोकम्, शयनकुसुमपरिमललग्नैर्मधुकरकदम्बकैर्मदनाननलदाहश्यामलै- र्मनोरथैरिव निर्गत्य मूर्त्तैरुत्तप्यमाना, कुसुमशयनीयात्समरशरसंञ्चरिणी, मन्दं मन्दमुदगात्। 'उपांशु कथय' इति कपोलतलप्रतिबिम्बितां लज्जया कर्णमूलमिव मालतीं प्रवेशयन्ती मधुरया गिरा सुधीरमुवाच—'सखि
५६ हर्षचरितम् मालती, किमर्थमेवमभिदधासि ? काहमवधानदानस्य शरीरस्य प्राणानां वा ? सर्वस्याप्रार्थितोऽपि प्रभवत्येवातिवेलं चक्षुष्यो जनः। सा न काचिद्या न भवसि मे स्वसा सखी प्रणयिनी प्राणसमा च। नियुज्यतां यावतः कार्यस्य क्षमं क्षोदीयसो गरीयसो वा शरीरकमिदम्। अनवस्करमा- श्रवं मे त्वयि हृदयम्। प्रीत्या प्रतिसरा विधेयास्मि ते। व्यावूणु वरवर्णिनि, विवक्षितम्' इति। सा त्ववादीत्- 'देवि, जानास्येव माधुर्यं विषयाणाम्, लोलुपतां चेन्द्रियग्रामस्य, उन्मादितां च नवयौवनस्य, पारिप्लवतां च मनसः। प्रख्यातैव मन्मथस्य दुर्निवारता। अतो न मामुपालम्भे- नोपस्थातुमर्हसि। न च बालिशता चपलता चारणता वा वाचालतायाः कारणम्। न किंचिन्न कारयत्यसाधारणा स्वामिभक्तिः। सा त्वं देवि, यदैव दृष्टासि देवेन तत एवारभ्यास्य कामो गुरुः, चन्द्रमा जीवितेशः, मलयमरुदुच्छ्वासहेतुः, आध्योऽन्तरङ्गस्थानेपु, संतापः परमसुहृत्, प्रजागर आप्तः, मनोरथाः सर्वगताः, निःश्वासा विग्रहाग्रेसराः, मृत्युः पार्श्ववर्ती, रणरणकः संचारकः, संकल्पा बुद्ध्युपदेशवृद्धाः। किंच विज्ञा- पयामि। अनुरूषो देव इत्यात्मसंभावना, शीलवानिति प्रक्रमाविरुद्धम, धीर इत्यवस्थाविपरीतम्, सुभग इति त्वदायत्तम्, स्थिरप्रीतिरिति निपुणोपक्षेपः, जानाति सेवितुमित्यस्वामिभावोचितम्, इच्छति दास- भावमामरणात्कर्तुमिति धूर्तालापः, भवनस्वामिनी भवेत्युपलोभनम्, पुण्यभागिनी भजति भर्तारं तादृशमिति स्वामिपक्षपातः, त्वं तस्य मृत्यु- रित्यप्रियम्, अगुणज्ञासीत्यधिक्षेपः, स्वप्नेऽप्यस्य बहुशः कृतप्रसादासी- त्यासाक्षिकम्, प्राणरक्षार्थमर्थयत इति कातरता, तत्र गम्यतामित्याज्ञा, वारितोऽपि बलादागच्छतीति परिभवः। तदेवमगोचरे गिराम्सीति श्रुत्वा देवी प्रमाणम्' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत्। आकूतमभिप्रायः। रहस्येकान्ते। सरस्वतीत्यादौ। सरस्वती कुसुमशयनीयादु- दगादुदतिष्ठदिति संबन्धः। अवतंसपल्लवेन गलतेतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया। संदोहः समूहः। संज्वरः संतापः। उपांश्वनुक्तम्। अतिवेलमतिमात्रम्। 'अतिपेशलः' इति पाठे पेशलः। सुन्दरः। चक्षुष्योऽनुकूलः। त्वमिव व्यक्तम्। चक्षुष्य इति भङ्ग्वा दधीच इति ध्वनति। स्वसा भगिनी। प्रणयिनी विश्वास्ता। अतिशयेन क्षुद्रमल्पं क्षोदीयः। 'ज्ञेयं गुह्यमनवस्करम्' । आश्रवं वचसि स्थितम् । प्रतिसरानुकूला । विधेया