हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः ४३ नप्तारं पौत्रम् । साभिसारं ससहायम् । मन्दाक्षमुपरोधम् । गव्युतिः क्रोशद्वयम् । यात्रा प्रस्थानम् । गोत्रं वंशः । समवाय एकत्रस्थितिः । बालेषु केशेष्वन्धकारं तम इति यस्या बालं प्रत्यग्रम् । भास्वती मूर्तिमती, भास्वत आदित्यस्य च मूर्तिः । न कदाचित्सन्निहितबालान्धकारा भवतीति विरोधः । पुण्डरीकं पद्मम्, सिंहश्च यस्या मुखं तत्र कथं हरिणस्य लोचने स्त इति विरोधः । पयोधरौ स्तनौ, मेघाश्च पयोधराः । कलहंसानां स्वनो यस्यां सा । सरित्कथं प्रावृड् भवतीति विरोधः । करो हस्तः, रश्मिश्च । शिला वातवञ्जीभूतं हिमम् । यत्र च हिमगिरिशिलाभिः पृथुर्मध्यभागस्तत्र कथं पद्मकोमलकान्तिः । हिमस्पर्शं पद्मानाशात् । 'मणिबन्धादा- कनिष्ठं करस्य करभो बहिः' करभश्चोष्ट्रः । विलम्बितं सविलासम् , लम्बितश्च करभो यस्याः । करभोरुः कथं विगतकरभममनेति विरोधः । कुमारभावो बाल्यम्, कुमारे च भावो भक्तिः । स्निग्धो रम्यः, प्रतीतश्च । तारकाऽक्ष्णोः कनीनिका, दैत्यभेदश्च तारकः स्कन्देन यो हतः । उस युवक ने देखकर लौट हुए अग्रगामी पैदल सैनिकों से दिव्य आकृति वाली कन्या के विषय में सुनते ही कुतूहल से भर कर देखने के लिये उत्सुक हो घोड़े को ऐंड़ लगाई और शीघ्र उस लतामण्डप के समीप पहुँच गया । कुछ ही दूर पर घोड़े से उतर गया । अपने और साथियों को उसने वहीं रोक दिया, लेकिन उस सज्जन पार्श्वचर को साथ लेकर पैदल ही विनीत भाव से आया । सरस्वती के साथ सावित्री ने उन दोनों का अभिवादन किया और वनवास के योग्य फूल, फल एवं अर्घ्य आदि से उनका क्रम से आतिथ्य-सत्कार किया । दोनों पूर्ण रूप से स्थिर हुए तो वह स्वयं बैठी और कुछ ही देर ठहर कर उस दूसरे वृद्ध सज्जन से बोली—'आर्ये, सहजलज्जाशील नारियों का पहले पहल बोल बैठना बड़ी धृष्टता होती है, विशेष कर तो उनका जो वन्य मृगी की भाँति मुग्ध कुलकुमारियाँ हैं। आँखें तो देखकर कृतार्थ हो गईं, पर केवल कर्णेन्द्रिय की वृत्ति वृत्तान्त सुनने के लिए कुतूहल से प्रेरित कर रही है। प्रथम दर्शन में ही सज्जन व्यक्ति उपहार के रूप में प्रणय को समर्पित करता है। प्रभावशाली विनय से अर्पित किया हुआ मन मद्य के समान अधृष्ट जन को भी वाचाल बना देता है। अत्यन्त नम्र स्वभाव वाले सज्जन में बिना यत्न के ही विश्वास अधिक हो जाता है, जैसे धनुष के अग्रभाग तक उसका गुण बढ़ जाता है । पहले कभी नहीं देखे गए फिर देखे जाने वाले विधाता के उत्कृष्ट निर्माण अत्यन्त धीर लोगों में आश्चर्य को उत्पन्न कर देते हैं। बात यह है कि इन महानुभाव का रूप त्रिभुवन को अभिभूत कर देने वाला है। देवानांप्रिय की सौजन्य से भरी यह अतिभद्रता ही मुझे बोलने के लिए तत्पर कर रही है, युवतियों में स्वभावतः होने वाली चंचलता नहीं। तो कहिए इन्होंने किस पुण्यहीन देश को अपनी विरह- व्यथा के द्वारा सूना कर दिया है। ये कहाँ जायँगे ? ये मानों दूसरे कामदेव हैं जो शिव के हुंकारजनित अहंकार को न मानकर उत्पन्न हो गया है। कौन हैं ये ? बढ़ी हुई तपस्या