हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ हर्षचरितम् वाले किस पिता के अमृतवर्षी स्वभाव से ये हृदय को आह्लादित करते हैं जैसे कौस्तुभ- मणि विष्णु के हृदय को ? त्रिभुवन द्वारा नमन करने योग्य और महान् तेजस्वी को उत्पन्न करने वाली प्रभात की सन्ध्या के समान कौन इनकी जननी है ? कौन से पुण्य- वान् अक्षर इनके नाम में जुटते हैं ? आर्य के सम्बन्ध में जानने के लिए इस कुतूहल भरे हृदय के प्रश्न क्रमशः ये ही हैं।' सावित्री के इतना पूछने पर विनय प्रकट करते हुए पार्श्वचर ने उत्तर दिया—'आयुष्मती, प्रिय बोलना तो सज्जनों की कुलविद्या है। केवल तुम्हारा मुख ही नहीं, प्रत्युत हृदय भी चन्द्रमय है, क्योंकि वह अमृत के शीतल फुहारों के सदृश वचनों से आह्लादित कर रहा है। आपके सदृश लोग जो सौजन्य की जन्मभूमि हैं बड़े ही शुभकर्मों से मिलते हैं, क्योंकि वे सज्जनों के निर्माण की शिल्प- विद्या के स्वरूप हैं। ऐसे कुलीन लोगों के साथ परस्पर बातचीत करना तो दूर है इनके साथ आँखें ही मिलकर अलौकिक भूमि में पहुँचा देती हैं। तो सुनिए—यह भार्गववंश का कुलभूषण, महर्षि च्यवन का पुत्र दधीच है। इसके पिता भगवान् च्यवन पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग लोक में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपनी तपस्या के प्रभाव से इन्द्र की भुजशक्ति को भी स्तम्भित कर दिया है। उनके चरण-कमल सुर-असुरों की मुकुटमणियोँ से अभ्यर्चित हैं। अपने तेज से उन्होंने पुलोमा नामक दैत्य को भस्म कर डाला है। ऐसे पिता के पुत्र इस दधीच की जननी का नाम सुकन्या है जो जगद्विजयी सहस्रों नृपतियों से अनुगत शर्याति की सुता, राजपुत्री एवं त्रिभुवन की कन्याओं में रत्न के समान है। देवी सुकन्या को गर्भिणी जान उसके पिता दसवें महीने में प्रसव के लिए उसे पति के पास से अपने घर ले गए। वहीं उसने चिरंजीवी दधीच को उत्पन्न किया। राजा के घर में राजीवलोचन यह चन्द्रमा के समान बांधवों को आनन्दित करता हुआ समय के साथ बढ़ा। पुत्री सुकन्या अपने पति के घर आने लगी, तब भी नाना ने नेत्र के सुखद और मन बहलाने वाले नाती को नहीं छोड़ा। इसने ननिहाल में ही समस्त विद्याओं और कलाओं की शिक्षा प्राप्त की। समय से इसे जवान देख और 'मेरे समान इसके पिता भी इसके मुखकमल को देखकर आनन्द का अनुभव करें' यह सोच इसके नाना ने किसी-किसी प्रकार पिता के पास भेजा है। उन्हीं सुगृहीतनामा देव शर्याति का आज्ञाकारी विकुक्षि नामक एक तुच्छ भृत्य मुझे समझें। मेरे मालिक ने पिता के पास आते हुए इसके साथ मुझे लगा दिया। वह राजकुल मेरी वंशपरम्परा द्वारा सेवित है। सम्बन्ध के पुराने हो जाने पर उत्तम लोग अपने भृत्य के प्रति कुछ लज्जा का अनुभव करते हैं। महान् लोगों की उदारता का भण्डार कभी नहीं घटता। यहाँ से दो कोस आगे सोन पार भगवान् च्यवन का निवास च्यवनाश्रम है, जो चैत्ररथ नामक कुबेर के उद्यान के सदृश है। हम दोनों की यात्रा वहीं तक है। यदि आप दोनों का हमारे ऊपर क्षणिक सौजन्य है या हृदय में किसी प्रकार की अवज्ञा नहीं, या यह जन प्रसाद को प्राप्त करने योग्य है तो हमारे प्रणय का यह कुतूहल भी उपेक्षा के योग्य नहीं।