भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 90

प्रथम उच्छ्वासः ४५ आप दोनों का वृत्तान्त हम सुनना चाहते हैं । तो कहिए—किस वंश को आपने जन्म लेकर स्पृहणीय बनाया ? आपके समीप यह कौन हैं जो बहुत से विरोधी पदार्थों के समवाय की भाँति लग रही हैं । जैसा कि इनके बाल अन्धकार के समान सन्निहित हैं, फिर भी सूर्य के समान इनकी मूर्ति देदीप्यमान है । पुण्डरीक ( व्याघ्र या श्वेत कमल ) के समान इनका मुख है ( फिर भी ) आँखें हरिण के समान हैं । उगते हुए सूर्य की प्रभा के समान इनका अधर है (फिर भी ) कुमुद के सदृश इनकी मुसकान है। मतवाले हंस के समान इनकी आवाज है ( फिर भी ) इनके पयोधर ( स्तन या मेघ ) उठे हुए हैं। कमल के समान कोमल इनके हाथ हैं ( फिर भी ) हिमालय की चट्टान के समान मोटे इनके नितम्ब हैं। ऊँट के समान इनकी दोनों जाँघ हैं ( फिर भी ) चाल धीमी चलती हैं। कुमारभाव ( बाल्यकाल या कार्तिकेय का भाव ) इन्होंने नहीं छोड़ा है ( फिर भी ) इनकी आँखों के तारक (पुतले या तारकासुर ) स्नेह को व्यंजित कर रहे हैं।' सा त्ववादीत्—'आर्य, श्रोष्यसि कालेन । भूयसो दिवसानत्र स्थातुमभिलषति नौ हृदयम् । अल्पीयांश्चायमध्वा । परिचय एव प्रकटी- करिष्यति । आर्येण न विस्मरणीयोऽयमनुषङ्गदृष्टो जनः' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत् । दधीचस्तु नवाम्भोभरगभीराम्भोधरध्वनिनिभया भारत्या नर्तयन्वनलताभवनभाजो भुजंगभुजः सुधीरमुवाच—'आर्य, करिष्यति प्रसादमार्याराध्यमाना । पश्यामस्तावत्ताम् । उत्तिष्ठ । व्रजामः' इति । तथेति च तेनाभ्यनुज्ञातः शनकैरूथाय कृतनमस्कृतिरुच्चचाल । तुरगारूढं च तं प्रयान्तं सरस्वती सुचिरमुत्तम्भितपक्ष्मणा निश्चलतारकेण लिखिते- नेव चक्षुषा व्यलोकयत् । उत्तीर्य च शोणमचिरेणैव कालेन दधीचः पितुराश्रमपदं जगाम । गते च तस्मिन्सा तामेव दिशमालोकयन्ती सुचिरमतिष्ठत् । कृच्छ्रादिव च संजहार दृशम् । परिचयः संस्तवः । अनुषङ्गः प्रसङ्गः । विवृत्तप्रार्थितयापि सावित्र्या कौतुक- निवृत्तिर्मा भूदित्यात्मस्वरूपं नोक्तम् । अत एवोत्तरत्र तदनुबन्ध एवोक्तः— भूयसो दिवसानित्यादिना । स्वरूपोक्तौ च ज्ञातसरस्वतीकत्वेनापत्यजननकार्यभङ्गो भवेत् । भारती वाक् । भुजङ्गभुजो मयूरान्, भुजग इव भुजावस्येति च । उच्च- चाल गन्तुं प्रवृत्तः । उत्तम्भितान्युत्क्षिप्तनि । सावित्री ने कहा—'आर्य, समय पर सब मालूम हो जायगा। हम दोनों के मन में यहाँ बहुत दिनों तक अभी रहने की इच्छा है। यह रास्ता बहुत थोड़ा है। परिचय बढ़ने से सब बात खुल जायगी । इस बहाने मिले हुए इस जन को आर्य न भूलेंगे।' इतना कह वह चुप हो गयी । जल भर जाने से गम्भीर आवाज वाले नये मेघ की भाँति लता-भवन