भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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प्रथम उच्छ्वासः ४५ इसके अंग के शोभातिशय का साधन है। उन युवतियों की आँखें, चित्त एवं यौवन पुण्य- वान् हैं जिन्होंने इसके दर्शन नहीं किए। मानों दूसरे जन्म का उत्पन्न अधर्म फलित हो गया, जो मैंने क्षण भर इसके दर्शन किए। इस समय क्या करूँ?' यह सोच ही रही थी कि किसी किसी तरह बहुत देर बाद नींद आ गई और क्षण भर सोई रही। सोने पर भी उसी दीर्घलोचन दधीच को देखा। स्वप्न में उसने दूसरी बार दधीच को देखा तो मानों कामदेव ने उसे बड़ी निर्दयता से कान तक खींच कर बाण मारा। जब काम के बाण से घायल सरस्वती को नींद खुली तब उसकी खबर लेने के लिए मानों अरति (वैराग्य) आई। तब वह पुष्पपराग से उज्ज्वल वनलताओं द्वारा ताड़ित न होकर भी वेदना अनुभव करने लगी। मंद मंद हवा से काँपते हुए फूलों की रज उसकी आँखों में न भी पड़ती तो भी वह आँसू बहाती। हंस पक्षियों के पंखों की हवा से फैलते हुए सोन (नदी) के फुहारों द्वारा सिक्त न होने पर भी (पसीने से) तर होने लगी। काले हंसों की जोड़ियों से युक्त वन की कमलिनी की दोलाओं पर न बैठो हुई भी चकराने लगी। विघटित होते हुए जोड़े चक्रवाकों के विरहजन्य निश्वास-धूम से स्पृष्ट न होने पर भी श्यामता (कालिख) को प्राप्त करने लगी। फूल की धूल में लोट पोट करने वाले भौरों से न काटे जाने पर भी वह उद्विग्न होने लगी।

अथ गणरात्रापगमे निवर्तमानस्तेनैव वर्त्मना तं देशं समागत्य तथैव निवारित परिजनश्छत्रधारद्वितीयो विकुक्षिरुद्दँलोके । सरस्वती तु तं दूरादेव संमुखमागच्छन्तं प्रीत्या ससंभ्रममुत्थाय वनमृगीवोद्ग्रीवा विलोकयन्ती मार्गपरिश्रान्तमस्नपयदि्व धवलितदशदिशा दृशा । कृतासनपरिग्रहं तु तं प्रीत्या सावित्री पप्रच्छ—'आर्य, कच्चित्कुशली कुमारः ?' इति । सोऽब्रवीत्—'आयुष्मति, कुशली । स्मरति च भवत्योः । केवलममीषु दिवसेषु तनीयसीमिव तनुं बिभर्ति । अविज्ञायमाननिमित्तां च शून्य- तामिवाधत्ते । अपि च । अन्वक्षमागमिष्यत्येव मालतीति नाम्ना वाणिनी वार्तां वो विज्ञातुम् । उच्छ्वसितं हि सा कुमारस्य' इति । तच्छ्रुत्वा पुनरपि सावित्री समभाषत—'अतिमहानुभावः खलु कुमारो येनैवमवि- ज्ञायमाने क्षणदृष्टेऽपि जने परिचितिमनुबध्नाति । तस्य हि गच्छतो यदृच्छया कथमप्यंशुकमिव मार्गलतासु मानसमस्मासु मुहूर्तमासक्त- मासीत् । अशून्यं हि सौजन्यमाभिजात्येन वः स्वामिसूनोः । अलसः खलु लोको यदेवं सुलभसौहार्दानि येन केनचिन्न क्रीणाति महतां मनांसि । सोऽयमौदार्यातिशयः कोऽपि महात्मनामितरजनदुर्लभो ४ ह० च०