हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० हर्षचरितम् येनोपकरणीकुर्वन्ति त्रिभुवनम्' इति । विकुक्षिस्तूचावचैरालापैः सुचिर- मिव स्थित्वा यथामिलषितं देशमयासीत् । ४४ • गणरात्रं निशाबहुत्वः । तेनैव वर्त्मनेति । अनेन तस्य यदृच्छया तदाश्रयमा- गमनमिति दर्शयति । प्रधानप्रकृतेः स्थवीयसस्तथाविधव्यापारविनियोगाद्यनौचि- त्याद् । अत एव वक्ष्यति — 'यथामिलषितं देशमयासीत्' । हुडोके इत्यनेन निमित्त- परतन्त्रतया संनिकृष्टमेवैनमालुलोकेति प्रदर्शितम् । यदुक्तम् — 'पटुता धाष्ट्रर्यता इङ्गि- ताकारज्ञानं प्रतारणे देशकालज्ञता कार्येषु विषह्यबुद्धित्वं लघ्वी प्रतिपत्तिः सापाया च इति दूतीगुणाः' । भरतमुनिरपि — 'विज्ञानगुणसंपन्ना कथिनी लिङ्गिनी तथा । रङ्गोपजीविनी चापि प्रतिपत्तिविचक्षणा ॥ प्रोत्साहनेककुशलेत्यादिदूतीगुणैर्युता ॥' इति । अत एवागूढश्चाकारतःप्रभृतीत्यादि वक्ष्यते । अन्वक्षं प्रत्यक्षम् । वाणिनी दूती । उच्छ्वसितमित्यनेनातिविस्रम्भवत्ता स्याता । उच्छ्वसितं प्राण इति वा । यदृ- च्छया यथाकथंचित् । यश्च तथागच्छति यस्य निरवधानतया क्वचिदंशुकादि गलति । आभिजात्येन महाकुलीनत्वेनोपकरणीकुर्वन्त्यायततां नयन्ति । उच्चावचैः प्रकृतव- स्वसंस्पर्शिभिः, विचित्रैरिति वा । इस तरह कई रातें गुजर गईं । एक दिन उसी मार्ग से लौटता हुआ विकुक्षि परिजनों को बाहर रोक छत्रवाहक को साथ ले पहुँचा । सरस्वती ने दूर ही से सामने आते हुए उसे देखा और प्रेम से फड़क उठी । वह हिरनी की तरह गर्दन ऊँची उठाकर देखने लगी मानों मार्ग में थके हुए विकुक्षि को दिशाओं को धवलित करने वाली दृष्टि से स्नान कराने लगी । जब वह आकर आसन पर बैठ गया तब सावित्री ने प्रीतिपूर्वक पूछा— 'आर्य, क्या कुमार दधीच कुशल से हैं ?' उसने कहा—'आयुष्मती, कुमार सकुशल हैं । आप दोनों का स्मरण करते हैं । इन दिनों उनका शरीर क्षीण होता जा रहा है । पता नहीं क्यों, शून्य-शून्य से लगते हैं । और भी, मालती नाम की दूती समाचार लेकर सामने आने वाली है । कुमार का उसे प्राण ही समझना ।' यह सुनकर फिर सावित्री बोली—'कुमार सचमुच बड़े ही महानुभाव हैं, जो अज्ञातजन में भी क्षण भर की देखा- देखी में ही अपना परिचय-सम्बन्ध जोड़ रहे हैं । वे जाने लगे तो उनका मन हम लोगों में क्षण भर इस तरह लग गया जैसे मार्ग की लताओं में अंशुक फँस जाता है । आपके स्वामिपुत्र दधीच में कुलीनता के साथ सौजन्य भी है । दुनिया वाले बड़े आलसी होते हैं जो सुलभ सौहार्द वाले महापुरुषों के मन को जिस किसी वस्तु से खरीदते नहीं । महापुरुषों में ही इस तरह बढ़कर उदारता होती है जो इतर लोगों में नहीं होती और जिससे वे लोग त्रिभुवन को अपने वश में कर लेते हैं ।' विकुक्षि भी लम्बी बातचीत करके अपने अभिलषित देश की ओर चला गया ।