हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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॥ श्रीः ॥ विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला ३६ महाकविबाणभट्टविरचितं हर्षचरितम् श्रीशङ्करकविरचित 'सङ्केत' व्याख्योपेतम् हिन्दीव्याख्याकारः पं० श्रीजगन्नाथपाठकः साहित्याचार्यः बिहारप्रान्तीयवैद्यनाथधामगुरुकुलप्राध्यापकः चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-१ मूल्यं ६) [ ई० १६४६
प्रकाशक— चौखम्बा विद्याभवन, चौक, वाराणसी-१ ( सर्वेऽधिकाराः प्रकाशकाधीनाः ) Chowkhamba Vidya Bhawan Chowk, Varanasi-1 मुद्रकः— विद्याविलास प्रेस, वाराणसी-१
भूमिका
महाकवि बाण
संस्कृत-साहित्य में महाकवि कालिदास की पद्य-रचना जितनी उत्कृष्ट और सरस है उतनी ही महाकवि बाण की गद्य-रचना महत्त्वशाली है । बाण ने अपनी गद्य-रचना का जो परिष्कृत और परिमार्जित रूप प्रस्तुत किया है वहीं आगे चल कर साहित्य के अन्य गद्य-कवियों के लिए आदर्श बन गया । संस्कृत में गद्य-साहित्य की यों ही कमी समझी जाती है और बाण जैसे कवि ने आकर मानों अपने पहले और आगे के समस्त अभाव की पूर्ति स्वयं कर ली । हर्षचरित बाण की प्रथम रचना है जो गद्य की उत्कृष्ट शैली के कादम्बरी में होने वाले साक्षात्कार की प्रस्तावना है । इससे यह नहीं कहा जा सकता कि कादम्बरी के संतुलन में हर्षचरित एकदम नहीं आ सकता, बल्कि बाण की चित्रग्राहिणी प्रतिभा का निखार अपेक्षाकृत हर्षचरित से कादम्बरी में अधिक पाया जाता है । हर्ष- चरित में बाण की महती साधना अभिलक्षित होती है । वही साधना कादम्बरी के रूप में फल के समान उद्भूत हुई है । जैसे कोई योगी सिद्धिप्राप्ति के उद्देश्य से साधना में स्थिर हो जाता है उसे साधक कहते हैं और जब उसकी साधना फलित हो जाती है तब वह सिद्ध की आख्या ग्रहण करता है उसी प्रकार हर्षचरित में बाण साधक हैं और कादम्बरी में सिद्ध । बाण के दोनों ग्रन्थ साहित्य और कला की दृष्टि से सर्वांगपूर्ण हैं । विशेषरूप से हर्षचरित पर बाण की युगीन संस्कृति का प्रभाव अधिक है । अतः ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से हर्षचरित संस्कृत-साहित्य का सर्वाधिक मूल्यवान् ग्रन्थ है ऐसा विद्वानों का कथन है । हर्षचरित हमें बाण की आत्मकथा से भी बहुत अंशों में परिचित कराता है । बाण ने हर्षचरित के प्रसंग में आत्म-चरित को सन्नद्ध करके साहित्यिक जगत् का बड़ा ही उपकार किया है । बाण के साहित्य का अध्ययन करते हुए हमारी आँखों के सामने बाण का स्वाभिमानी और मस्ताना व्यक्तित्व नाचने लगता है । हम उसी के आधार पर बाण की प्रत्येक सूक्ष्मेक्षिका को आसानी से आँक लेने में समर्थ होते हैं । संस्कृत-साहित्य के अध्ययनशील लोगों के मन में आचार्यों और कवियों की निजी जीवन-सम्बन्धी घटनाओं के न मिलने के कारण बड़ी उत्सुकता रह ही जाती है
और जब यह बात मन में आती है कि कभी भी हमें तत्तत् कवियों और आचार्यों के जीवन के सम्बन्ध में जानने का सौभाग्य नहीं प्राप्त होगा तब वही उत्सुकता एक गहरी निराशा के रूप में बदल जाती है। सौभाग्य से बाण के सम्बन्ध में हम ऐसा नहीं सोच सकते क्योंकि उन्होंने हर्षचरित के आरम्भिक दो-तीन उच्छ्वासों में अपने अल्हड़ जीवन की मौलिक घटनाओं का उल्लेख वंशानुकीर्तन की भूमिका में क्रम से प्रस्तुत कर दिया है। बाण का स्थितिकाल निःसन्देह रूप से सप्तम शती का पूर्वार्ध (६०६-६४८ ई०) है। हर्ष का समय निश्चित होने के कारण इस सम्बन्ध में कोई ऐतिहासिक वैमत्य नहीं है।
बाण का वात्स्यायन वंश
बाण ने हर्षचरित के आरम्भ में अपनी आत्मकथा के साथ-साथ अपने कुल का भी पौराणिक शैली में उद्भव बताया है। बाण के जीवन से परिचित होने के लिए यह सामग्री बड़ी सहायक है। एक बार भगवान् ब्रह्मा इन्द्र आदि देवताओं के बीच कमल के आसन पर विराजमान थे। वहाँ मनु, दक्ष, चाक्षुष प्रभृति प्रजापति एवं मुनिगण भी गोष्ठी में ब्रह्म के सम्बन्ध में विचार कर रहें थे। ऋक्, साम, यजु का पाठ भी चल रहा था। वेद के अर्थ के सम्बन्ध में परस्पर विवाद का भी प्रसंग उपस्थित हो जाता था। ऐसे अवसर पर स्वभाव से ही अत्यन्त क्रोधी महामुनि दुर्वासा और उपमन्यु नामक मुनि में विवाद छिड़ गया। क्रोध से अभिभूत दुर्वासा ने सामगान करते हुए स्वर से हीन पाठ कर दिया। दुर्वासा के स्वरहीन सामगान से एकाएक गोष्ठी के समस्त लोग सन्न हो गए और शाप के भय से किसी को कुछ बोलने का साहस न हुआ। भगवान् ब्रह्मा ने भी इस भयावह प्रसंग को टालने का प्रयास किया परन्तु उन्हीं के पार्श्वभाग में चामर लेकर खड़ी सरस्वती दुर्वासा का स्वरहीन पाठ सुन कर हँस पड़ी। सरस्वती को अपने पर हँसते हुए देखकर दुर्वासा क्रोध से तमतमा उठे और उन्होंने शाप देने के लिए हाथ में जल उठा लिया। ब्रह्मा ने जोर से दुर्वासा को फटकारा, अत्रि ने स्वयं मना किया, सरस्वती की सखी सावित्री ने भी क्रोध शान्त करने के लिए प्रार्थना की, फिर भी दुर्वासा ने किसी की न सुनी और शाप दे ही डाला। ब्रह्मलोक को छोड़कर सरस्वती को तब तक अन्यत्र रहना होगा जब तक वह अपने पुत्र का मुख न देख ले। दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होकर सरस्वती ने किसी प्रकार सावित्री के साथ मर्त्यलोक के लिए प्रस्थान किया। स्वर्ग की गंगा के तटमार्ग से होते हुए वह मर्त्यलोक में हिरण्यवाह शोण के समीप उतरी। सरस्वती ने शोण के तट पर ही रहने के लिए आग्रह किया। दोनों ने नदी के तीर पर एक लतामण्डप में निवास किया। शोण में नित्य स्नान और देवार्चन करते हुए कुछ दिन बीत गए।
( ३ ) एक समय दिन जब एक पहर चढ़ गया तब उत्तर की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट सुन पड़ी। कुतूहल से सरस्वती ने लतामण्डप से बाहर निकल कर देखा कि धूल उड़ाता हुआ घोड़ों का समूह चला आ रहा था, जिसके साथ हजारों पैदल युवक चले आ रहे थे। अश्वारोहियों के बीच अट्ठारह वर्ष की आयु के एक सुन्दर युवक को देखा। एक ओर अधिक अवस्था वाला पुरुष भी उसके साथ था। वह युवक दिव्य आकृति वाली दोनों कन्याओं को देखता हुआ कुतूहल से लतामण्डप के समीप आ पहुँचा और घोड़े से उतर गया। साथ के और लोगों को दूर पर ही उसने रोक दिया और उस दूसरे सज्जन के साथ पैदल ही वहाँ आया। सरस्वती के साथ सावित्री ने उसका बनवास के उचित सामग्री से सत्कार किया और उस वृद्ध से पूछा—'यह युवक कहाँ से आया है? इसे · जाना कहाँ है? इसके पिता कौन हैं, माता का क्या नाम है और इसका क्या नाम है?' सावित्री के इस अनुरोध पर उस पुरुष ने कहा—'यह च्यवन का पुत्र दधीच है, इसकी माता राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या है। शर्याति पुत्री को गर्भवती जान कर पति के घर से अपने घर ले गए। वहीं उसने इसे जन्म दिया। अपने ननिहाल में ही यह बढ़ा। जब इसकी माता अपने पति के घर जाने लगी तब नाना ने स्नेह से इसे अपने साथ ही रख लिया। वहीं पर इसने समस्त विद्याओं और कलाओं को सीखा तब किसी प्रकार नाना ने इसे पिता के पास जाने के लिए छोड़ा। मैं उन्हीं शर्याति का निकुक्षि नामक आज्ञाकारी भृत्य हूँ। मुझे इसे पिता के घर पहुँचाने के लिए भेजा गया है। शोण के उस पार भगवान् च्यवन का आश्रम है, हम वहीं जा रहे हैं।' यह कह कर उस पुरुष ने उन दोनों का भी परिचय पूछा। तब सावित्री ने कहा—'आर्य, हम दोनों का यहाँ बहुत दिनों तक रहने का विचार है अतः धीरे-धीरे सब कुछ ज्ञात हो जायगा।' फिर दधीच और वह पुरुष दोनों च्यवनाश्रम की ओर घोड़े पर सवार होकर चल दिए। इधर सरस्वती दधीच के चले जाने पर उस दिशा की ओर ही देर तक आँखें फैलाए बैठी रही, फिर किसी तरह वह दिन बीता। रात में भी दधीच के दर्शन की चिन्ता में ऊभ-चूभ होती रही। इस प्रकार कई रातें बीतीं तो अपने देश की ओर लौटते समय विकुक्षि वहाँ पहुँचा। सावित्री ने दधीच का कुशल पूछा। विकुक्षि ने दधीच की मालती नाम की दूती के आने का समाचार कह कर विदा ली। विकुक्षि के जाने पर अश्वारूढ होकर मालती वहाँ पहुँची। दोनों ने उसका सम्मान किया। मालती कुछ देर तक ठहरी और फिर दधीच को लाने के लिए च्यवनाश्रम गई और दधीच को साथ लेकर लौटी। प्रणय हो जाने पर दधीच सरस्वती के साथ एक वर्ष तक वहीं रह गए। दैवयोग से सरस्वती ने गर्भ धारण किया और समय पर पुत्र पैदा किया। पैदा होते ही सरस्वती ने अपने पुत्र को समस्त वेदों,
शास्त्रों, कलाओं और विद्याओं में प्रवीण हो जाने के लिए वर दिया और दधीच तथा पितामह के आदेश से सावित्री के साथ ब्रह्मलोक चली गई। सरस्वती के चले जाने पर दधीच ने भार्गव वंश में उत्पन्न अपने भाई की अक्षमाला नाम की पत्नी के पास उस सारस्वत पुत्र को पालने के लिए छोड़ कर तपस्या करने के लिए जंगल में प्रस्थान किया। जिस समय सरस्वती ने पुत्र पैदा किया था उसी अवसर पर अक्षमाला के गर्भ से भी पुत्र उत्पन्न हुआ था। अक्षमाला ने दोनों पुत्रों को पाल-पोस कर बड़ा किया। एक का नाम सारस्वत और दूसरे का नाम वत्स था। दोनों में सहोदर भाई जैसा स्नेह था। माता के वरदान से सारस्वत यौवन के आरम्भ में ही समस्त शास्त्रों का पारंगत विद्वान् हो गया। उसने वत्स को भी अपनी सारी विद्या दे दी और उसका विवाह करके प्रीतिकूट नाम का स्थान बनवा दिया तथा पिता दधीच जहाँ तपस्या कर रहे थे वहीं स्वयं दण्ड-चीवर धारण करके चला गया।
वत्स से वंश चला। उसी वंश की परम्परा में बाण का जन्म हुआ। बाण ने वात्स्यायन- वंश की परम्परा भी दी है। वत्स के बाद अनेक वर्ष बीते और बहुत से वात्स्यायन ब्राह्मण उस कुल में क्रमशः उत्पन्न हुए। उसी क्रम में कुबेर नाम का ब्राह्मण उत्पन्न हुआ। उसके चार पुत्र हुए—अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत। पाशुपत के पुत्र का नाम अर्थपति था। अर्थपति ने ग्यारह पुत्रों को उत्पन्न किया जिनके नाम ये हैं—मृगु, हंस, शुचि, कवि, महीदत्त, धर्म, जातवेदस्, चित्रभानु, लक्ष, अहिदत्त और विश्वरूप। चित्रभानु के ही पुत्र बाण थे। बाण की माता का नाम राजदेवी था। बाण के दो पारशव भाई (शूद्र स्त्री से उत्पन्न) थे—चित्रसेन और मित्रसेन, और चार चचेरे भाई थे—गणपति, अधिपति, तारापति और श्यामल।
बाण की आत्मकथा
इस प्रकार बाण ने अपने वात्स्यायनवंश का उद्भव बताते हुए प्राचीन कुलपुरुषों की क्रमबद्ध वंशावली दी है और इसी क्रम में अपनी भी चर्चा की है। कहा जा चुका है कि बाण के पिता का नाम चित्रभानु और माता का नाम राजदेवी था। बालपन में ही उसे माता का वियोग सहना पड़ा और पिता ने मातृस्नेह के साथ उसका पालन किया। वह अपने घर पर ही रह कर बढ़ा। उसके उपनयन आदि संस्कार यथासमय पिता ने किए। जब वह चौदह वर्ष का हुआ तब उसके पिता का भी देहान्त हो गया। उस समय तक उसका समावर्तनसंस्कार और उसके साथ ही विवाह भी हो चुका था। पिता की मृत्यु के बाद दुखी और शोकसंतप्त बाण ने किसी प्रकार अपने घर पर ही रह कर वह समय
( ५ )
काटा। कुछ दिन के बाद जब पितृशोक कुछ कम हुआ तब बाण की स्वतंत्र प्रकृति ने जोर मारा। उसमें वह विनय अब न रहा। अल्हड़पन के कारण बालक बाण में नई-नई वस्तुओं के देखने का कुतूहल बढ़ा। फलतः वह यौवन के आरम्भ होते ही धैर्य को त्याग कर घुमक्कड़ और आवारा बन गया। इसके साथी और सहायक भी बहुत से हो गए। वह उनके साथ देश-देशान्तरों को देखने की इच्छा से अपने पिता-पितामह के वैभव और विद्या की परवाह न करके घर-द्वार छोड़ कर निकल पड़ा। स्वच्छन्द होकर वह इस प्रकार मनमौजी हो गया कि उसकी खिल्ली उड़ने लगी।
अपने उसी उच्छृङ्खल भ्रमण के अवसर में घूम-घूम कर बाण ने अपने युग के जीवन का गहरा अध्ययन किया। वह राजकुलों में पहुँचा जहाँ के व्यवहार अत्यन्त उदार होते थे, गुरुकुल या उस समय के शिक्षासंस्थानों में भी कुछ काल तक रहा, बहुमूल्य बात-चीत करने वाले गुणवान् लोगों की गोष्ठियों में बैठा और विदग्ध जनों के बीच पहुँचा। इस प्रकार युवक बाण को अनुभव के चार स्रोत जीवन के आरम्भ में ही मिल गए। अनुभवी होकर बाण की चंचल प्रकृति बदल गई। वह वात्स्यायन वंश के अनुरूप गम्भीर स्वभाव वाला बन गया। बहुत दिनों तक देश-देशान्तरों का चक्कर काट कर वह फिर अपनी जन्मभूमि प्रीतिकूट को लौटा और अपने बालमित्रों से बड़े स्नेह के साथ मिला।
अपने बन्धु-बान्धवों से मिल कर बाण बड़ा प्रसन्न हुआ। बहुत दिनों तक प्रीतिकूट का ही आनन्द लेता रहा। एक दिन स्थाण्वीश्वर के महाराज श्रीहर्ष के भाई का भेजा हुआ मेखलक नाम का दीर्घाध्वग बाण से आकर गर्मी के दिनों में मिला। उस समय भोजन के पश्चात् बाण अपने घर पर आराम कर रहा था। उसके पारशव भाई (शूद्रा जननी से उत्पन्न) ने भीतर आकर उसके आगमन की सूचना दी। बाण ने कहा—'उसे शीघ्र अन्दर लावो।' तब वह दीर्घाध्वग भीतर जाकर बाण के समीप कुछ हट कर बैठा। बाण के पूछने पर उसने कृष्ण का कुशल-समाचार सुना कर पत्र अर्पित किया। बाण ने पत्र को स्वयं पढ़ा। फिर मेखलक ने मौखिक सन्देश में कृष्ण की ओर से कहा—'मैं तुमसे बिना कारण ही अपने बन्धु की तरह प्रेम करता हूं। तुम्हारी अनुपस्थिति में दुर्जन लोगों ने सम्राट् के कान भर दिए, पर वह सत्य नहीं। किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति ने तुम्हारी बाल-चपलताओं से चिढ़ कर कुछ इधर-उधर की बात कह दी। अन्य लोगों ने भी ठीक वैसा ही समझा और कहने लगे। सम्राट् ने ऐसे मूर्खों की एक-सी बात सुन कर अपना मत स्थिर कर लिया। तुम्हारे विषय में मैंने सम्राट् से निवेदन किया और उन्होंने मेरी बात मान ली। अब अपने घर पर व्यर्थ समय-यापन करना ठीक नहीं, शीघ्र राजकुल में आओ।'
( ६ ) यह सुन कर बाण ने उसी चन्द्रसेन को आज्ञा दी—'मेखलक को ले जाकर भोजना- च्छादन की व्यवस्था कर आराम से ठहराओ ।' तब तक दिन ढल चुका था । बाण संध्यो- पासन से निवृत्त होकर फिर अपने शयनीय पर आ गए और सम्राट् से मिलने के सम्बन्ध में एकाकी सोचने लगे—'क्या करूँ ? महाराज ने मुझे कुछ और ही समझ लिया है, मेरे अकारणबन्धु कृष्ण ने ऐसा संदेश भेजा है, सेवा बहुत कष्टदायिनी है, नौकरी करना मेरे अनुकूल नहीं, राजकुल अतिगम्भीर और विशाल है, न तो मेरे पूर्वजों का राजकुल से सम्बन्ध रहा है जिससे प्रेमभाव बना है, न तो मुझमें कुलक्रमागत क्षमता ही है, न तो पहले राजकुल के द्वारा किए हुए उपकार का स्मरण मुझे आ जाता है, न तो बचपन में राजकुल से ऐसी मदद मिली जिसका स्नेह मान कर चला जाय, न तो बड़े होने का अब तक गौरव मिला है, न पहली मेल-मुलाकात की अनुकूलता है, न तो बुद्धि-सम्बन्धी विषयों में आदान-प्रदान करने का प्रलोभन है, न तो अपनी विद्या के अतिशय प्रदर्शन का कुतूहल है, न तो अपनी सुन्दर आकृति से मिलने वाले आदर की आकांक्षा है, न सेवावृत्ति के अनुरूप चापलूसी करने की कला मुझे आती है, न तो मुझमें वैसी चतुराई है कि विद्वानों की गोष्ठियों में भाग लूँ, न तो धन खर्च करके दूसरों को मुट्ठी में कर लेने की आदत है, और न तो राजा के प्रिय जनों से मेरा परिचय है और कृष्ण के संदेशानुसार जाना भी जरूरी है । त्रिभुवनगुरु भगवान् शंकर वहाँ जाने पर सब भला करेंगे ।' यह सोच कर बाण ने प्रस्थान करने के लिए निश्चय किया । दूसरे दिन प्रातःकाल बाण ने स्नान करके उज्ज्वल दुकूल धारण किया और हाथ में अक्षमाला लेकर प्रस्थानिक सूक्तों और मंत्रपदों को बार-बार दुहराया, फिर देवों के देव भगवान् शङ्कर की साङ्गोपाङ्ग अर्चना की तथा तिल और घृत की आहुतियों से हवन सम्पन्न किया । ब्राह्मणों को दक्षिणा में धन दिया । होमधेनु की परिक्रमा की । शुक्ल अङ्गराग, शुक्ल माल्य, शुक्ल वसन एवं रोचनाचित्रित तथा दूर्वाग्रग्रथित गिरिकर्णिक नामक पुष्प का कर्णपूर और शिखा में सिद्धार्थक आदि माङ्गलिक द्रव्यों से परिष्कृत होकर बाण प्रस्थान के लिये तैयार हो गया । माता के समान स्नेह से आर्द्र हृदय वाली पिता की छोटी बहिन मालती ने बाण के प्रस्थान की माङ्गलिक तैयारी की । गाँव की बांधव-वृद्धाओं ने आशीर्वाद दिए, परिजनों की बूढ़ी स्त्रियों ने बाण का अभिनन्दन किया, पूजितचरण गुरुओं ने बाण के प्रस्थान का समर्थन किया, कुलवृद्धों ने उसका सिर सूँघा, शुभ शकुनों से उसका उत्साह और भी बढ़ा, ज्योतिषियों ने नक्षत्र की गणना की, फिर शोभन मुहूर्त में जल से पूर्ण कलश की ओर दृष्टिपात करते हुए कुलदेवताओं को प्रणाम कर बाण प्रीतिकूट से निकल पड़ा ।
( ७ ) पहले दिन गर्मी में किसी प्रकार धीरे-धीरे चण्डिकायतन-कानन पार कर वह मल्लकूल नामक गाँव में गया। वहाँ बाण का भाई और हार्दिक मित्र जगत्पति रहता था, उसने बाण का सत्कार किया। बाण उस दिन वहीं सुख-पूर्वक ठहरा। दूसरे दिन गङ्गा पार करके यष्टिगृहक नाम के बनगाँव में रात बिताई। फिर राप्ती (अजिरवती) के किनारे मणितारा नामक गाँव के पास हर्ष के स्कन्धावार (छावनी) में पहुँचा। जो राज-भवन के सन्निकट ही था। स्कन्धावार में स्नान, भोजन और विश्राम के पश्चात् जब एक पहर दिन बाकी था और जब हर्ष भी भोजन आदि से निवृत्त हो चुके थे तब वह मेखलक के साथ राजद्वार के लिए चल पड़ा। मार्ग में प्रख्यात राजाओं के अनेक शिविर-सन्निवेश मिले। राजद्वार पर सम्राट् के दर्शन के लिए नाना देशों से सामन्तगण पधारे हुए थे। झुण्ड के झुण्ड हाथी, घोड़े और ऊँट खड़े थे और हजारों आतपत्रों से वहाँ श्वेतद्वीप का दृश्य था। सब लोग राजद्वार के राजकीय अनुयायियों से यह पूछते हुए नहीं थकते थे कि बाह्य कक्षा में उपस्थित होकर सम्राट् कब दर्शन देंगे ? एक ओर एकान्त में बौद्ध, जैन, पाशुपत, संन्यासी, वर्णी सम्प्रदायों के साधु, सब देशों के लोग, समुद्री तटों के निवासी, म्लेच्छ और समस्त द्वीपों से संवाद लेकर लौटे हुए दूत एकत्र थे। राजद्वार के इस दृश्य को देखकर बाण के मन में आश्चर्य हुआ। द्वारपालों ने मेखलक को दूर ही से पहचान लिया। 'क्षण भर आप यहीं ठहरें' बाण से यह कह कर मेखलक बेरोक भीतर चला गया। थोड़ी देर बाद वह महाप्रतीहारों के प्रधान दौवारिक पारियात्र के साथ वापस आया। मेखलक द्वारा परिचित होकर पारियात्र ने बाण को प्रणाम किया और विनयपूर्वक कहा—'देव के दर्शन के लिए भीतर पधारिए, आप पर देव की प्रसन्नता है।' बाण ने 'मैं धन्य हूँ, जो देव मुझे इस प्रकार अपने अनुग्रह का पात्र समझते हैं' यह कहते हुए उसके साथ भीतर प्रवेश किया। तब बाण ने वनायु, आरट्ट, कम्बोज, भरद्वाज, सिन्ध और पारस देश के राजवल्लभ अश्वों से भरी हुई मन्दुरा देखी। कुछ दूर हट कर बाईं ओर इभधिष्ण्यागार या हाथियों का लम्बा- चौड़ा बाड़ा मिला। वहाँ बाण ने सम्राट् के मुख्य हाथी दर्पशात को देखा। उसे देखकर बाण बहुत आश्चर्यित हुआ और सोचने लगा—निश्चय ही इस महागज के निर्माण में बड़े- बड़े पर्वत परमाणु बनाए गए होंगे, नहीं तो यह गौरव कहाँ से इसमें आता ? इस प्रकार फिर तीन कक्ष्याओं को पार कर बाण ने मुक्तास्थानमण्डप के सामने वाले आँगन में सम्राट् हर्ष के दर्शन किए। तब सम्राट् के सामने आकर बाण ने दाहिना हाथ उठा कर 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण
( ८ ) किया। हर्ष ने उसे देख कर दौवारिक से पूछा—'यह वही बाण है ?' दौवारिक ने कहा— 'देव का कथन सत्य है, वह यही बाण है।' इस पर हर्ष ने कहा—'मैं इसे तब तक नहीं देखना चाहता जब तक यह मेरा प्रसाद प्राप्त न कर ले।' यह कह कर उन्होंने अपने पीछे- बैठे हुए मालवराज के पुत्र (माधवगुप्त ? ) से कहा—'यह भारी भुजङ्ग (आवारा) है।' बाण राजा के अभिप्राय को नहीं समझ सका। सारी राज-मण्डली में सन्नाटा छा गया। बाण कुछ देर तक चुप रह कर बोला—'आप इस प्रकार की बात कैसे कहते हैं? जैसे आपको मेरे विषय में सच्ची बात का पता न हो या मेरा विश्वास न हो, या आपकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, अथवा आप स्वयं लोक के वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों के स्वभाव और फैली हुई बात मनमानी और तरह-तरह की होती है। किन्तु श्रेष्ठ लोगों को ठीक-ठीक देखना चाहिए। मुझे साधारण समझ कर अनाप-शनाप कल्पना न कीजिए। मैं सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के वंश में जन्मा हूँ। समय से मेरे यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं। मैंने अङ्गों के साथ वेद का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है। अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी श्रवण मैंने किया है। विवाह के क्षण से लेकर मैं नियमित गृहस्थ हूँ। तो मुझमें क्या भुजङ्गपना है? मेरी नई अवस्था की कुछ चपलताएँ अवश्य हैं पर वे ऐसी नहीं जिससे इस लोक या परलोक का कोई विरोध हो। मैं इस बात को इनकार नहीं करता। मेरे हृदय में इसी बात का बहुत पश्चात्ताप है। हे देव, आप भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान वर्णाश्रममर्यादा के रक्षक और यम के समान दण्डधर हैं। सातों समुद्रों की करधनी और समस्त द्वीपों की माला से विराजित पृथिवी पर आपका एकच्छत्र शासन है, तो कौन ऐसा निडर है जो सब प्रकार से दुःखद अभिनय करने की मन से भी कल्पना करता है ?......समय से स्वयं आप मेरे विषय में सब कुछ जान लेंगे, क्योंकि बुद्धिमानों का यह स्वभाव होता है कि वे किसी बात में विपरीत हठ नहीं रखते।' इतना कह कर बाण चुप हो गया। सम्राट् ने भी 'मैंने ऐसा ही सुना था' बस इतना ही कहा। लेकिन बातचीत और आसन-दान आदि के प्रसाद से उसे अनुगृहीत नहीं किया। केवल स्नेह से भरे अमृत की वर्षा करने वाले दृष्टिपातमात्र से उसको नहलाते हुए उन्होंने अपने अन्तरतम की प्रीति प्रकट की। जब सूर्य अस्त होने लगा तो सम्राट् राजसमूह से विदा लेकर महल के अन्दर चले गए। बाण वहाँ से निकल कर अपने निवास-स्थान स्कन्धावार में लौट आया। तब वह अपने मन में सोचने लगा—'सचमुच देव हर्ष बड़े उदार हैं, क्योंकि मेरे बाल्यकाल की चपलताओं से फैले हुए जनापवाद को सुनकर कुपित होने पर भी मन में मेरे प्रति स्नेह
( ६ ) अवश्य रखते हैं। मैं उनकी आँखों पर चढ़ा हुआ ( अक्षिगत, अर्थात् कोपभाजन ) होता तो कैसे दर्शन देने की कृपा करते । वह मुझे गुणी देखना चाहते हैं। बड़ों की यही रीति है कि छोटों को बिना मुख से कहे ही केवल व्यवहार से विनय सिखा देते हैं। मुझे धिक्कार है यदि अपने ही दोषों से अन्धा होकर और केवल अनादर से दुःखी होकर मैं ऐसे गुणवान् राजा के विषय में कुछ सोचने लगूँ। अब मैं सर्वथा वही करूँगा जिससे समय से वे ठीक मुझे पहचान लें।' बाण ने ऐसा निश्चय किया और दूसरे दिन प्रातःकाल वह स्कन्धावार से निकल कर मित्रों और रिश्तेदारों के घर में ठहरा। तब तक सम्राट् स्वयं उसके स्वभाव से परिचित होकर उस पर प्रसन्न हो गए और फिर वह राजभवन में आकर जम गया। थोड़े ही दिनों में सम्राट् उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसे अपने प्रसादजनित सम्मान, प्रेम, विश्वास, धन-सम्पत्ति, परिहास और प्रभाव की पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया। इस प्रकार बाण सम्राट् हर्ष से पर्याप्त सम्मान पाकर किसी समय शरत्काल के आरम्भ में बन्धुओं को देखने की उत्कण्ठा से अपनी जन्म-भूमि प्रीतिकूट आया। बाण के भाई- बन्धु उसकी प्रशंसा करते हुए उसके स्वागत में निकल पड़े। सबसे मिलकर बाण बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सबसे पूछा—'आप लोग सुखपूर्वक तो रहे ? यज्ञ का कार्य चल रहा है ? प्रतिदिन वेदाभ्यास तो अविच्छिन्न है न ? व्याकरण के सम्बन्ध में शास्त्रार्थ तो होते रहते हैं ? काव्य की चर्चा तो बराबर रहती है ?' तब उन्होंने उससे कहा—'हम लोग सर्वथा कुशल से हैं। अपनी शक्ति और विभव के अनुसार समय से सब लोग ब्राह्मण के उचित क्रिया-कलाप करते हैं। जब तुम परमेश्वर महाराज हर्ष के पार्श्वभाग में वेत्रासन पर स्थित हो तो विशेष रूप से हम लोग प्रसन्न हैं।' इस प्रकार की अनेक बातों से मन बहलाता हुआ बाण उनके साथ देर तक ठहरा। मध्याह्न में उठ कर वह स्नानादि से निवृत्त हुआ। भोजन के पश्चात् जब वह बैठा तो सब के सब जुट आए और उसे घेर कर बैठ गए। इसी बीच सुदृष्टि नामक बाण का पुस्तक-वाचक आ गया और उसके कुछ दूर पर रखी हुई वेत्रपीठिका पर बैठ गया। क्षणभर ठहर कर तत्काल उसने सूत की बेठन खोल दी। पुस्तक को उसने सरकंडों के बने पीढ़े पर रख दिया। पीछे समीप में बैठे हुए मधुकर और पारावत नामक वंशी बजाने वाले बाण के दो मित्रों ने जब अवकाश दिया, तब सुदृष्टि वायुपुराण का पाठ करने लगा। जब सुदृष्टि वायुपुराण का पाठ कर रहा था, उसी समय सूचीबाण नामक बन्दी ने दो आर्याछन्दों का गान किया। उसने कहा कि वायु-पुराण हर्ष के चरित से अभिज्ञ प्रतीत
( १० ) होता है । आर्याओं को सुन कर बाण के चार चचेरे भाइयों—गणपति, अधिपति, तारापति और श्यामल ने एक दूसरे की ओर देखा । तत्पश्चात् उन चारों में सबसे छोटा बाण का अत्यन्त प्रिय श्यामल बोला—'तात बाण, प्रातःस्मरणीय, पुण्यों के राशि देव हर्ष का चरित पूर्वपुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हम सुनना चाहते हैं । बहुत दिनों से हम लोगों की यह इच्छा बनी हुई है । अतः आप कहें । यह भार्गववंश पुण्यवान् राजर्षि के पवित्र चरित्र को सुनकर और पवित्र बन जाय ।' बाण ने हँस कर अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए दूसरे दिन हर्षचरित का वर्णन आरम्भ करने के लिए निश्चय किया और संध्योपासन के लिए शोण के तीर पर चले गए । इस प्रकार बाण ने दूसरे दिन हर्ष के पूर्व-पुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हर्षचरित का वर्णन आरम्भ किया । बाण के जीवन के सम्बन्ध में इसके अतिरिक्त कोई वृत्तान्त उपलब्ध नहीं होता । हर्षचरित के अतिरिक्त बाण की दूसरी कृति कादम्बरी है । कादम्बरी संस्कृत गद्य- साहित्य के चरम-उत्कर्ष का एक उज्ज्वल उदाहरण है । कादम्बरी के आरम्भ में भी बाण ने संक्षेप में अपनी वंशपरम्परा दी है। कादम्बरी की वंशपरम्परा में कुबेर के बाद अर्थपति का उल्लेख आता है । बीच में पाशुपत का नाम छूट गया है । हर्ष की मृत्यु के पश्चात् बाण कन्नौज से प्रीतिकूट लौट आए । वहीं इन्होंने अपने दोनों ग्रन्थों को लिखा । हर्षचरित से हर्ष के जीवनवृत्त के सम्बन्ध की आकांक्षा की पर्याप्त मात्रा में पूर्ति , नहीं होती । बाण जैसे ग्रन्थ को पूरा लिखने में उदासीन हो गए । कादम्बरी को भी वे अपूर्ण छोड़ गए । सौभाग्य से उनके सुयोग्य पुत्र ने उसे पूरा किया । कुछ लोग उनके पुत्र का नाम भूषणबाण या भूषणभट्ट बतलाते हैं । कादम्बरी की कुछ हस्तलिखित प्रतियों में 'पुलिन' या पुलिन्द नाम मिलता है । धनपाल की तिलकमञ्जरी में श्लेष से पुलिन्द ही का उल्लेख है— केवलोऽपि स्फुरन्बाणः करोति विमदान् कवीन् । किं पुनः क्लृप्तसन्धानं पुलिन्दकृतसन्निधिः ॥ ( ति. म. २६ श्लोक ) बाण के समकालीन कवियों में मातंगदिवाकर और मयूर का उल्लेख आता है । अनुश्रुति के अनुसार मयूर जिन्होंने सूर्यशतक का निर्माण किया है, बाण के श्यालक बताए जाते हैं । बाण ने अपने विवाह का उल्लेख सम्राट् हर्ष से मिलने के प्रसंग में ही किया है—'दारपरिग्रहादम्यागारिकोऽस्मि ।' इसके अतिरिक्त उनके वैवाहिक जीवन के सम्बन्ध में कोई प्रामाणिक तथ्य प्राप्त नहीं है ।
( ११ ) बाण की रचनाएँ बाण की प्रामाणिक रचनाओं में हर्षचरित और कादम्बरी के अतिरिक्त कोई दूसरी नहीं है। यों तो उनके नाम पर कई अन्य रचनाओं का भी उल्लेख आता है। चण्डीशतक बाण का निर्मित समझा जाता है। इसमें १०० श्लोकों में बाण ने भगवती दुर्गा की स्तुति की है। पार्वती-परिणय नाटक को भी कुछ लोगों ने बाण ही का निर्माण समझा था। परन्तु कीथ ने स्पष्ट कर दिया कि यह नाटक १५ वीं शताब्दी के कवि वामनभट्ट बाण की रचना है। वामनभट्ट बाण तैलंगदेशीय वत्सगोत्री ब्राह्मण थे। नलचम्पू के टीकाकार चण्डपाल और गुणविनयगणि के अनुसार बाण ने मुकुटताड़ितक नाटक की भी रचना की थी, पर यह ग्रन्थ अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है। जहाँ तक बाण की शैली और कल्पना का क्षेत्र है उसकी भूमिका में बाण के हर्षचरित और कादम्बरी के अतिरिक्त ये अन्य कृतियाँ किसी अंश में भी संगत नहीं बैठतीं। अतः प्रामाणिक तथ्य के अभाव में यह मान लेना ही ठीक है कि इन दोनों के अतिरिक्त बाण की कोई अन्य रचना नहीं है। हर्षचरित हर्षचरित एक आख्यायिका है। बाण ने ग्रन्थ के आरम्भ में स्वयं कहा है—'करोम्य- ख्यायिकाम्भोथौ जिह्वाप्लवनचापलम्' (श्लोक २०)। आचार्यों ने आख्यायिका का जो स्वरूप निर्धारित किया है उसका समन्वय विशेष रूप से हर्षचरित में मिल जाता है। प्रसंगतः हम कथा और आख्यायिका के भेद की चर्चा करेंगे। हर्षचरित एक ऐतिहासिक काव्य है। यह कहा जा सकता है कि संस्कृत-साहित्य में ऐतिहासिक काव्य लिखने का शुभारम्भ बाण के द्वारा ही हुआ। प्राचीन कवि ऐतिहासिक पुरुषों के चरित को लेकर काव्य का निर्माण करने में सम्भवतः अपनी हीनता समझते थे। सामान्य व्यक्ति को काव्य का नायक बनाकर लिखना उनके विचार में शोभन न था। बाण ने हर्षचरित लिख कर इस कलंक को मिटाने का प्रथम प्रयास किया। आगे चलकर कई ऐतिहासिक पुरुषों के जीवनवृत्त पर कवियों ने अनेक चरित-काव्य लिखे। हर्षचरित आठ उच्छ्वासों में विभक्त है। प्रथम सवा दो उच्छ्वासों में बाण ने आत्मकथा लिखी है और शेष में सम्राट् हर्षवर्धन का चरित है। आरम्भ हर्ष के वंश-प्रवर्तक पुष्पभूति के वर्णन से किया गया है। हर्ष के पिता का नाम प्रभाकरवर्धन और माता का यशोवती था। उनके बड़े भाई का नाम राज्यवर्धन था। राज्यवर्धन का जन्म ५८८ ई० में हुआ। दो वर्ष के बाद
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हर्ष उत्पन्न हुए तथा तीन वर्ष के बाद राज्यश्री का जन्म हुआ। राज्यश्री का विवाह ग्रहवर्मा से हुआ। ग्रहवर्मा मौखरि क्षत्रिय एवं अवन्तिवर्मा का पुत्र था। हूणों द्वारा राज्य के उत्तर में आक्रमण किए जाने पर राज्यवर्धन एक बड़ी सेना लेकर उन्हें रोकने के लिए गए। राज्यवर्धन लौटे न थे कि इधर प्रभाकरवर्धन का देहान्त हो गया। हर्ष की माता यशोवती पति की मृत्यु होने से पूर्व ही चिता में बैठ कर सती हो गई। इधर मालवा के राजा ने कन्नौज पर आक्रमण कर दिया। ग्रहवर्मा को मार कर राज्यश्री मालवाधिप के कैद में आ गई । राज्यवर्धन ने हर्ष को राज्य का भार देकर शत्रु के विरुद्ध प्रयाण किया। उन्होंने मालवराज को परास्त कर दिया, परन्तु उसके सहायक गौडाधिप ने धोखे से उन्हें मार डाला। हर्ष को बड़े भाई की असामयिक मृत्यु से बहुत क्षोभ हुआ। प्रतिशोध के लिये उन्होंने प्रस्थान किया। मार्ग में उन्हें दिवाकरमित्र नामक बौद्ध भिक्षु द्वारा अपनी बहन राज्यश्री का पता लगा जो बन्दीगृह से छूट कर विन्ध्याटवी में भाग निकली थी। राज्यश्री के मिलने के बाद हर्षचरित समाप्त हो जाता है। इस प्रकार यह एक ऐतिहासिक तथ्य बाण की रचना में अलंकृत काव्यमय शैली में आया है। जगह-जगह पर अलौकिक पात्रों और पौराणिक कथाओं का भी उपयोग किया गया है। किसी घटना के तिथिक्रम का उल्लेख नहीं है। कुछ ऐतिहासिक पात्रों के नाम का भी उल्लेख नहीं है। राज्यवर्धन को मारने वाले गौडाधिप का हर्षचरित में नामोल्लेख नहीं किया है। इन कारणों से हर्षचरित के ऐतिहासिक महत्त्व के कम होने पर भी हर्ष के समकालीन युग की सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के अध्ययन के लिए हर्षचरित से बढ़ कर कोई दूसरा सहायक ग्रन्थ नहीं है। किसी का कहना कि 'हर्षचरित सभ्यता का विश्वकोश है' किसी अंश में अत्युक्ति नहीं। समकालीन संस्थाओं का चित्र इस तरह हर्षचरित में निखर उठा है। हर्षचरित को अजन्ता के कलामण्डप से सन्तुलित करना भी सर्वोशतः ठीक है। ह्वेनसांग के संस्मरणों और हर्षचरित के घटना- क्रमों का ठीक-ठीक मेल हो जाने से हर्षचरित के महत्त्व का पता चलता है। इसके अतिरिक्त संस्कृत-साहित्य के इतिहास की दृष्टि से भी हर्षचरित का महत्त्व है। आरम्भ में बाण ने महाभारत, वासवदत्ता एवं बृहत्कथा नामक ग्रन्थों की तथा भास, कालिदास, प्रवरसेन, भट्टार हरिचन्द्र एवं आढ्यराज नामक कवियों की प्रशंसा की है। बाण के स्थिति- काल का निश्चय हो जाने से अन्य कवियों के स्थितिकाल के निर्णय में बड़ी सहायता मिलती है। हर्षचरित बाण की प्रथम रचना है। यद्यपि भाषा और भाव की दृष्टि से कादम्बरी
की तरह प्रौढ़ता हर्षचरित में नहीं, तथापि इन दोनों की अभिव्यक्ति-सामर्थ्य में अपूर्णता भी कोई अभिलक्षित नहीं होती। बाण की स्फुरत्कलालापविलासकोमला कविता-नववधू कादम्बरी में जो कौतुकाधिक राग उत्पन्न करती है, हर्षचरित में विवाह की योग्यता होने पर भी अविवाहिता होने के कारण अज्ञातयौवना-सी लगती है। सम्भव है इसी कारण वह कादम्बरी की तरह सहृदय-जनों में कौतुकाधिक राग उत्पन्न न कर सकी हो। स्थान-स्थान पर बाण की अद्भुत वर्णनशक्ति का पूर्वाभास हर्षचरित में मिल जाता है।
पात्रालोचन
[ अब यहाँ संक्षेप में हर्षचरित के पात्रों के सम्बन्ध में जानना आवश्यक है। मुख्य पात्र के रूप में सरस्वती, सावित्री, बाण, पुष्पभूति, भैरवाचार्य, प्रभाकरवर्धन, यशोवती, राज्यवर्धन, हर्षवर्धन तथा राज्यश्री के चरित्र हर्षचरित में निर्दिष्ट हैं। अतः उन्हीं के सम्बन्ध में अग्रिम वक्तव्य है ]
सरस्वती और सावित्री—सरस्वती वाणी की अधिष्ठात्री देवी और ब्रह्माजी की कुमारी कन्या थी। विद्या की देवी होने के कारण और बालभाव की चपलता से अंशतः उसमें कुछ अभिमान की मात्रा भी थी। दुर्वासा के स्वरहीन सामगान पर वह हँस पड़ी जिससे उस क्रोधान्ध ऋषि के शाप से ग्रस्त हुई। दुर्वासा ने उसकी विद्याजनित उन्नति को चूर करने के लिए नीचे मर्त्यलोक में चले जाने का शाप दे डाला। परन्तु सरस्वती ने ऋषि के शाप को शिर झुका कर मान लिया। उसकी प्रिय सखी सावित्री ऋषि के इस अन्याय को न सह सकी और स्वयं प्रतिशाप देने के लिए उद्यत हो गई। तब सरस्वती ने उसे रोका और कहा—'सखी, तू अपना क्रोध शान्त कर, संस्कारशून्य बुद्धि होने पर भी ब्राह्मण सर्वथा आदरणीय है।' सरस्वती की इस वाणी में उसकी अपार सहिष्णुता निहित है। वह निरपराध होने पर भी कुछ नहीं बोलती और सावित्री को साथ लेकर मर्त्यलोक के लिए ब्रह्मलोक से प्रस्थान कर देती है। ब्रह्मा जी ने उसके शाप को पुत्र का मुख देखने की अवधि दी। सावित्री ने उसे बहुत ढाढस दिया और वे दोनों शोण के तट पर निवास करने लगीं। वहीं पहुँचे हुए दधीच से सरस्वती का प्रणय हो गया। सरस्वती की अपेक्षा सावित्री अधिक प्रगल्भ थी। सरस्वती मुग्धा और सावित्री प्रगल्भा थी। दधीच के प्रथम दर्शन से आकृष्टहोने पर भी सरस्वती ने अपना प्रणय-भाव बिलकुल छिपाए रखा। उसके चले जाने पर शून्य-शून्य सी रहने लगी। जब दधीच का कुशल-समाचार लेकर मालती आई तब एकान्त में सरस्वती ने दधीच के प्रति अपना अनुराग व्यक्त किया। दधीच को लाने के लिए मालती के चले जाने पर उसने सावित्री से यह रहस्य प्रकट कर दिया। इस
( १४ ) प्रकार सरस्वती एक सहिष्णु, लज्जाशील नारी के रूप में चित्रित है और सावित्री का चित्रण एक संवेदनशील नारी के रूप में हुआ है। बाण—हर्षचरित के रचयिता बाण भी एक मुख्य पात्र हैं। मानना तो यह चाहिए कि हर्षचरित दो विभागों में विभक्त आख्यायिका है। प्रथम भाग के मुख्य पात्र स्वयं महाकवि बाण हैं और द्वितीय भाग के सम्राट् हर्षवर्धन । बाण ने अपने चरित्र का जितनी धार्मिकता और स्पष्टता से चित्रण किया है उतना शायद ही हर्ष के चित्रण में हो। यद्यपि यह बात नहीं फिर भी कवि ने अपना दोष और गुण सब एक तटस्थ पर्यवेक्षक के नाते कह डाला है। बाण की तटस्थता इसी से व्यक्त होती है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में 'उत्तम पुरुष' के स्थान पर अन्य पुरुष का ही प्रयोग किया है। 'मैं उत्पन्न हुआ' के स्थान पर 'बाण उत्पन्न हुआ, बढ़ा और यौवन के आरम्भ में आवारा (इत्वर) बन गया' आदि साधारण पात्र के रूप में ही बाण ने अपने को रखा है। सम्भव था अगर उत्तम पुरुष 'मैं' का प्रयोग करते तो अपने दोष-पक्ष के उल्लेख में इतनी स्पष्टता न होती। छोटी अवस्था में ही बाण की माता मर गई। पिता ने ही किसी प्रकार पाल-पोस कर बढ़ाया। दुर्भाग्य से जब बाण चौदह वर्ष का हुआ तभी उसके पिता भी दिवंगत हो गए। अब मातृ-पितृहीन बाण को सुधारने वाला कोई नहीं मिला। मिले वही नाचने-गाने के शौकीन संगी-साथी। उनके साथ रहने से बाण की स्वतन्त्रता बढ़ती गई और फलतः यौवन के आरम्भ में ही वह आवारा (इत्वर) हो गया। इन्हीं साथियों के साथ यहाँ-वहाँ मारा-मारा फिरने लगा। कभी किसी नगर में जाकर नाटक खेलता, कभी किसी नगर में। इस इत्वरवृत्ति ने यद्यपि बाण को पितृ-पितामह द्वारा अर्जित विभव एवं अविच्छिन्न विद्या-प्रसंग से वंचित कर दिया तथापि बाण ने अपने उसी भ्रमणशील जीवन में, जब उसकी लोग खिल्ली उड़ा रहे थे, अनुभव के चार स्रोत पकड़ लिए थे। उसके अनुभव के प्रथम स्रोत राजकुल थे, उनमें घूम-घूम कर वह उनके प्रत्येक कर्मचारी से मिलता और वहाँ के उदार व्यवहारों से परिचित होता। दूसरा स्रोत उस समय के गुरुकुल थे, वहाँ जा-जा कर अध्ययन-अध्यापन की विधियों को उसने खूब समझ लिया। तीसरा स्रोत गुणी जनों की गोष्ठियाँ मिलीं, जिनमें उसने अनमोल बातें सुनीं। चौथा स्रोत सूझ-बूझ वाले विदग्ध जनों की मंडलियाँ थीं, उसने उनमें भीतर घुस कर थाह ली। इस प्रकार वह अपने जीवन के अल्हड़पन और घुमक्कड़ी प्रवृत्ति से अपनी आँखों देखा हुआ लोकजीवन का चौचक अनुभव पाकर अपने घर वापस आया। तब उसके अन्दर जो पुस्तैनी प्रतिभा थी वह चमक उठी। बाण स्वभावतः अपने भाई-बन्धुओं में हिल-मिल जाता था। उसे अपने गाँव में अपने लोगों के बीच मोक्ष का आनन्द मिलता था। वह सम्राट् के पास से भी उस आनन्द के
( १५ ) लिए चला आता था। अपनी इस प्रकृति से बाण बहुत अधिक जनप्रिय हो गया था। उसमें नम्रता भी खूब थी। अपने बड़ों के सामने झुक जाता था। उसने अपनी आरम्भिक जीवन की समस्त बुराइयों को जड़ से खोद कर निकाल दिया था और अनुभवी होने के बाद स्वयं अपना निर्माण किया। यद्यपि बाण ने कादम्बरी में भर्तु या भत्सुं नामक अपने गुरु का उल्लेख किया है, तथापि यह नहीं विदित होता कि बाण के जीवन के निर्माण में भर्तुशर्मा का कितना हाथ था। बाण के व्यक्तित्व में दो बातें बड़े महत्त्व की थीं, एक तो वह जन्म से ही स्वभावगम्भीर अर्थात् विस्तृत मेधाशक्ति वाला था, दूसरे वह प्रत्येक वस्तु की जानकारी प्राप्त करने के लिए सदा उत्सुक रहता था। इन दोनों बातों से बाण को मार्गस्थ होने में बड़ी सहायता मिली।
बाण के व्यक्तित्व की एक और विशेषता है, वह है उसका स्वाभिमान। वह जितना नम्र था उतना ही स्वाभिमानी भी। वह किसी की परवा नहीं करता था। उसे क्या पड़ी थी कि वह राजकुल में प्रवेश पाकर सेवा में हाजिरी बजाता और सेवकों जैसी चापलूसी करता ? जब हर्ष के भाई कृष्ण ने अपने दूत द्वारा संदेश भेजा कि बिना समय गँवाए राजकुल में पधारें तो बाण बहुत सोच में पड़ गया। कृष्ण के दूत ने संदेश में यह भी कहा कि सेवा में झंझट सोच कर उदासीन न होना चाहिए। इससे प्रतीत होता है कि बाण के स्वाभिमानी व्यक्तित्व से कृष्ण खूब परिचित थे। उन्हें डर था कि बाण कहीं सम्राट् के पास आना अस्वीकार न कर दें। बाण से डाह करने वालों ने उसकी आरम्भिक चाल-चलन की बात लेकर सम्राट् के कान भर दिये थी, जिसका परिमार्जन बड़े प्रयत्न से कृष्ण ने कर दिया। बाण अपने अकारणबन्धु कृष्ण का संदेश सुन कर बहुत सोच में पड़ गए। राजसेवा उन्हें कष्टप्रद लगती थी। राजदरबार में बड़े खतरे नजर आते थे। न उनके पुरखों में किसी की इस तरफ रुचि रही, न उनके ही मन में ऐसी बात थी कि वे राजकुल में जाकर बुद्धि-सम्बन्धी विषयों का आदान-प्रदान करें। न विद्वानों की गोष्ठियों में बैठने की विलक्षण चतुराई ही उनके पास थी। चापलूसी से भी उन्हें बड़ी चिढ़ थी। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने जाने का निश्चय कर लिया। स्वाभिमान उन्हें रोकता था, परन्तु जब यह ध्यान में आता कि सम्राट् कुछ ऐसा-तैसा मुझको समझ गए हैं तो उनका स्वाभिमान उनको चलने के लिए ही प्रेरित करने लगा। स्वाभिमानी बाण को यह कैसे सह्य होता कि दूसरा उसे हीन दृष्टि से देखे, जब कि वह हीन नहीं। अपनी अहीनता का सम्यग्ज्ञान होने पर भी बाण में अहंकार का लेश भी न था। उन्हीं के निर्देश से पता चलता है कि वे रूप-सम्पन्न थे, पर उनके मन में सुन्दर रूप से मिलने वाले आदर २ ह० मू०
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की इच्छा न थी। उनमें प्रगाढ़ शास्त्रीय ज्ञान था लेकिन बुद्धि-सम्बन्धी विषयों पर लड़- झगड़ के लिए दिखावा करने जाना वह सर्वथा व्यर्थ समझते थे। जब सम्राट् हर्ष ने प्रथम बार बाण को देख कर हँसते हुए 'महानयं भुजङ्गः' कह डाला तो बाण अपनी स्वतंत्र प्रकृति और स्वाभिमान से संवलित ब्रह्मतेज का संवरण न कर सके। थोड़ी देर तक चुप रह कर उन्होंने पूछ ही डाला—'का मे भुजङ्गता ?' बाण का व्यक्तित्व इस प्रकरण में जितना स्पष्ट खुल सका है उतना अन्यत्र नहीं। उस समय बाण को यह सुध-बुध न थी कि वे महाराजाधिराज हर्षवर्धन के सामने खड़े हैं। उनका स्वाभिमान तत्काल प्रज्वलित हो उठा था। जब कि बाण में अब कोई भुजंगपना न रह गया था तब भी दूसरों के कान भर देने से केवल ऐसी निराधार कल्पना कर देना कहाँ तक उचित था। उसने हर्ष से स्पष्ट कह दिया कि 'आप नेय की तरह बोलते हैं अर्थात् आपकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर करती है। आप मुझे साधारण व्यक्ति मत समझिए। मैंने वात्स्यायन ब्राह्मणों के कुल में जन्म लिया है। सांगवेद का स्वाध्याय और अनेक शास्त्र भी सुने हैं। विवाह हो जाने के बाद नियमित गृहस्थ हूँ। (इससे यह पता चलता है कि बाण उस समय तक विवाहित हो गए थे और तभी से उनके जीवन में स्थिरता हुई)। यौवन के आरम्भ में अवश्य ही मुझ में कुछ चपलताएँ थीं, इससे मैं इनकार न करूँगा, किन्तु वे ऐसी थीं जिनका इस लोक या उस लोक में विरोध न हो।' बाण की इस वाणी में सचमुच उनका ब्रह्मतेज निखर उठा है। फिर बाण अपनी नम्रता का अवलम्बन ले लेते हैं। बाण ने अपने आप को खूब पहचाना था। वे अपनी कमजोरियों को अच्छी तरह समझ गए थे और उन्हें हटाने का प्रयत्न भी करते थे। जैसा कि उन्होंने स्कन्धावार में दरबार से लौटने पर सोचा था कि मुझे धिक्कार है यदि मैं अपने दोषों के प्रति अन्धा होकर केवल अनादर की पीड़ा अनुभव करके इस गुणी सम्राट् के प्रति कुछ और सोचने लगूँ। अवश्य ही मैं वह करूँगा जिससे यह कुछ समय बाद मुझे ठीक जान ले। पुष्पभूति और भैरवाचार्य—पुष्पभूति ही हर्ष के वर्धनवंश के आदि संस्थापक थे। वे शिव के अनन्य उपासक थे। उनके प्रभाव से घर-घर में शिव की पूजा होती थी। राजा पुष्पभूति बेताल-साधना भी करते थे इस कार्य में उनका सहायक भैरवाचार्य नामक दाक्षिणात्य महाशैव था। भैरवाचार्य से मिलन का वृत्तान्त यह है कि एक दिन उस राजा के पास एक परिव्राट् आया। वह भैरवाचार्य का मुख्य शिष्य था। राजा के पूछने पर कि 'भैरवाचार्य कहाँ हैं?' उस शिष्य ने 'सरस्वती के किनारे शून्यायतन में ठहरे हैं' यह कह कर पाँच चाँदी के कमल भैरवाचार्य की ओर से अर्पित किए। दूसरे दिन पुष्पभूति ने पुराने देवी के मन्दिर के उत्तर बिल्ववाटिका में आसन लगाए भैरवाचार्य