हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] प्रथम उच्छ्वासः ६३ विज्ञापयामि । अनुरूषो देव इत्यात्मसंभावना, शीलवानिति प्रक्रम- विरुद्धम्, धीर इत्यवस्थाविपरीतम्, सुभग इति त्वदायत्तम्, स्थिर- प्रीतिरिति निपुणोपक्षेपः, जानाति सेवितुमित्यस्वामिभावोचितम्, इच्छति दासभावमामरणत्कर्तुमिति धूर्तालापः, भवनस्वामिनी भवेत्युप- प्रलोभनम्, पुण्यभागिनी भजति भर्तारं तादृशमिति स्वामिपक्षपातः, त्वं तस्य मृत्युरित्यप्रियम्, अगुणज्ञासीत्यधिक्षेपः, स्वप्नेऽप्यस्य बहुशः कृतप्रसादासीत्यसाक्षिकम्, प्राणरक्षार्थमर्थयत इति कातरता, तत्र गम्यतामित्याज्ञा, वारितोऽपि बलादागच्छतीति परिभवः । तदेवमगोचरे गिरामसीति श्रुत्वा देवी प्रमाणम्' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत् । अथ सरस्वती प्रीतिविस्फारितेन चक्षुषा प्रत्यवादीत्—'अयि, म्रियते । राज्ञोऽपि पार्श्वे मृत्युस्तिष्ठत्येव । रणरणको दुःखमरतिकृतम् । अत एव संचारक एकत्र नरे सम्भवदितरत्र संचारयति, चरितं वस्तु यः प्रापयते सः । द्विविधा हि चाराः— संस्थाः, संचारकाश्च । वृद्धा महान्तः स्थविराश्च । अनुरूप इत्यादिनेदमिदं तन्नास्तीति वक्रोक्त्या सातिशयं मालती वैदग्ध्येनाह । प्रक्रम आरम्भः । निपुणोपक्षेपो बुद्धिमत्प्रक्रमः । धूर्तालापः प्रतारणावचनम् । वारित इति । मवत्येवेत्यर्थात् । चलने लगे, मृत्यु पाश्वंचर हो गई, मानसिक दुःख ही संचारक बने, संकल्प ही बुद्धि के उपदेशक-वृन्द बने । और क्या कहूँ ? अगर कहती हूँ 'देव दधीच सुयोग्य हैं', अपने सम्मान की बात होती है; 'वे सुशील हैं' तो बात प्रसंग के विरुद्ध होती है; 'धीर हैं' यह बात मदनावस्था से विपरीत है, 'सुभग हैं' यह तो तुम कह सकती हो; 'उनकी प्रीति स्थिर है' यह चतुरता की बात होती है; 'सेवा करना वे जानते हैं' यह कहना स्वामी के लिए उचित नहीं; 'मरने तक तुम्हारी दासता चाहते हैं' प्रलोभन हुआ; 'धन्यभाग नारी हो ऐसे पति को प्राप्त करती है' यह स्वामी के द्रुति में पक्षपात करना है; 'तू उसकी मृत्यु है' यह बात अप्रिय होती है; 'तू गुणों को नहीं समझती' यह निन्दा की बात होती है; 'स्वप्न में भी तुमने इस पर बहुत बार प्रसन्नता की' इस बात में कोई साक्षी नहीं; 'अपने प्राणों की भीख माँगता है' यह कातरता है; 'वहां जाओ' यह आज्ञा होती है; 'रोकने पर भी हठपूर्वक आता है' यह अनादर की बात है । इस प्रकार तुमसे मैं कुछ नहीं कह पाती । यह सुन कर आप ही प्रमाण हैं। यह कहकर चुप हो गई । तब सरस्वती प्रीति से विस्फारित आंखों से (उसे देखती हुई) बोली—'सखी मालती,