हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ हर्षचरितम् न शक्नोमि बहु भाषितुम् । एषास्मि ते स्मितवादिनि वचसि स्थिता । गृह्यन्ताममी प्राणाः' इति । मालती तु देवि, यदाज्ञापयसि, अति- प्रसादाय' इति व्याहृत्य प्रहर्षपरवशा प्रणम्य प्रजविना तुरगेण ततार शोणम् । अगाच्च दधीचमानेतुं च्यवनाश्रमपदम् । इतरा तु सखीस्नेहेन सावित्रीमपि विदितवृत्तान्तामकरोत् । उत्कण्ठाभार- भृता च ताम्यता चेतसा कल्पायितं कथंकथमपि दिवसशेषमने- षीत् । अस्तमुपगते च भगवति गभस्तिमति, स्तिमिततरमवतरति तमसि, प्रहसितामिव सितां दिशं पौरंदरीं दरीमिव केसरिणि मुञ्चति चन्द्रमसि सरस्वती शुचिनि चीनांशुकसुकुमारतरे तरङ्गिणि दुगूल- कोमलशयन इव शोणसैकते समुपविष्टा स्वप्नकृतप्रार्थना पादपतन- लग्नां दधीचचरणनखचन्द्रिकामिव ललाटिकां दधाना, गण्डस्थला- दर्शप्रतिबिम्बितेन 'चारुहासिनि, अयमसावाहूतो हृदयदयितो जनः' प्रजविनेति साभिप्रायम् । अस्तमित्यादौ सरस्वती प्रतिपालयामासेति संबन्धः । गभस्तिमान्रविः । पौरंदर्यैन्द्री । दरी गुहा शोणेत्यादि सैकतविशेषम् । उपमा- नस्य तु दुकूलकोमल इत्युक्तम् । तरङ्गिणो प्रतिदिनं क्षीयमाणेन वारिणा कृतलेखे भङ्गियुक्ते च । चन्द्रिका कान्तिरतत्र । ललाटालंकारो ललाटिका । चक्रवालं समूहः । मैं बहुत बात नहीं कर सकती । हे स्मितवादिनि ! मैं तेरी बात मान जाती हूँ । मेरे प्राणों की तू रक्षा कर ।' 'देवि, अत्यन्त प्रसाद के लिए, जो आज्ञा ।' मालती यह कह और अत्यन्त प्रसन्न हो प्रणाम करके अपने तेज घोड़े पर चढ़ सोन के उस पार चली गई और दधीच को लाने के लिए च्यवनाश्रम पहुँची । सरस्वती ने इस वृत्तान्त को सखी के स्नेह से सावित्री को भी सुना दिया । उत्सुकता से बोझिल एवं दुःखी चित्त के कारण कल्प के समान शेष दिन को किसी प्रकार बिताया । जब भगवान् सूर्य अस्त हो गए, धीरे- धीरे अन्धकार भी उतरने लगा और (चन्द्रमा, जैसे सिंह गुफा से निकलता है वैसे ही हँसती हुई उज्ज्वल पूर्व दिशा को छोड़ने लगा, तब सरस्वती पवित्र चीनांशुक के समान कोमल, और तरंगों के चिह्न वाली मानों चादर से युक्त कोमल शय्या के सदृश सोन की रेत पर आकर बैठी और प्रतीक्षा करने लगी । वह ललाट का आभूषण धारण कर रही थी, मानों वह स्वप्न में प्रार्थना करने के लिए पैरों पर गिरने से नखों की ज्योत्स्ना हो उसके गालों के आइने में चन्द्रमा प्रतिबिम्बित हो रहा था, मानों वह उसके कान के पास आकर काम का यह संदेश उसे सुना रहा था कि 'हे चारुहासिनी, देख, मैंने तेरे हृदय-दयित