हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः ६५ इति श्रवणसमीपवर्तिना निवेद्यमानमदनसंदेशेवेन्दुना, विकीर्यमाण- नखकिरणचक्रवालेने वालव्यजनीकृतचन्द्रकलाकलापेनेव करेण वीज- यन्ती स्वेदितं कपोलपट्टम्, 'अत्र दधीचादृते न केनचित्प्रवेष्टव्यम्' इति तिरश्चीनं चित्तभुवा पातितां विलासवेत्रलतामिव बालमृणालि- कामधिस्तनं स्तनयन्तो कथमपि हृदयेन वहन्ती प्रतिपालयामास। आसीच्चास्या मनसि—'अहमपि नाम सरस्वती यत्रामुना मनो- जन्मना जानत्येव परवशीकृता । तत्र का गणनेतरासु तपस्विनीष्वति- तरलासु तरुणीषु' इति । आजगाम च मधुमास इव सुरभिगन्धवाहः, हंस इव कृतमृणाल- धृतिः, शिखण्डीव घनप्रीत्युन्मुखः, मलयानल इवाहितसरसचन्दन- धवलतनुलतोत्कम्पः, कृष्यमाण इव कृतकरकचग्रहेण ग्रहपतिना, बालव्यजनं चामरम् । स्तनमध्ये प्रवेशाभावात्तिरश्चीनमित्युक्तम् । यश्च वेत्री प्रवेश- निषेधननिमित्तं वेत्रलतां पातयति स तिरश्चीनः । स्तनयोरधिस्तनम् । विभक्त्यर्थे- ऽव्ययीभावः । कुचपृष्ठ इत्यर्थः । स्तृनयन्ती कलयन्ती । स्तनिः शब्दार्थश्चौरादिकः । 'स्तनन्ती' इति वा पाठः । तपस्विनीषु वराकीषु । आजगामेत्यादौ आजगामेति सम्बन्धः । सुरभिगन्धवाहो वातः सुरभिगन्धं च यो वहति । धृतिर्धारणम्, प्राणयात्रा च । घनः । सारसं सान्द्रं यच्चन्दनं तेन धवलया तनुलतयाहितत्रप उत्कम्पः कामधर्मो यस्य । अन्यत्र-चन्दनांश्च धवांश्च लान्ति श्रयन्ति यास्तन्व्यो लतास्तासामाहित उत्कम्पः कम्पनं येनेति । कृष्यमाण इत्युद्दीपनकारणत्वात् । करा रश्मयः, हस्तश्च करः । हस्तस्य कर्षशं समुचितम् । दधीच को तेरे पास पहुँचा दिया।' हाथ के नखों की किरणें चारों ओर फैल रही थीं, मानों उसने चन्द्र की कलाओं को ही चैंवर बना दिया हो, ऐसे हाथ को वह पसीने से तर अपने गालों पर झल रही थी, वह अपने स्तनों पर किसी प्रकार बाल मृणालिकाओं को धारण किये थी । 'यहाँ दधीच के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रवेश न करे' इसलिए काम ने मानों अपनी वेत्र- लता वहाँ छोड़ दी थी। उसने मन में सोचा—'सरस्वती होकर भी मैं जब इस काम द्वारा सब कुछ समझते हुए भी परवश कर दी गई, तो उन बेचारी अति चपल स्वभाव वाली तरुण नारियों की क्या गणना ?' तब (सुगन्धि पवन से युक्त) वसन्त के समान सुगन्धि से भरे हुए, (मृणाल से जीवन धारण करने वाले) हंस के समान मृगाल धारण किये हुए, (घन या मेघ में प्रीति से उत्सुक) मयूर के समान घन (दृढ़) प्रीति के कारण उत्सुक, (चन्दन और धव वृक्षों के आश्रय पाई ५ ह०