भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

प्रेर्यमाण इव कन्दर्पोद्दीपनदक्षेण दक्षिणानिलेन, उह्यमान इवोत्कलिका- बहुलेन रतिसरसेन, परिमलसंपातिना मधुपपटलेन पटेनेव नीलेना- च्छादिताङ्गयष्टिः, अन्तःस्फुरता मत्तमदनकरिकर्णशङ्खायमानेन प्रति- सेन्दुना प्रथमसमागमविलासवि लक्षस्मितेनेव धवलीक्रियमाणैककपो- लोदरो मालतीद्वितीयो दधीचः । आगत्य च हृदयगतदयितानूपुर- रवविमिश्रयेव हंसगद्गदया गिरा कृतसंभाषणो यथा मन्मथः समाज्ञा- पयति, यथा यौवनमुपदिशति, यथा विदग्धताध्यापयति, यथानु- रागः शिक्षयति, तथा तामभिरामां रामाम रमयत् । उपजातविस्रम्भा चात्मानमकथयदस्य सरस्वती । तेन तु सार्धमेकदिवसमिव संवत्सर- अधिकमनयत् ।


ग्रहपतिश्चन्द्रः । प्रेर्यमाण इति । अनिलस्योचितमेतत्कर्म । उह्यमान इति । जलस्यो- चितमेतत् । उत्कलिका, रुहरुहिका, ऊर्मयश्च । रसोऽभिलाषः, जलं च । परिमल आमोदः । पटलं समूहः । प्रतिमा प्रतिच्छन्दकम् । यथा मन्मथ इति । मन्मथस्य प्रभवन्शीलत्वेनाज्ञादानमुचितम् । एवं सर्वत्रोपदिशतीति । इत्थमित्थं वर्तस्वेत्यु- पदेशः । देवताविषयं सम्भोगशृङ्गारवर्णनमनुचितमिति न तत्र विस्तरः प्रवर्तते । कुमारीत्वे च गान्धर्वविवाहो विस्तरेण न तथा वर्णितः शापनिर्वाहणमात्रपरत्वा-


हुई तन्वी लताओं में कम्पन पैदा करने वाले) मलया निल के समान सान्द्र चन्दन के लेप से उज्ज्वल शरीर में कम्प से युक्त ग्रहपति दधीच मालती के साथ आये । मानों चन्द्र उन्हें किरण- रूपी हाथों से बाल पकड़ कर खींच लाया हो । काम को उद्दीप्त करने में दक्षिणानिल ने मानों उन्हें प्रेरित किया हो । अभिलाषाओं की तरंगों से भरा रतिरस मानों उन्हें ढो लाया हो । सुगन्ध पर झूलते हुए भौंरे उन पर छा रहे थे, मानों उनके अङ्ग नीले वस्त्र से ढँक रहे हों । उनके एक कपोल के भीतर चन्द्र प्रतिफलित होकर चमक रहा था, मानों मतवाले मदन- रूपी हाथी के कान का वह शङ्ख हो । या प्रथम मिलन के विलास स्वरूप स्मित से उनके कपोल के मध्यभाग की कान्ति और भी निखर गई हो । आकर उन्होंने हृदय में पहुँची हुई प्रिया के नूपुर की आवाज से मिली हुई हंस के समान गद्गद वाणी से बातचीत की । काम जो आज्ञा देता, यौवन जो उपदेश देता, अनुराग जो शिक्षा देता, विदग्धता जो समझी, उसी प्रकार अपनी सुन्दरी प्रियतमा के साथ वे विहार करने लगे । जब पूरा विश्वास हो गया तब सरस्वती ने अपने आपको उनसे स्पष्ट कह दिया (कि मैं दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होकर मर्त्य लोक में आई हुई सरस्वती हूँ) । दधीच ने सरस्वती के साथ-साथ रह कर एक वर्ष से अधिक समय को एक दिन के समान व्यतीत किया ।

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक) · पृष्ठ 108, कुल 184 में से · BharatKosha