भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

प्रथम उच्छ्वासः ६७ अथ दैवयोगात्सरस्वती बभार गर्भम् । असूत चानेहसा सर्व- लक्षणाभिरामं तनयम् । तस्मै च जातमात्रायैव ‘सम्यक्सरहस्याः सर्वे- वेदाः सर्वाणि च शास्त्राणि सकलाश्च कला मत्प्रभावात् स्वयमावि- र्भविष्यन्ति’ इति वरमदात् । सद्भर्तृश्लाघया दर्शयितुमिव हृदयेनादाय दधीचं पितामहादेशात्समं सावित्र्या पुनरपि ब्रह्मलोकमरुरोह । गतायां च तस्यां दधीचोऽपि हृदये ह्लादिन्येवाभिहतो भार्गववंशसंभूतस्य भ्रातुर्ब्राह्मणस्य जायामक्षमालाभिधानां मुनिकन्यकामात्मसूनोः संवर्ध- नाय नियुज्य विरहातुरस्तपसे वनमगात् । यस्मिन्नेवावसरे सरस्व- त्यसूत तनयं तस्मिन्नेवाक्षमालापि सुतं प्रसूतवती । तौ तु सा निर्विशेषं सामान्यस्तन्यादिना शनैः शनैः शिशू समवर्धयत् । एकस्तयोः सारस्वताख्य एवाभवत्, अपरोऽपि वत्सनामासीत् । आसीच्च तयोः सोदर्ययोरिव स्पृहणीया प्रीतिः । अथ सारस्वतो मातुर्महिम्ना यौवनारम्भ एवाविर्भूताशेषविद्या- दिति । वृत्तस्यान्यथा निजभर्तृत्यागो दोषावहः किमर्थं कृत इत्यादिकाः कुविकल्पा उत्पद्येरन्निति । अनेहसा कालेन । रहस्यं ज्ञानभागः । ह्लादिनी वज्रम् । तत्पश्चात् दैवयोग से सरस्वती ने गर्भ धारण किया और समय से सब लक्षणों वाले सुन्दर पुत्र को उत्पन्न किया और जन्म लेते ही उसे वर दिया—'मेरे प्रभाव से सम्यक् प्रकार से रहस्यों के साथ वेद, समस्त शास्त्र, समस्त कलाएँ स्वयं आविर्भूत हों। उत्तम पति के गौरव से मानो दिखाने के लिए हृदय में दधीच को रखकर ब्रह्मा जी के आदेश के अनुसार फिर सरस्वती सावित्री के साथ ब्रह्मलोक को चली गई । उसके चले जाने से दधीच के हृदय पर गहरा वज्रपात-सा हुआ। तब उन्होंने अपने पुत्र को पालने-पोसने के लिए भार्गववंश में उत्पन्न किसी ब्राह्मण भाई की पत्नी अक्षमाला नामक मुनिकन्या के पास रख दिया और स्वयं सरस्वती के विरह में आतुर होकर तपस्या करने के लिए वन में चले गये । जब सरस्वती ने पुत्र पैदा किया था तभी अक्षमाला को भी एक पुत्र हुआ था । उन दोनों को एक भाव से दूध पिलाकर उसने पाला-पोसा और बढ़ाया । उनमें से एक का नाम सारस्वत हुआ और दूसरे का नाम वत्स । दोनों में भाई के समान स्पृहणीय प्रेम- भाव था । माता के प्रभाव से सारस्वत में यौवन का आरम्भ होते ही सारी विद्याएँ प्रगट हो गईं