हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ हर्षचरितम् संभारस्तस्मिन्समवयसि भ्रातरि प्रेयसि प्राणसमे सुहृदि वत्से वाङ्मयं समस्तमेव संचारयामास । चकार च कृतदारपरिग्रहस्यास्य तस्मिन्नेव प्रदेशे प्रीत्या प्रीतिकूटनामानं निवासम् । आत्मनाप्याषाढी, कृष्णाजिनी, अक्षवलयी, वल्कली, मेखली, जटी च भूत्वा तपस्यतो जनयितुरेव जगामान्तिकम् । अथ वत्सात्प्रवर्धमानादिपुरुषजनितात्मचरणोन्नतिः, निर्गतप्रघोषः, परमेश्वरशिरोधृतः, सकलकलागमगम्भीरः, महामुनिमान्यः, विपक्ष- क्षोभक्षमः, क्षितितललब्धायतिः, अस्खलितप्रवृत्तो भागीरथीप्रवाह इव वाक्प्रस्तुता यत्र तद्वाङ्मयम् । 'आषाढसंज्ञो दण्डः स्यात्पालाशो व्रतचारिणाम् । वृक्षत्वङ्-निर्मितं वस्त्रं वल्कलं समुदाहृतम् ॥' मेखला मुञ्जतृणादिरचितं कटिसूत्रम् । जटा रूक्षसंहतकेशाः । अथेत्यादौ । वत्सात्प्रावर्तत विमलो वंश इति संबन्धः । प्रवर्धमानाः संताना- दिना वृद्धिं गच्छन्तो य आदिपुरुषाः पूर्वबान्धवाः शुक्राद्यास्तैः कृताः स्वेषां चरणानां कठादिशाखाध्यायिनामुन्नतिरुत्कर्षो यस्य सः । अन्यत्र-प्रवर्धमानस्तु वामनरूपो य आदिपुरुषो हरिस्तेन जनिता स्वपदोन्नतिर्माहात्म्यं यस्य स इति । किल त्रैलोक्या- तो उसने प्राण के समान प्रिय अपने समवयस्क भाई तथा मित्र वत्स ने भी समस्त वाङ्मय को उड़ेल दिया और वत्स का विवाह करा उसी प्रदेश में प्रीति के कारण प्रीतिकूट नाम का निवास बनवाया । और खुद वह पलाश का डंडा, कृष्ण मृगचर्म, अक्षवलय, वल्कल, मेखला और जटा धारण करके तपस्या में लगे हुए पिता दधीच के ही पास चला गया । वत्स से विमल-वंश पावन गङ्गा-प्रवाह की भांति चला, जिसके बढ़ते जाते हुए आदि- पुरुषों ने अपने चरणों-कठादि वैदिक शाखाओं के अध्ययन करने वालों-की उन्नति की ( गङ्गाप्रवाह के पक्ष में-बढ़ते जाते हुए वामनरूप आदिपुरुष ने जिसकी पदोन्नति या माहात्म्य उत्पन्न किया ), जिसका निर्घोष ( यश ) निकल फैला ( पक्ष में-शब्द या ध्वनि होती रहती है ), जिसे ( या जिसकी आज्ञा को ) परमेश्वर अर्थात् राजाओं ने शिर से धारण किया (पक्ष में-परमेश्वर अर्थात् शिव जी ने शिर से धारण किया ), जो समस्त कलाओं के आगम ( अध्ययन या अज्ञान ) से गम्भीर था ( पक्ष में-जिसका आगमन कलकल शब्द के साथ होता है ), जो महामुनियों का मान्य था । ( पक्ष में-महामुनि अर्थात् जहु ने जिसका मान किया ), जो विपक्षों-शत्रुओं के क्षोभ उत्पन्न करने में समर्थ था ( पक्ष में-जो अपने