हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 111, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः ६९
पावनः प्रावर्तत विमलो वंशः । यस्मादजायन्त वात्स्यायनो नाम गृहमुनयः, आश्रितश्रौता अप्यनालम्बितालीकबककाकवः, कृत- कुक्कुटव्रता अप्यबेडालवृत्तयः, विवर्जितजनपङ्क्तयः, परिहृतकपटकोरू- कुचीकूर्चकृताः, अगृहीतगह्वराः, न्यक्कृतनिकृतयः, प्रसन्नप्रकृतयः, विहतविकृतयः, परपरीवादपराचीनचेतोवृत्तयः, वर्णत्रयव्यावृत्ति-
क्रान्तिक्राले ब्रह्मलोकप्रासाद्विष्णुपदाद् ब्राह्मणा कमण्डलुजलक्षालिता गङ्गा सम- मवदिति वार्ता । प्रदोषो यशः, शब्दश्च । परमेश्वरो राजा, हरश्च । सकलानां कलानां वृत्तान्तानामागमेन च सहकलकलेन यदागमनं तेन च । महामुनिर्जह्नु- रपि । विपक्षाः शत्रवः, शैलाश्च । वीनां पक्षिणां वा पक्षच्छेदेषु सहिष्णुः । आयतिः प्रतापः, विस्तारश्च । स्खलितं स्वाचारच्युतिः । प्रवृत्तः प्रकृष्टवृत्तः । अस्ख- लितं असंरुद्धं कृत्वा गतश्च । श्रौतं वेदमभवम्, चिरवृत्तं च । 'मिन्नो भयाद्वा शोकाद्वा ध्वनिः काकुरुदाहृता' । अत्र च छद्म लक्ष्यते । बकस्य काकुः । बकच्छद्म यैश्च चिरवृत्तमाश्रितं ते छद्मचारित्वादाश्रितबककाकवो भवन्त्येव । अमी तु न तथेति विरोधः । कुक्कुटव्रतं नियमविशेषः । यत्र कुक्कुटाण्डप्रमाणग्रासभोजनम् । न वैडाली हिंसावृत्तिर्येषां तैः विरोधो तु कुक्कुटानां व्रतं भक्षणं येन कृतं स कथं बिडालवृत्तिर्न स्यात् ? पङ्क्तिर्लोकप्रसिद्धो व्यवहारः, पाको वा । कपटो व्याजवृत्तिः । कूर्चाः स्फुटाः ।
वेग से विपक्षों-पर्वतों को क्षुभित कर देता ) पृथ्वीतल में जिसका आयति-प्रताप-व्यास हो गया था ( पक्ष में—पृथ्वीतल में आयति-विस्तार-को प्राप्त हुआ है ), जो कभी स्खलित अर्थात् अपने आचार से च्युत नहीं हुआ एवं प्रवृत्त अर्थात् प्रकृष्ट वृत्त या व्यवहार वाला था ( पक्ष में—जो अस्खलित या बेरोक बहता रहता है । जिस वंश से वात्स्यायन नाम के असाधारण ब्राह्मण उत्पन्न हुए । वे गृहमूनि ( गृहस्थ होते हुए भी मुनि-वृत्ति रखने वाले ) थे । श्रौत या चिरवृत्त का आश्रयण करके भी वे मिथ्या बगुलों जैसे छल-छद्म से, बगला- भगती से अलग रहते थे ), कुक्कुट का भक्षण ( व्रत ) करते थे तथापि बिडालों जैसा व्यव- हार ( हिंसावृत्ति ) नहीं रखते थे ( परिहार यह कि वे कुक्कुटव्रत करके अर्थात् उस नियम का पालन करते जिसमें कुक्कुट के अण्डे भर का ग्रासमात्र भोजन करना चाहिए ) । उन्होंने समाज के व्यवहार ( अथवा किसी का बनाया भोजन ) वर्जित रखा था । कपट, कुटिलता और शेखी बघारने की आदत उनमें न थी । पापों से बचते थे । शठता को दूर रखते थे । प्रसन्न स्वभाव वाले थे । उनमें किसी तरह का विकार न था । दूसरे की निन्दा से उनकी चित्तवृत्ति पराङ्मुखी थी । तीनों वर्णों ( अपने गोत्र के अतिरिक्त ब्राह्मण, क्षत्रिय,