भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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७० Digitized by Arya Samajहर्षचरितम् Chennai and eGangotri विशुद्धान्धसः, धीरधिषणाः, विधूताध्येष्णाः, असङ्कुसुकस्वभावाः, प्रणतप्रणयिनः, शमितसमस्तशाखान्तरसंशीतयः उद्घाटितसमग्र- ग्रन्थार्थग्रन्थयः, कवयः, वाग्मिनः, विमत्सराः, परसुभाषितव्यसनिनः, विदग्धपरिहासवेदिनः, परिचयपेशलाः, नृत्यगीतवादित्रेष्वबाह्याः, ऐतिहास्यावितृष्णाः, सानुक्रोशाः, सर्वातिथयः, सर्वसाधुसंमताः, सर्वसत्त्वसाधारणसौहार्दद्रवार्द्रीकृतहृदयाः, तथा सर्वगुणोपेता राज- सेनानभिभूताः, क्षमाभाज आश्रितनन्दनाः, अनिस्त्रिंशा विद्याधराः, आत्ममहिम्ना व्यवहारः, समूह इत्यन्ये । एतेष्वाकूतं परिहृतं यैः । गह्वरं पापम् । निकृतिः शाठ्यम् । प्रकृतिः स्वभावः । पराचीनं पराङ्मुखम् । अन्धोऽन्नम् । धीरा स्थिरा । धिषणा बुद्धिः । अध्येषणा याच्ञा । असङ्कुसुकः स्थिरः, मृदुर्वा । शाखाः कठाद्याः । संशीति संशयः । ग्रन्थिर्दुर्वोधः प्रदेशः । परिहासं विदन्ति, न तु स्वयं कुर्वन्ति । परिचयः संस्तवः । सुकुमाराः, अद्वन्द्वकूटा इत्यर्थः । अबाह्याः, न तु तदेकनिष्ठाः । ऐतिह्यमागमः । अनुक्रोशो दया । संमता इष्टाः । सौहार्दं प्रीतिः । सर्वे गुणा धैर्याद्याः । राज्ञां सेनया चानभिभूता ये च सर्वगुणैः सत्त्वरजस्तमोभिर्यु- क्तास्ते कथं राजसेन गुनेनानभिभूता भवन्तीति विरोधः । एवमुत्तरत्र विरोध उद्भा- वनीयः । क्षमा क्षान्तिः, भूश्च । आश्रितानां नन्दना नन्दयितारः, देवोद्यानं नन्दनं च । न निस्त्रिंशा अक्रूराः । विद्यां धारयन्तीति विद्याधराः पण्डिताः, निस्त्रिंशाश्च वैश्य ) को पृथक् करके पवित्र अन्न ग्रहण करते थे । उनकी बुद्धि स्थिर थी । उन्होंने याचना की वृत्ति को तिरस्कृत कर दिया था । उनका स्वभाव स्थिर या मृदु था । उनके मित्रजन अनुकूल थे । उन्होंने समस्त अन्य ( वैदिक ) शाखाओं के सन्देहों को भी दूर किया था । सारे ग्रन्थों की ग्रन्थियां भी उन्होंने उद्घाटित की थीं । वे कवि, वक्ता और मत्सरहित थे । दूसरों के सुभाषित को सुनने के शौकीन थे । विदग्ध जनों के परिहासों के जानकार थे । मिलने-जुलने में कुशल थे । नृत्य, गीत और वाद्य से बाहर नहीं थे । आगम या ऐतिह्य में तृष्णारहित न थे । दयावान्, सबके पूज्य, सभी सज्जनों के इष्ट थे । सभी प्राणियों के प्रति एक समान सौहार्द के कारण उनका हृदय आर्द्र था ( सभी प्रकार के गुणों से युक्त था ) । ( फिर भी ) राजस ( गुण ) से अभिभूत न थे । ( परिहार में राजसेना से अभिभूत न थे ) । पृथ्वी पर रहते थे ( फिर भी ) नन्दन ( देवोद्यान ) के आश्रित थे ( परिहार यह कि क्षमा रखते थे एवं अपने आश्रितों को प्रसन्न रखते थे ) निस्त्रिंश या खड्ग धारण नहीं करते थे ( फिर भी ) विद्याधर ( एक प्रकार के देवभूत प्राणी जो नियमितरूप से खड्ग धारण करते हैं ) थे ( परिहार यह कि क्रूर नहीं थे तथा विद्या के धारण करने वाले (पण्डित) CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.