हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः ७१ अजडाः कलावन्तः, अदोषास्तारकाः, अपरोपतापिनो भास्वन्तः, अनुष्माणो हुतभुजः, अकुसृतयो भोगिनः, अस्तम्भाः पुण्यालयाः, अलुप्तक्रतुक्रिया दक्षाः, अव्यालाः कामजितः, असाधारणा द्विजातयः। तेषु चैवमुत्पद्यमानेषु, संसरति च संसारे, यातसु युगेषु, अवतीर्ण खड्गा एव । ये च विद्याधरा देवभूतास्ते सखड्गा एव । न त्वनिस्त्रिंशा इति माला- खड्गगुलिकाञ्जनादिना भेदेन भिन्नानामपि विद्याधराणां खड्गहस्तत्वं न व्यभि- चरति । अजडा अमन्दधियः, अशीताश्च । कलावन्तो गीताभिज्ञाः, कलावांश्चन्द्रः स चाजडोऽशीत इति विरोधः। दोषा द्वेषाद्याः, रात्रिश्च। तारयन्तीति तारका आचार्याः, नक्षत्राणि च । उपतापः पीडा, उष्णत्वं च । भास्वन्तस्तेजस्विनः, आदित्याश्च । ते परांस्तापयन्ति । उष्मा स्मयः, दाहिकाशक्तिश्च । हुताशशब्देन हुतमिष्टमुच्यते । हुतं भुञ्जते हुतभुजः, आहिताग्नयो वह्नयश्च । कुसृतिः शाठ्यम्, कौ भूमौ सृतिः सरणम् । भोगिनः सुखिनः, सर्पाश्च । स्तम्भः स्तब्धता, सात्त्विको भावभेदश्च, अप्रणतिर्वा, गृहधारणकाष्ठं च । पुण्यालयाः सुकृतिनः, मठादिस्थानानि च । दक्षाश्च- तुराः, प्रजापतिभेदश्च दक्षः । स च लुप्तक्रतुक्रियो हररोषजेन वीरभद्रेण । व्यालाः शठाः, सर्पाश्च । कामजितः संतुष्टाः, हरश्च कामजित् । असाधारणाः सर्वोत्कृष्टाः । द्विजातयो विप्राः । येषां च द्वे जाती तेषां कथं नासादृश्यम् । काल इति पूर्वोक्ते । अन्यथैतत्पुनरुक्तं स्यात् । पक्षपातो मक्तिर्यस्यास्ति सः, थे )। कलावान् ( चन्द्र ) थे ( फिर भी ) अजड ( अशीत ) थे ( परिहार यह कि गीत आदि कला उन्हें अभ्यस्त थीं एवं जड बुद्धि वाले न थे )। दोषा ( रात्रि ) नहीं थे ( फिर भी ) तारक (नक्षत्र) नहीं थे (परिहार यह कि द्वेष आदि दोषों से रहित थे और उद्धार करने वाले (तारक) आचार्य थे। दूसरों को उपताप देने वाले न थे ( फिर भी ) सूर्य थे ( परिहार में, तेजस्वी थे )। उनमें उष्मा ( जलाने की शक्ति ) न थी ( फिर भी ) हुतभुज् ( अग्नि ) थे ( परिहार में उष्मा अर्थात् अहङ्कार से रहित एवं आहिताग्नि थे ) । भूमि में नहीं सरकते थे ( फिर भी ) भोगी अर्थात् सर्प थे (परिहार में कुसृति या शाठ्य नहीं करते एवं भोगी अर्थात् सुखी थे)। (स्तम्भ- रहित थे ) । उनके यज्ञकार्य लुप्त नहीं थे (फिर भी) दक्ष (एक प्रजापति, जिसके यज्ञकार्य का वीरभद्र ने विध्वंस कर डाला था ) थे ( परिहार में दक्ष अर्थात् चतुर थे ) । व्याल अर्थात् सर्प से रहित थे ( फिर भी ) कामजित् अर्थात् शिव थे ( परिहार में व्याल अर्थात् शठ न थे एवं काम को जीत लेने वाले थे )। इस प्रकार उस वंश में ब्राह्मण उत्पन्न होते गए, संसार-चक्र सरकता गया, युग बीते, CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.