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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

प्रथम उच्छ्वासः ७१ अजडाः कलावन्तः, अदोषास्तारकाः, अपरोपतापिनो भास्वन्तः, अनुष्माणो हुतभुजः, अकुसृतयो भोगिनः, अस्तम्भाः पुण्यालयाः, अलुप्तक्रतुक्रिया दक्षाः, अव्यालाः कामजितः, असाधारणा द्विजातयः। तेषु चैवमुत्पद्यमानेषु, संसरति च संसारे, यातसु युगेषु, अवतीर्ण खड्गा एव । ये च विद्याधरा देवभूतास्ते सखड्गा एव । न त्वनिस्त्रिंशा इति माला- खड्गगुलिकाञ्जनादिना भेदेन भिन्नानामपि विद्याधराणां खड्गहस्तत्वं न व्यभि- चरति । अजडा अमन्दधियः, अशीताश्च । कलावन्तो गीताभिज्ञाः, कलावांश्चन्द्रः स चाजडोऽशीत इति विरोधः। दोषा द्वेषाद्याः, रात्रिश्च। तारयन्तीति तारका आचार्याः, नक्षत्राणि च । उपतापः पीडा, उष्णत्वं च । भास्वन्तस्तेजस्विनः, आदित्याश्च । ते परांस्तापयन्ति । उष्मा स्मयः, दाहिकाशक्तिश्च । हुताशशब्देन हुतमिष्टमुच्यते । हुतं भुञ्जते हुतभुजः, आहिताग्नयो वह्नयश्च । कुसृतिः शाठ्यम्, कौ भूमौ सृतिः सरणम् । भोगिनः सुखिनः, सर्पाश्च । स्तम्भः स्तब्धता, सात्त्विको भावभेदश्च, अप्रणतिर्वा, गृहधारणकाष्ठं च । पुण्यालयाः सुकृतिनः, मठादिस्थानानि च । दक्षाश्च- तुराः, प्रजापतिभेदश्च दक्षः । स च लुप्तक्रतुक्रियो हररोषजेन वीरभद्रेण । व्यालाः शठाः, सर्पाश्च । कामजितः संतुष्टाः, हरश्च कामजित् । असाधारणाः सर्वोत्कृष्टाः । द्विजातयो विप्राः । येषां च द्वे जाती तेषां कथं नासादृश्यम् । काल इति पूर्वोक्ते । अन्यथैतत्पुनरुक्तं स्यात् । पक्षपातो मक्तिर्यस्यास्ति सः, थे )। कलावान् ( चन्द्र ) थे ( फिर भी ) अजड ( अशीत ) थे ( परिहार यह कि गीत आदि कला उन्हें अभ्यस्त थीं एवं जड बुद्धि वाले न थे )। दोषा ( रात्रि ) नहीं थे ( फिर भी ) तारक (नक्षत्र) नहीं थे (परिहार यह कि द्वेष आदि दोषों से रहित थे और उद्धार करने वाले (तारक) आचार्य थे। दूसरों को उपताप देने वाले न थे ( फिर भी ) सूर्य थे ( परिहार में, तेजस्वी थे )। उनमें उष्मा ( जलाने की शक्ति ) न थी ( फिर भी ) हुतभुज् ( अग्नि ) थे ( परिहार में उष्मा अर्थात् अहङ्कार से रहित एवं आहिताग्नि थे ) । भूमि में नहीं सरकते थे ( फिर भी ) भोगी अर्थात् सर्प थे (परिहार में कुसृति या शाठ्य नहीं करते एवं भोगी अर्थात् सुखी थे)। (स्तम्भ- रहित थे ) । उनके यज्ञकार्य लुप्त नहीं थे (फिर भी) दक्ष (एक प्रजापति, जिसके यज्ञकार्य का वीरभद्र ने विध्वंस कर डाला था ) थे ( परिहार में दक्ष अर्थात् चतुर थे ) । व्याल अर्थात् सर्प से रहित थे ( फिर भी ) कामजित् अर्थात् शिव थे ( परिहार में व्याल अर्थात् शठ न थे एवं काम को जीत लेने वाले थे )। इस प्रकार उस वंश में ब्राह्मण उत्पन्न होते गए, संसार-चक्र सरकता गया, युग बीते, CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

७२ हर्षचरितम् कलौ, वहत्सु वत्सरेषु, व्रजत्सु वासरेषु, अतिक्रामति च काले प्रसव- परम्पराभिरनवरतमापतति विकाशिनि वात्स्यायनकुले, क्रमेण कुबेर- नामा वैनतेय इव गुरुपक्षपाती द्विजो जन्म लेभे । तस्याभवन्नच्युत ईशानो हरः पाशुपतश्चेति चत्वारो युगारम्भा इव ब्राह्मतेजोजन्यमान- प्रजाविस्तारा नारायणबाहुदण्डा इव सच्चक्रनन्दकास्तनयाः । तत्र पाशुपतस्यैक एवाभवद् भूभार इवाचलकुलस्थितिः स्थिरश्चतुरुदधि- गम्भीरोऽर्थपतिरिति नाम्ना समग्राग्रजन्मचक्रचूडामणिर्महात्मा सूनुः। सोऽजनयद् भृगुं हंसं शुचिं कविं महीदत्तं धर्मं जातवेदसं चित्रभानुं त्र्यक्षं महिदत्तं विश्वरूपं चेत्येकादश रुद्रानिव सोमामृतरसशीकरच्छु- रितमुखान्पवित्रान्पुत्रान् । अलभत च चित्रभानुस्तेषां मध्ये राजदेव्य- भिधानायां ब्राह्मण्यां बाणमात्मजम् । स बाल एव बलवतो विधेर्व- पक्षैश्च यो याति सः । द्विजो विप्रः, विधुः, पक्षी च । युगारम्भा अपि चत्वारः । ब्रह्म वेदादि, स्रष्टा च ब्रह्मा । सच्चक्रस्य साधुवृन्दस्य नन्दकास्तोषयितारः । चक्रं सुदर्शनं च । नन्दकः खड्गश्च । बाहवोऽपि चत्वारः । अचलकुलस्थितिरभिन्नवर्षं- कलिकाल आया, साल के साल गुजरे, दिन बीते, समय बहुत चला गया । वात्स्यायन- कुल जन्म-परम्परा से निरन्तर विकसित होता गया । इसी क्रम में गुरु में पक्षपात ( भक्ति ) करने वाले कुबेर नामक द्विज विनता के पुत्र गरुड़ के समान हुए (गरुड़ भी अपने गम्भीर पक्षों से पतन या गमन करते हैं तथा द्विज अर्थात् पक्षी हैं)। उनके चार पुत्र हुए-अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत, जो चार युगारम्भ के समान थे, जिनके ब्राह्म तेज से सन्तति चारों ओर फैल रही थी, नारायण के बाहुदण्ड की भांति जो साधुवृन्द को सन्तुष्ट करते थे (नारायण का बाहु- दण्ड सुदर्शन नामक चक्र और नन्दकनामक खड्ग से युक्त है)। उसमें पाशुपत के एक ही अर्थपति नामक पुत्र भू-भार की भांति कुल-मर्यादा का पालन करने वाले (पक्ष में अचल अर्थात् पर्वतों के कुल (समूह) के कारण स्थित रहने वाला), स्थिर, समुद्र की भाँति गम्भीर, समस्त ब्राह्मणों के चूडामणि एवं महात्मा पुत्र हुए । अर्थपति ने रुद्रों के समान ग्यारह पुत्र उत्पन्न किये- भृगु, हंस, शुचि, कवि, महीदत्त, धर्म, जातवेदस्, चित्रभानु, त्र्यक्ष, अहिदत्त और विश्वरूप । जो सोम (तृण-विशेष अथवा चन्द्रमा) के अमृतमय शीकर से सिक्त मुख वाले और पवित्र थे । उनमें से चित्रभानु ने राजदेवी नामक ब्राह्मणी में बाण नामक पुत्र को पाया । बल- वान् दैवयोग से बाण बाल्यकाल में ही माता के मर जाने से मातृहीन हो गया । स्नेह उत्पन्न

प्रथम उच्छ्वासः ७३ शादुपसंपन्नया व्ययुज्यत जनन्या। जातस्नेहस्तु नितरां पितेवास्य मातृतामकरोत्। अवर्धत च तेनाधिकतरमाधीयमानधृतिर्धाम्नि निजे। कृतोपनयनादिक्रियाकलापस्य समावृत्तस्य चास्य चतुर्दशवर्ष- देशीयस्य पितापि श्रुतिस्मृतिविहितं कृत्वा द्विजजनोचितं निखिलं पुण्यजातं कालेनादशमीस्थ एवास्तमगमत्। संस्थिते च पितरि महता शोकेनाभीलमनुप्राप्तो दिवानिशं दह्यमानहृदयः कथंकथमपि कतिपया- न्दिवसानात्मगृह एवानैषीत्। गते च विरलतां शोके शनैः शनैर- विनयनिदानतया स्वातन्त्र्यस्य, कुतूहलबहुलतया च बालभावस्य, धैर्यप्रतिपक्षतया च यौवनारम्भस्य, शैशवोचितान्यनेकानि चापल्यान्या- चरन्नित्वरो बभूव। अभवंश्चास्य सवयसः समानाः सुहृदः सहा- मर्यादः। अचलानां गिरीणां कुलैर्वृन्दैः स्थितियंरस्य। चतुरुदधिवत्तैश्च गम्भीरः। अग्र- जन्मानो द्विजाः। सोमस्तृणभेदः, इन्दुश्च। उपसंपन्ना मृता। निजे धाम्नि स्वे गृहे। उपनयनं मेखलादानम्। समावृत्तो निष्पादितवृत्तः। स्नातक इत्यर्थः। वेद- वेदाङ्गपाठक इत्यन्ये। ईषदसमाप्तश्चतुर्दशवर्षश्चतुर्दशवर्षदेशीयः। 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः।' दशामुपैतो दशमीस्थ उदाहृतः, न दशमीस्थः। अपूर्णायुरित्यर्थः। संस्थितो मृतः। आभीलं कष्टम्। इत्वरो गमनशीलः। 'अभवंश्च' ही जाने से पिता ने ही पूर्णरूप से उसकी माता के स्थान की पूर्ति की और उनके द्वारा अधिकतर धैर्य धारण कराया जाता हुआ वह अपने घर पर बढ़ा। बाण के उपनयन आदि कार्य-कलाप हुए और उसका समावर्तन-संस्कार भी हो चुका। बाण की आयु चौदह वर्ष की भी पूरी नहीं होने पाई थी कि उसके पिता भी वेद (श्रुति) और धर्मशास्त्र (स्मृति) द्वारा विहित एवं ब्राह्मणजन के उचित समस्त पुण्य-कर्मों को सम्पन्न करके बिना वृद्धावस्था† को प्राप्त हुए चल बसे। पिता के मरने पर उसे महान् शोक के कारण कष्ट हुआ और दिन-रात हृदय में खौलते हुए उसने अपने घर पर ही कुछ दिन बिताये। धीरे-धीरे जब उसका शोक कम हुआ तब उसे वह स्वतंत्रता मिल गई जिससे अविनय या अनुशासनहीनता बढ़ती गई। लड़कपन में बहुत से कुतूहल हो जाते हैं। यौवन का आरम्भ धैर्य को नहीं रहने देता। इसलिए बाण शैशवकाल के उचित अनेक चपलताओं में पड़ कर आवारा (इत्वर) हो गया। अब तो उसके बहुत से सुहृद् † शङ्कर के अनुसार दशा को प्राप्त, (शत-वर्ष की) पूर्ण आयु को पहुँचा व्यक्ति दश- मीस्थ होता है। हिन्दू-संस्कृति में मनुष्य की आयु सौ वर्ष की मानी गई है, किन्तु चतुर्दश- वर्षीय बाण के पिता अभी पूर्णायु नहीं थे, चल बसे।

७४ हर्षचरितम् याश्च । तथा च । भ्रातरौ पारशवौ चन्द्रसेनमातृषेणौ, भाषाकविरी- शानः परं मित्रम्, प्रणयिनौ रुद्रनारायणौ, विद्वांसो वारबाणवास- बाणौ, वर्णकविर्वेणीभारतः प्राकृतकृत्कुलपुत्रो वायुविकारः, बन्दिनाव- नङ्गबाणसूचीबाणौ, कात्यायनिका चक्रवाकिका, जाङ्गुलिको मयूरकः, ताम्बूलदायकश्चण्डकः, भिषक्पुत्रो मन्दारकः, पुस्तकवाचकः सुदृष्टिः, कलादश्चामीकरः हैरिकः सिन्धुषेणः, लेखको गोविन्दकः, चित्रकृद्वीर- वर्मा, पुस्तककृत्कुमारदत्तः, मार्दङ्गिको जीमूतः, गायनौ सोमिलग्रहा- दित्यौ, सैरन्ध्री कुरङ्गिका, वांशिकौ मधुकरपारावतौ, गान्धर्वो- इत्यादिनात्मनस्तथाभूतकलावित्संपर्कमैश्वर्यातिशयं दर्शयति । पारशवो द्विजः शूद्रायां जातः । 'परस्त्री परश्वम्' इति बिदाद्यञ् परश्वादेशश्च । भाषागेयवस्तु- वाचस्तेषु वर्णकविः । गाथादिषु गीतविदित्यर्थः । अपभ्रंशगीतवित्† । 'पञ्चाश- द्वर्षदेशीयां वीरां संस्थितभर्तृकाम् । वदन्ति कात्यायनिकां धृतकाषायवाससम्' ‡ जाङ्गुलिको गारुडिकः । भिषग्वैद्यः । 'स्वर्णकारः कलादः स्यात्तदध्यक्षस्तु हैरिकः' । पुस्तककृल्लेप्यकारः । 'प्रसाधनोपचारज्ञा सैरन्ध्री स्ववशा स्मृता' । संवाहिका या पादादिमर्दनं विधत्ते । लासको नर्तयति यः । युवेत्यादिना वयसः समानत्वमुच्यते । और सहायक मिल गए जो उसकी अवस्था के थे और उसी के समान ( आवारा ) थे । चन्द्रसेन और मातृषेण, जो शूद्रा माता से उत्पन्न द्विजपुत्र ( पारशव ) भाई थे, भाषाकवि ईशान, जो बाण का परम मित्र था; रुद्र और नारायण, जो बाण के स्नेही थे; वारबाण और वासबाण, जो विद्वान् थे; वर्णकवि वेणी भारत; प्राकृत भाषा में रचना करने वाला कुलपुत्र वायुविकार; अनङ्गबाण और सूचीबाण, जो बन्दीजन थे; कात्यायनिका चक्र- चक्रवाकिका ; जाङ्गुलिक (विषवैद्य या गारुडी ) मयूरक पान की खिल्ली लगा कर देने वाला चंडक, भिषक्पुत्र मन्दारक, पुस्तकवाचक सुदृष्टि, स्वर्णकार चामीकर, सुनारों का अध्यक्ष या हीरा काटने वाला सिन्धुषेण, लेखक गोविन्दक, चित्रकार वीरवर्मा, मिट्टी के खिलौने बनाने वाला ( पुस्तककृत् = लेप्यकार ) कुमारदत्त, मृदङ्ग बजाने वाला जीमूत, गायक सोमिल और ग्रहादित्य सैरन्ध्री ( प्रसाधिका = बनाव सिंगार करने वाली ) कुरंगिका, वांशिक ( वंशी बजाने वाले ) मधुकर और पारावत, गान्धर्वोपाध्याय ( संगीतगुरु ) दर्दुरक, संवाहिका † यह अपभ्रंश भाषा में गीत रचना करने वाला था। ‡ कात्यायनिका-शङ्कर द्वारा उद्धृत वचन के अनुसार पचास वर्ष की अवस्था वाली, वीरा, मृतपतिका तथा काषाय वस्त्र धारण करने वाली स्त्री । 'अमरकोश' में भी—'कात्याय- न्यर्थेवृद्धा या काषायावसनाऽथवा ।' ( मनुष्यवर्ग, १७ )

प्रथम उच्छ्वासः ७५ पाध्यायो दर्दुरकः, संवाहिका, केरलिका लासकयुवा ताण्डविकः, आक्षिक आखण्डलः, कितवो भीमकः, शैलालियुवा शिखण्डकः, नर्तकी हरिणिका, पाराशरी सुमतिः, क्षपणको वीरदेवः, कथको जयसेनः, शैवो वक्रघोणः, मन्त्रसाधकः करालः, असुरविवरव्यसनी लोहिताक्षः, धातुवादविद्विहंगमः, दार्दुरिको दामोदरः, ऐन्द्रजालि- कश्चकोराक्षः, मस्करी ताम्रचूडकः । स एभिरन्यैश्चानुगम्यमानो बालतया निध्नतामुपगतो देशान्तरावलोकनकौतुकाक्षिप्तहृदयः सत्स्वपि पितृपितामहोपात्तेषु ब्राह्मणजनोचितेषु विभवेषु सति चाविच्छिन्ने विद्याप्रसङ्गे गृहान्निर्गत । अगाच्च निरवग्रहो ग्रहवानिव नवयौवनेन स्वैरिणा मनसा महतामुपहास्यताम् । अथ शनैः शनैरत्युदारव्यवहृतिमनोहृन्ति वृहन्ति राजकुलानि अक्षैर्दीव्यतीत्याक्षिको द्यूतकारः । कितवो धूर्तः । शैलाली स्वयं यो नृत्यति नटः । पाराशरी भिक्षुः । असुरविवरव्यसनी पातालाभिलाषी । धातुवादविद्रसवादज्ञः । मस्करी परिव्राट् । निध्नतामस्वातन्त्र्यम् । कौतुकेति । न पुनरर्थामिलिप्सया । एत- देव सत्स्वपीत्यादिना प्रकाशयति । निरवग्रहः स्वतन्त्रः । ग्रहवान्भूतगृहीतः । स्वैरिणा स्वतन्त्रेण । अत्युदारेत्यादिः प्रकृतोपयोगी, यस्यात्कविना तथाविधवस्तुवेदिनावश्यमेव ( पैर दबाने वाली ) केरलिका, नृत्य करने वाला ताण्डविक, आक्षिक ( पासा खेलने वाला ) शिखंडक, धूर्त भीमक, स्वयं नृत्य करने वाला युवक नट शिखण्डक, नर्तकी हरिणिका, पारा- शरी ( संन्यासी ) सुमति, क्षपणक ( जैन साधु ) वीरदेव, कथक ( कथावाचक ) जयसेन, शैव- वक्रघोण, मन्त्रसाधक कराल, पाताल में घुस कर यक्ष या राक्षस को सिद्ध करने वाला लोहि- ताक्ष, रसायन बनाने की विद्या जानने वाला विहंगम, दर्दुर नामक घटवाद्य बजाने वाला दामोदर, ऐन्द्रजालिक चकोराक्ष, मस्करी ( परिव्राजक ) ताम्रचूड । ये मित्र तथा कुछ और भी लोग बाण के साथ चलते थे । लड़कपन के कारण वह विवश हो गया । उसके मन में देशान्तरों को देखने की बड़ी उत्कण्ठा थी । यद्यपि पिता-पितामह द्वारा उपार्जित ब्राह्मणजन के उचित धन सम्पत्ति उसके घर थी और विद्या का अविच्छिन्न प्रसंग भी प्राप्त था तथापि वह घर से निकल पड़ा । जैसे किसी पर ग्रहों की बाधा सवार हो वैसे ही स्वच्छन्द होकर और नवयौवन एवं स्वतंत्र मन के कारण बड़े लोगों की खिल्ली का पात्र बना । तब उसने धीरे-धीरे बड़े-बड़े राजकुलों को देखा जिनमें होने वाले उदार व्यवहारों ने उसके मन को हर लिया । अनिन्द्य विद्याओं के ( अध्ययन-अध्यापन ) से उद्भासित गुरु- कुलों में रहा । बड़ी-बड़ी गोष्ठियों में बैठने लगा जो गुणी जनों के बहुमूल्य आलाप के कारण

७६ हर्षचरितम् वीक्षमाणः, निरवद्यविद्याविद्योतितानि गुरुकुलानि च सेवमानः, महार्या- लापगम्भीरगुणवद्गोष्ठीश्चोपतिष्ठमानः, स्वभावगम्भीरधीर्धनानि विदग्ध- मण्डलानि च गाहमानः, पुनरपि तामेव वैपश्चितीमात्मवंशोचितां प्रकृतिमभजत् । महतश्च कालात्तमेव भूयो वात्स्यायनवंशाश्रममात्मनो जन्मभुवं ब्राह्मणाधिवासमगमत् । तत्र च चिरदर्शनादभिनवीभूत- स्नेहसद्भावैः ससंस्तवप्रकटितज्ञातेयैरासैरूत्सवदिवस इवानन्दितागमनो बालमित्रमण्डलमध्यगतो मोक्षसुखमिवान्वभवत् । इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते वात्स्यायनवंशवर्णनं नाम प्रथम उच्छ्वासः। ─:०:─ मवितव्यम् । वीक्षमाण इत्यनेनात्मनः किमपि प्रकृष्टमुत्कर्षातिशययोगित्वमाह । अथ च वीक्षमाणो न तु गुरुकुलवत्सेवमानः । गाहमान इत्यनेन तेजस्वित्वमाहा- त्मनः । वैपश्चितीं विद्वज्जनोचिताम् । संस्तव आदरः । ज्ञातीनां कर्म ज्ञातेयं बन्धु- त्वम् । 'कपिज्ञात्योर्ढक्' । आसैरिति । बन्धुभिर्योगिमिश्च । योगिपक्षे बाल इव बालो मित्रो रविर्निस्तेजस्त्वात् । उक्तं च—'तपस्यन्तं रविं दृष्ट्वा निस्तेजा जायते रविः । मोक्षमार्गप्रयत्ने तु तेजो नैवास्य विद्यते ॥' इति । मित्रं सखा, सूर्यश्च मित्रः । मण्डलं समूहः । बिम्बम् । मोक्षसुखमपि सूर्यबिम्बगतैरनुभूयत इति । आख्यायिकासु कविभिर्निजवंशवर्णनं कानने तथा वंशः ख्यापितः स्यादिति । आत्मनश्च विटवर्णनम् । सकलकलाकौशलं ममास्तीति हर्षस्य चरिते च वर्णयितव्ये नाप्रस्तुतं चैतदिति शिवम् ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते प्रथम उच्छ्वासः । गम्भीर थी। बाण स्वयं स्वभाव से गम्भीर था। उसे धन-सम्पत्ति प्राप्त हुई और विदग्धजनों के मण्डल में रहा। अन्त में फिर वह अपने कुल के योग्य विद्वान् बन गया। बहुत समय के बाद फिर वह अपनी जन्मभूमि और वात्स्यायनवंशी ब्राह्मणों के गांव प्रीतिकूट में पहुँचा। वहाँ बन्धुओं ने, जिनका स्नेह-सद्भाव बहुत दिनों के बाद देखने से नवीन हो गया और जिन्होंने आदरपूर्वक अपना बन्धुत्व प्रकट किया, उत्सव के दिन की भांति उसके आगमन का अभिनन्दन किया तथा उसने बाल्यकाल के मित्रों के बीच मोक्षसुख-जैसा अनुभव किया।† श्रीमहाकविबाणभट्टविरचित हर्षचरित में 'वात्स्यायनवंशवर्णन' नामक प्रथम उच्छ्वास समाप्त। †यहाँ 'बालमित्रमण्डलमध्यगतः' के प्रयोग से यह अर्थ भी व्यञ्जित होता है कि योगी लोग निस्तेज सूर्यमण्डल के मध्य में पहुँच कर मोक्ष-सुख का अनुभव करते हैं।

द्वितीय उच्छ्वासः अतिगम्भीरे भूपे कूप इव जनस्य निरवतारस्य । दधति समीहितसिद्धिं गुणवन्तः पार्थिवा घटकाः ॥ १ ॥ रागिणि नलिने लक्ष्मीं दिवसो निदधाति दिनकरप्रभवाम् । अनपेक्षितगुणदोषः परोपकारः सतां व्यसनम् ॥ २ ॥ अथ तत्रानवरताध्ययनध्वनिमुखराणि, भस्मपुण्ड्रकपाण्डुरललाटैः कपिलशिखाजालजटिलैः कृशानुभिरिव क्रतुलोभागतैर्बटुभिरध्यास्यमा- अतीत्यादि । यस्य क्रोधादिभावगण इङ्गितादिना परेण न चेत्यते स गम्भीरः । उक्तं च—'यस्य प्रसादादाकारात्क्रोधहर्षभयादयः । भावस्या नोपलभ्यन्ते तद्गाम्भी- र्यमुदाहृतम् ॥' इति । अगाधश्च । अवतरणमवतारः, प्रवेशनम् । अवतरन्ति येने- त्यवतारः, सोपानादिश्च । समीहितसिद्धिं राजगृह आत्मनः प्रवेशलक्षणम् जल- ग्रहणलक्षणं च । गुणा औदार्यादयः, आकर्षणरज्जुवश्च । पार्थिवा राजानः, पृथ्वो- विकाराश्च । घटयन्ति वाञ्छितेन प्रयोजयन्तीति घटकाः, कुम्भाश्च । अनेन तादृशे राज्ञि बाणस्य कृष्ण एव समीहितसिद्धिरध्यास्यत इति सूचितम् ॥ १ ॥ रागिणि रक्ते, विषयाभिलाषिणि च । लक्ष्मीं शोभाम्, समृद्धिं च । अत्र नलिना- दिकमप्रस्तुतम् बाणाद्यास्तु प्रस्तुताः । अनेन कृष्ण ईदृशे बाणे राजप्रभवां श्रियं निधास्यतीत्युक्तम् ॥ १ ॥ अथेत्यादिना । बाणो बान्धवानां भवनानि भ्रमन्सुखमतिष्ठदिति संबन्धः । शिखा चूडा, ज्वाला च । सोमो यज्ञियं द्रव्यम् । केदारिका स्वल्पं क्षेत्रम् । प्रघटनेषु तथो- चितत्वात् । अहरिता हरिताः संपद्यमाना हरितायमानाः लोहितादित्वात्क्यङ् । जैसे किसी गहरे कुएँ से जल लेने के लिए सोपान आदि के अभाव से उतरना कठिन है ऐसी स्थिति में डोर के साथ घड़े की सहायता से जल निकालते हैं, उसी प्रकार अत्यन्त गम्भीर वाले राजा के पास न पहुँच पाया हुआ व्यक्ति गुणवान् संयोजक लोगों की सहायता से ही अपनी इष्ट-सिद्धि कर पाता है† ॥ १ ॥ राग से भरे हुए कमल में दिन सूर्य से उत्पन्न शोभा-सम्पत्ति को आहित कर देता है । दूसरे का उपकार करना सज्जनों का एक स्वाभाविक व्यसन होता है, जिसमें वे किसी के गुण-दोष की ओर ध्यान नहीं देते‡ ॥ २ ॥ वहाँ तब बाण स्नेहपूर्वक अपने चिरदृष्ट बन्धु-बान्धवों के घर जा-जाकर मिलता हुआ सुख से रहने लगा । ब्राह्मणों के वे घर निरन्तर अध्ययन की ध्वनि से मुखरित हो रहे † यहां गुणवान् पार्थिव घटक से कृष्णवर्धन का संकेत है जिन्होंने बाण की इष्टसिद्धि, उसे हर्षवर्धन से मिला कर, की थी । द्वितीय उच्छ्वास में यही प्रसंग वर्णित है । ‡ दिवस अर्थात् कृष्ण, सूर्य अर्थात् सम्राट् हर्ष से शोभा-सम्पत्ति लेकर नलिन अर्थात् बाण को अर्पित करते हैं, यह प्रस्तुत में तात्पर्य है ।

७८ हर्षचरितम् नानि, सेकसुकुमारसोमकेदारिकाहरितायमानप्रघनानि, कृष्णाजिन- विकीर्णशुष्यत्पुरोडाशीयश्यामाकतण्डुलानि, बालिकाविकीर्यमाणनीवार- बलीनि, शुचिशिष्यशतानीयमानहरितकुशपूलीपलाशसमिन्धि, इन्धनगो- मयपिण्डकूटसंकटानि, आमिक्षीयक्षीरक्षारिणीनामग्निहोत्रधेनूनां खुरवल- यैर्विलिखिताजिरवितर्दिकानि, कमण्डलव्यमृत्पिण्डमर्दनव्यग्रयतिजनानि, वैतानवेदीशङ्कव्यानामौदुम्बरीणां शाखानां राशिभिः पवित्रितपर्यन्तानि वैश्वदेवपिण्डपाण्डुरितप्रदेशानि, हविर्धूमधूसरिताङ्गणविटपिकिसलयानि, वत्सीयबालकलालितललत्तरलतर्णकानि, क्रीडत्कृष्णसारच्छागशावक- प्रघनान्यङ्कनानि । 'उशन्ति प्रघनामिरूयामेकदेशे तु वेश्मनः' । पुरोडाशीयेत्यादि सहितेत्यर्थं ईयंः। बालिका कुमार्यः । नीवारा अकृष्टपच्या व्रोहयः । कूटो राशिः । आमिक्षीयमिति । तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेवामिक्षा । 'आमिक्षा सा शृतोष्णे या क्षीरे स्याद्दधियोगतः' इति । तस्यै हितमामिक्षीयम् । आमिक्षाप्रकृतित्वमस्य च योग्यत्वात् । अग्निहोत्रेषु तस्या अनाम्नातत्वात्, यद्वा, —यदन्नस्य जुहुयादिति । यस्या अपि हवनं भवत्येव । वलयैः समूहैः । वितर्दिका वेदिका । कमण्डलुमुनिकर कस्तस्मै हिताः कमण्डल्व्याः । 'उगवादिभ्यो यत्' । यतीनां निष्किञ्चनत्वादादरत्त्वाच्च स्वयंकरणम् । वितानो यज्ञः, तत्र भवा वैतानो यज्ञाग्निकार्यभूः । शंकुः कीलकः, तस्मै हितः शङ्कव्यः । औदुम्बरीणामिति । तासां याज्ञियत्वात् । वत्सेभ्यो हिता वत्सी- याः वत्सपरिचर्यातुराः तर्णकाः सद्योजाता वत्साः । कृष्णसारेति छागविशेषणम् । थे । त्रिपुण्ड भस्म से मस्तक को उज्ज्वल किए हुए सोमयज्ञों के लोभी वटु वहां इकट्ठे थे जो कपिल वर्ण वाली ज्वाला की जटाओं से शोभित अग्नि के समान प्रतीत होते थे । आंगनों में सोम की क्यारियां सींचने से हरी हो रही थीं । बिछे हुए कृष्णाजिन पर पुरोडाश बनाने के लिए सांवा पसार कर सुखाया जा रहा था । कुमारी कन्याएँ बिना जोत के पके हुए नीवारों की बलि बिखेर रही थीं । सैकड़ों शिष्य पवित्र होकर कूशा की हरी आंटियाँ और पलाश की समिधाएँ इकट्ठी कर रहे थे । जलावन के लिए लिए गोबर के कण्डो का ढेर लगा था । आमिक्षा† बनाने के योग्य दूध देने वाली गौएँ अपने खुरों से आँगन की वेदियाँ कोड़ रही थीं । यती लोग कमण्डलुओं को मिट्टी से मलने में व्यग्र थे । वैतान अग्नियों की वेदी में लगाए जाने वाले शंकुओं के लिए गूलर की शाखाएँ किनारे रखी थीं । स्थान स्थान पर वैश्वदेवों के उजले पिण्डे रख दिए गए थे । आँगन के पेड़ के पत्ते यज्ञ- धूम से बिलकुल धूमिल हो रहे थे । देख-रेख करने वाले लड़के उचकते हुए सद्योजात † एक प्रकार का दूध से बना यज्ञीय पदार्थ । यह तप्त दूध में दही डाल कर बनाया जाता है और वैश्वदेव के लिए अर्पित किया जाता है ।

द्वितीय उच्छ्वासः ७९ प्रकटितपशुबन्धप्रबन्धानि, शुकसारिकारब्धाध्ययनदीयमानोपाध्यायविश्रा- न्तिसुखानि, साक्षात्त्रयीतपोवनानीव चिरदृष्टानां बान्धवानां प्रीयमाणो भ्रमन्भवनानि, बाणः सुखमतिष्ठत् । तत्रस्थस्य चास्य कदाचित्कुसुमसमययुगमुपसंहरञ्जृम्भत ग्रीष्मा- भिधानः समुत्फुल्लमल्लिकाधवलाट्टहासो महाकालः । प्रत्यग्रनिर्जितस्यास्त- मुपगतवतो वसन्तसामन्तस्य बालापत्येष्विव पयःपायिषु नवोद्यानेषु दर्शितस्नेहो मृदुरभूत् । अभिनवोदितश्च सर्वस्यां पृथिव्यां सकलकुसुमबन्धन- तदुक्तम्—'लोहितसारङ्गः कृष्णसारङ्गो वा' इति; सारङ्गशब्दः शबले वर्तते । कृष्ण- सारा मृगा इति केचित् । तन्न । तेषां तदानुपयुक्तत्वात् । पशुबन्धा यज्ञाः । कुसुमसमयो वसन्तः, स एव युगं कल्पस्तल्लक्षणं वा युगं मासद्वयम् । समुत्फु- ल्लमल्लिकाभिर्धवला अट्टा विक्रयस्थानानि तेषां विकासो यत्र, अन्यत्र—तद्वदट्ट- हास उद्धतं हसितं यस्य । शब्दशक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्यरूपो ध्वनिश्च । प्रकृतवर्णने ह्यन्यदप्यत्र प्रतीयते । न वाच्यतया । तथा च—महाकालः, साट्टहासः कल्पमुप- संहरञ्जृम्भते मुखं च विदारयति । महान्कालो ग्रीष्माख्यः भैरवश्च । पयो जलम्, क्षीरं च । बालापत्यपक्षे—नवमुग्धान्मुद्गमनं येषां तेषु । इदमप्रथमतयागमनप्रवृत्ते- ष्वित्यर्थः । दर्शितस्नेह इत्यनेनास्य विजिगीषुव्यवहार आरोपितः । निर्जितस्य च पुनः प्रतिष्ठापनमेव युक्तम् । स्नेहः आर्द्रता, प्रीतिश्च । मृदुरकठोरः सदयश्च । अभिन- वोदित इति साधारणं विशेषणम् । वासन्तिकपुष्पाभिप्रायेण सकलपदबन्धनं वृन्तकारी च । प्रतपन्प्रकर्षेण तपन्; अन्यत्र,—शत्रुहृदयेषु प्रतापं जनयन् । अभिन- वोदितश्च राजा बन्धनमोक्षं करोति । उक्तं हि—'युवराजाभिषेके वा परचक्रावरो- पणे । पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बन्धनस्य विधीयते ॥' इति । आदरप्रतिपादनाय बछड़ा को प्यार कर रहे थे। कलोल करते हुए काले छाग शावक को देखकर वहाँ पशुबंध की तैयारी मालूम हो रही थी। शुक-सारिकाएँ स्वयं अध्ययन कराकर गुरुओं को विश्राम का सुख दे रही थीं मानों ब्राह्मणाधिवास के वे भवन त्रयीविद्या के साक्षात् तपोवन थे। यहाँ बाण के रहते हुए वसन्त के दो महीनों का उपसंहार करता हुआ महाकाल ग्रीष्म में फूली हुई चमेली के अट्टहास के साथ जंभाई लेने लगा। † अभी-अभी पराजित होकर अस्तंगत होते हुए वसन्तरूपी सामन्त के दुधमुँहे नवजात बाल-बच्चों के समान जल से सींचे जाने वाले नये-नये उद्यानों पर (ग्रीष्म) स्नेह दिखलाता हुआ मृदु व्यवहार करने लगा। प्रताप फैलाते † यह वाक्य साहित्यशास्त्र में शब्दशक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्यरूप ध्वनि का प्रसिद्ध उदाहरण है। यहाँ अप्रकृत अर्थ शब्द की शक्ति से इस प्रकार व्यञ्जित होता है—कल्प का अन्त (उप- संहार) करते हुए महाकाल या भैरव (शिव) ने विकसित मल्लिका के समान उज्ज्वल अट्टहास करते हुए जम्हाई ली।

मोक्षमकरोत्प्रतप्तमुष्णसमयः । स्वयमृतुराजस्याभिषेकार्द्राश्चामरकलापा इवागृह्णन्त कामिनीचिकुरचयाः कुसुमायुधेन, हिमदग्धसकलकमलिनी- कोपेनेव हिमालयाभिमुखीं यात्रामदादंशुमाली । अथ ललाटंतपे तपति तपने चन्दनलिखितललाटिकापुण्ड्रकैरळक- चीरचीवरसंवीतैः स्वेदोदबिन्दुमुक्ताक्षवलयवाहिभिर्दिनकराराधननियमा इवागृह्यन्त ललनाललाटेन्दुद्युतिभिः । चन्दनधूसराभिरसूर्यम्पश्याभिः कुमुदिनीभिरिव दिवसमसुप्यत सुन्दरीभिः । निद्रालसा रत्नालोकमपि नासहन्त दृशः, किमुत जरठमातपम् । अशिशिरसमयेन चक्रवाकमिथुना- स्वयं शब्दः । अभिषेकः स्नानम् । अन्यत्र-मङ्गलजलपातनं तत्संपर्कवशाच्चार्द्रत्वम् । चिकुराः केशाः । ते हि तदा स्नानाद्र्रतया संयमनात्सुन्दरतया विशेषतः शृङ्गार- मुद्दीपयन्ति । तथा च महाकवेः कालिदासस्य—'स्नानाद्र्रमुक्तेष्वनुधूपवासं विन्य- स्तसायंतनमल्लिकेषु । कामो वसन्तात्ययमन्दवीर्यः केशेषु लेभे रतिमङ्गनानाम्' ॥ यथा वा राजशेखरस्य—'तदा ते स्नातानां दरदलितमल्लीमुकुरिणाम्' इत्यादि । हिमाभिप्राये च हिमालयग्रहणम् । अंशून्मलति धारयतीत्यनेन हिमं प्रतिमवन- शीतळत्वमस्योच्यते । ललाटं तपतीति ललाटंतपः इति खश् । खरतर इत्यर्थः । ललाटेऽलंकारो ललाटिका । 'कर्णललाटात्कनलंकारे' । ललाटिकैव पुण्ड्रकं तिलकमिति सर्वत्र रूप- कम् । संवीतैः प्रावृतैः । चन्दनेन च तद्वद्धूसराः । असूर्यम्पश्याभिरिति । आतपासहिष्णुतया । अन्यत्र,—स्वभावात् । दिवसं सुप्यत इति द्रव्यकर्मणि लादि- विधानात्कर्मणि द्वितीयेव । भावे लः । यदा तु कर्माप्याख्याततया विवक्ष्यते तदा दिवसः सुप्यत इति भाव्यमिति निर्णीतम् । स्वापो निद्रा, मुकुलत्ता च । जरठं कठोरम् । यतो ग्रीष्मेण तनूकृता अत आह—चक्रवाकेत्यादि । रात्रौ किल हुए उषाकाल ने समस्त पृथिवी पर नवोदित होकर उसने फूलों के बन्धन खोले (जैसे राजा वन्दीगृह से बन्दियों को छोड़ता है ।) ऋतुराज वसन्त के अभिषेक द्वारा आर्द्र हुए सुन्दरियों के चामरकलाप के समान केशपाश में कुसुमायुध कामदेव ने साक्षात् निवास किया । सूर्य ने मानों हिम के कारण जली-कटी समस्त कमलिनियों के कोप से हिमालय की ओर यात्रा की । अब ललाट को तप्त करने वाले सूर्य तपने लगे । कमलिनियों के ललाटरूपी चन्द्रमा चन्दन के तिलक लगा, बालों के वस्त्रखण्ड पहन और पसीना के कणों को मुक्ता से बनी जपमालिका धारण कर सूर्य की नियमित रूप से उपासना करने लगे । चन्दन के लेप से धूसर वर्ण वाली सुन्दरियाँ कुमुदिनियों के समान सूर्यांतप के न सहन करने से दिन में CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

भिनन्दिताः सरित इव तनिमानमानीयन्त सोडुपाः शर्वर्यः । अभिनव- पटुपाटलामोदसुरभिपरिमलं न केवलं जलम्, जनस्य पवनमपि पातु- मभूदभिलाषो दिवसकरसन्तापात् । क्रमेण च खरखगमयूखे खण्डितशैशवे, शुष्यत्सरसि, सीदत्स्रोतसि, मन्दनिर्झरे झिल्लिकाझांकारिणि, कातरकपोतकूजितानुबन्धबधिरितविश्वे, श्वसत्पतत्त्रिणि, करीषंकषमरुति, विरलवीरुधि, रुधिरकुतूहलिकेसरि- किशोरकलिह्यमानकठोरधातकीस्तबके, ताम्यत्स्तम्बेरमयूथवमथुतिम्यन्म- हामहीधरनितम्बे, दिनकरदूयमानद्विरददीनदाना श्यानदानश्यामिकालीन- मूकमधुलिहि, लोहितायमानमन्दारसिन्दूरितसीम्नि, सलिलस्यन्दसंदोह- चक्रवाकानां वियोगो भवतीत्यल्पतया तैस्ता अभिनन्द्यन्ते । सरितश्च वृत्तिकारिका- स्तेषामिति तदभिनन्दनम् । उडुपः शशी, प्लवश्च । क्रमेण चेत्यादौ । एवंविधे निदाघकाले कठोरीभवति सत्युन्मत्ता मातरिश्वानः प्रावर्तन्तेति संबन्धः । खगो रविः । शुष्यदिति साभिप्रायम् । स्रोतसश्च प्रस- रणधर्मत्त्वादाह-सीददिति । समन्तादावेगगामिनः । झिल्लिका चीरीनामकः प्राणी यो वर्षासु तरुषु सीत्कारमुच्चैः करोति । कातरेति । कपोता हि मेदो- मयत्वाच्चित्तान्तं घर्मासहाः । अत एव पतत्त्रित्वेऽपि पृथगुपादानम् । पतत्त्रित्वामि- प्रायेण श्वासमित्येतावदेव समुचितम् । एषां तथाभूतरुजाभावात् । करीषो गोमयम् । वीरुत्सपर्णशाखाजटिलं कुप्यकादि । किशोरकेति । बालत्वेन तृष्णाचसहिष्णुता, मुग्धतातिशयश्च द्योत्यते । धातकी लताभेदः । स्तबकः पुष्पगुच्छः । स्तम्बेरमो हस्ती । वमथुः करिकरशीकरः । तिम्यन्त आर्द्रीभवन्तः । नितम्बाः सानवः । द्विरदाः करिणः । दीनं क्षीणम् । आश्याना अप्रसरणधर्मंकत्वादीपच्छुष्कश्यामिका मदलेखासंबन्धिनी । लीना अतितर्षान्च्श्लिष्टाः । मूका गुञ्जितहीनाः । अलोहितम् लोहिता भवन्तो लोहितायमानाः । मन्दाराः पारिभद्रद्रुमाः । सिन्दूरिता आहित- ही शयन करने लगीं। निद्रा से अलसाई हुई आँखें रत्नों के तेज को भी नहीं सहन कर सकती थीं, कठोर आतप की तो बात ही क्या ? ग्रीष्मकाल के कारण चक्रवाक पक्षियों के जोड़ों में अभिनन्दित चन्द्र के साथ रातें नदियों की भाँति क्षीण होने लगीं। सूर्य का सन्ताप इतना बढ़ गया कि लोग न केवल नये खिले हुए पाटल के पुष्पों से सुगन्धित जल को पीना चाहते थे, बल्कि इस तरह की सुगन्ध से भरी हवा को भी पीने की उन्हें इच्छा होती थी । क्रमशः निदाघकाल कठोर होता गया । सूर्य का बालपन घटने लगा । तालाब सूखने लगे । प्रवाह शान्त होने लगे । झरने मन्द पड़ गए । झिल्लियाँ झंकारने लगीं । कपोतों के निरन्तर आर्त्त स्वर से सारा विश्व भर गया । पक्षी हाँफने लगे । गोबर बटोरने वाली हवाएँ चलने लगीं । लताएँ कहीं-कहीं बच रही थीं। धातकी के लाल-लाल गुच्छों को रुधिर के. . ६ ह०

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ८२ हर्षचरितम्

संदेहमुह्यन्महामहिषविषाणकोटिविलिख्यमानस्फुटत्स्फटिकदृषदि, घर्म- मर्मरितगर्मुति, तप्तपांशुकुकूलकातरविकिरे, विवरशरणश्वाविधे, तटार्जुन- कुररकूर्जाज्वरविवर्तमानोत्तानशफरशारपङ्कशेषपल्वलाम्भसि, दावजनित- जगन्नीराजने, राजनीराजयक्ष्मणि, कठोरीभवति निदाघकाले प्रतिदिश- माटीकमाना इवोषरेषु प्रपावाटकुटीपटलप्रकटलुण्ठकाः, प्रपक्वकपिकच्छू- च्छूच्छटाच्छोटनचपलैरकाण्डकण्डूला इव कर्षन्तः शर्करीलाः कर्करास्थलीः,

'सिन्दूरा इव । लोहितत्वात् । ग्रामस्य ग्रामान्तरेण मर्यादा सीमा । स्यन्दः स्रुतिः । विलिख्यमाना विपाट्यमानाः । मर्मरिताः शुष्कत्वेन शब्दद्रायमानाः । गर्मुतो लताः । कुकूलं तुषाग्निः । विकिराः कुक्कुटाद्याः । श्वाविधः शललाः सेहिकाख्या हिंस्राः प्राणिनः । तटशब्देन नैकट्यमाह । अर्जुनाः ककुभवृक्षाः । कुरराः क्रौञ्चपक्षिणः । कूजा शब्द एव संतापकारित्वाज्ज्वरस्तेन स्फुरन्तः शफरा मत्स्यास्तैः । शारं सितोद- रत्वात् । पल्वले नड्वले । कुररास्तटस्था यदा कूजन्ति तदा मत्स्याः पीडताः सन्त उत्प्लवन्तीति वस्तुधर्मोऽयम् । नीराजनमिति । नीराजनं शान्तिकर्म । राजयक्ष्मा क्षयव्याधिः । शनैः शनैरपचयकारित्वात् । मातरिश्वानः कीदृशाः प्रावर्तन्ते- त्याह—प्रतिदिशमित्यादि । आटीकमाना उच्चैर्भ्रमन्तः । साभिप्रायमेतत् । रजो- वशादेतेषां तथाविधसंनिवेशात् । ग्रीष्म ह्येवंविधा मारुताः प्रावर्तन्तेति कालधर्मः । उन्मत्तपक्षे—आटीकमाना इत्यादि सर्वं वक्ष्यमाणयोग्यतया योजनीयम् । उद्धत- भ्रमणाद्या ह्युन्मादस्यानुभावाः । तदुक्तम्—'अनिमित्तहसितरुदितोत्कृष्टाबद्बप्रलापश- यनोत्थितप्रधावितवृत्तगीतपठितस्मितपांसवधूनननिर्माल्यचीरघटवक्त्रशरावाभरण- स्पर्शानोपभोगैरन्यैश्चाव्यवस्थितचेष्टानुककरणादिभिरनुभावैरभिनयेत्' इति । ऊषरं सिकताबहुलो रूक्षो देशः । प्रपा सत्रम् । वाटः कुनालम् । पटलं छदिः । कपिकच्छूः

भ्रम से शेर के बच्चे चाटने लगे । घाम की गर्मी से उफने हुए हाथी अपनी सूँड से गाज उछाल कर पर्वत के मध्यभाग को सींचने लगे । सूर्य के कारण कष्ट में पड़े हुए हाथियों के क्षीण मद की श्यामलेखाओं पर भौंरे मूक होकर बैठ गए । मन्दार के सिन्दूरिया फूलों से सीमाएँ लाल हो गईं । जल के भ्रम से मोह में पड़े भैंसे सींगों के अग्र भाग से स्फटिक के पत्थरों को उपाटने लगे । लताएँ घाम से सूख कर खरखराने लगीं । भूसे की आग के समान तपती धूल से मुर्गे आदि व्याकुल हो उठे । सेही बिल में घुसने लगे । किनारे के अर्जुन वृक्षों पर बैठे हुए क्रौञ्च पक्षी कड़ी आवाज में बोलने लगे, जिससे डरकर सूखते हुए तालाबों की मछलियाँ तड़फड़ा उठती थीं । वनाग्नियां इस तरह लगने लगीं जैसे सारे जगत् की आरती उतार रही हों । वह निदाघकाल रात्रि का क्षय रोग बन गया और वह घटने लगीं । चारों ओर अंधड़ के रूप में उन्मत्त हवा चल पड़ी । बलुहट सीवानों में ऊँची उड़ान भरने लगीं । पनसाले और राह की कुटियों की खपड़पोश छाहों की सामने लूट होने लगी । पके किवाच के गुच्छों के साथ छेड़छाड़ करने की गुस्ताखी के कारण उठी हुई खाज को

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द्वितीय उच्छ्वासः ८३ स्थूलदृषच्चूर्णमुचः, मुचुकुन्दकन्दलदलनदन्तुराः, संतततपनतापमुखर- चीरीगणमुखशीकरशीक्यमानतनवः, तरुणतरतरणितापतरले तरन्त इव तरङ्गिणि मृगतृष्णिकातरङ्गिणीनामलीकवारिणि, शुष्यच्छमीमर्मरमारव- मार्गलङ्घनलाघवजवजङ्घालाः, रैणवावर्त्तमण्डलीरेचकरासरसरभसारब्ध- नर्त्तनारम्भारभटीनटाः, दावदग्धस्थलीमषीमिलनमलिनाः शिक्षितक्षपणक- कण्डूदायको द्रव्यभेदः । अत एवाह—कर्षन्त इति । शर्कराः पाषाणकणिका विद्यन्ते यासु ताः शर्करिलाः । पिच्छादित्वादिलच् । कंकरस्थली ऊषरभूः पाषा- णभूः । अत एवाह—स्थूलेत्यादिना । मुचुकुन्दं पुष्पभेदः । कन्दलं नवना- लम् । दन्तुरा इति । कपिकच्छुस्पर्शचालनेन च ये कण्डूलास्तादृशाश्चूर्णमुचः प्रकटदन्ताः परुषं कषन्ति । शीक्यमानाः सिच्यमानाः । तरुणतरः प्रौढः । तर- णिरादित्यः । तरन्त इवेति । बालुकावशात्तथा लक्ष्यमाणत्वात् । मृगतृष्णिका मरीचिका । तृषितमृगाणां रविरश्मिखचितासु सिकतासु नीलत्वदर्शनाज्जलबुद्धिः । वारिणीति । सतरङ्गे वारिणि ये समीकास्ते सतापं देशं तरन्ति । उन्मत्तपक्षेऽपि विचित्तत्वेनैवंकारित्वम् । शम्योऽग्निगर्भा वल्लरीभेदाः । लाघवं नैपुण्यम् । सव्यायामाध्व विषमं मार्गं लाघवेन तरन्ति । जङ्घाला वेगवन्तः । रैणवावर्ताः पांसुसंबन्धिन आव- र्त्तनरूपाः संनिवेशास्तेषां मण्डली समूहः । रेचयति पृथक्करोतीति रेचकम् । रैणवावर्त्तमण्डल्या रेचकं तथा रासे रसिते यो रसस्तेन यो रभसस्तद्वशेनैवारब्धं यन्न- र्त्तनमिव नर्तनं तदारम्भे विषय आरभटीनटा इव आरभटीनटाः । ईरयन्तीति अराः । अराश्च ते भटा अरभटाः । तेषामियमारभटी नटजातिविशेषो वीररसप्रधानः । उक्तं च—‘प्लुतावपातप्लुतगर्जितानि च्छेद्यानि मायाकृतमिन्द्रजालम् । चित्राणि यूथानि च यत्र नित्यं तां तादृशीमारभटीं वदन्ति ॥’ इति; नृत्तपक्षे—आवर्त्ता छटपटाहट से भुइयाँलोट हवा कंकरीली धरती में मानों अपनी देह रगड़ रही थी । पत्थरों के मोटे-मोटे कण बरसने लगे । मुचुकुन्द और कन्दल की कलियाँ छँट-छँट कर गिरने लगीं । सूर्य की गर्मी से व्याकुल होकर चिल पक्षी मुँह से गाज निकालने लगे । मृग- तृष्णिका रूपी नदियों के झूठे बहते हुए प्रवाह में मानों निदाघकाल की हवा सूर्य के अधिक ताप के कारण तैर रही थी । शमी के सूखे पत्ते मरुभूमि के मार्गों पर बिछे हुए थे जिन पर मर्मर करती हवा दौड़ लगा रही थी । धूल के बवंडर जगह बदलते हुए ऐसे लगते थे मानों रास के अवसर पर आनन्द-वेग से आरभटी‡ नृत्य में नट नाच रहे हों । † 'रास' एक प्रकार का प्राचीन समूह-नृत्य था । शङ्कर के उद्धृत श्लोक के अनुसार आठ, सोलह या बत्तीस आदमी मण्डल बनाकर जब नृत्य करते थे तब यह नृत्य 'रास' कहलाता था । ‡ यह एक प्रकार की नृत्य-शैली है जिसमें उछल-कूद, मारकाट, माया, इन्द्रजाल के दृश्य झुण्ड में नृत्य द्वारा प्रदर्शित किये जाते थे ।

८४ Digitized by Arya Samaj Fहर्षचरितम् Chennai and eGangotri वृत्तय इव वनमयूरपिच्छचयानुच्चिन्वन्तः, सप्रयाणगुञ्जा इव शिञ्जान- जरत्करञ्जमञ्जरीबीजजालकैः सप्ररोहा इवातपातुरवनमहिषनासानिकुञ्ज- स्थूलनिःश्वासैः, सापत्या इवोड्डीयमानजवनवातहरिणपरिपाटीपेटकैः, स- भ्रुकुटय इव दह्यमानखलधानबुसकूटकुटिलधूमकोटिभिः, सावीचीवीचय इव महोष्ममुक्तिभिः, लोमशा इव शीर्यमाणशाल्मलिफलतूलतन्तुभिः, दद्रुणा इव शुष्कपत्रप्रकराकृष्टिभिः, शिराला इव तृणवेणीविकरणैः उच्छ्र- मश्व इव धूयमाननवयवशूकशकलशङ्कुभिः, दंष्ट्राला इव चलितशलल- आवृत्तयः । यदाह मुनिः—'यदा नृत्तवशादङ्गं भूयोभूयो निवर्तते । तत्राद्यमभिनेयं स्याच्छेषं नृत्ते नियोजयेत् ॥' इति । मण्डलीनृत्तं हल्लीशकम् । यदाह—'मण्डलेन तु यन्नृत्तं हल्लीशकमिति स्मृतम् । एकस्तत्र तु नेता स्याद्गोपस्त्रीणां तथा हरिः ॥' इति । रेचकास्त्रयः—कटीरेचकः, हस्तरेचकः, ग्रीवारेचकश्चेति । रासलक्षणम्— 'अष्टौ षोडशद्वात्रिंशद्यत्र नृत्यन्ति नायकाः । पिण्डीबन्धानुसारेण तन्नृत्तं रासकं स्मृतम् ॥' इति । अस्यैव तु हल्लीमकाद्या विशेषाः । क्षपणकवृत्तय इवेति । क्षपण- काश्च मषीमलिना बर्हिपिच्छानि शास्त्रचोदनया वहन्ति । उन्मत्तपक्षे—निर्विवेक- तया मयूरपिच्छचय इत्युक्तं प्राक् । गुञ्जन्तोति गुञ्जा ढक्काभेदाः । उन्मत्तानां नृत्ता- वसरे सर्वं एव करतलादि वादयन्ति । शिञ्जानाः शब्दायमानाः । करञ्जो वृक्षभेदः । प्ररोहोऽङ्कुरः । उन्मत्ता अपि खेदान्निःश्वसन्ति । सापत्या इवेति । उन्मत्ता अपि श्वभ्रादिपतनभयादपत्यानि न त्यजन्ति । पेटकैर्यूथैः । सभ्रुकुटय इवेति । दह्यमाना- मिप्रायेणोक्तम् । उन्मत्ता अपि क्रोधप्राया एव । क्रोधस्य भृकुट्यादयोऽनुभावाः । खलधानं क्षोदादिदेशः । क्षुद्यमानं धान्यमित्यन्ये । सस्यस्य ज्वालाभावाद् धूमवर्णनं समुचितम् । कुटिलपदेन च भृकुटीसादृश्यमाह । अवीचिनंरकभेदस्तस्य वीचय इव वीचयो ज्वालाः । महोष्मेति । उन्मत्ता अपि खेदादिवशादूष्मायन्ते । लोमशा इवेति । उन्मत्ता अपि क्षुरकर्म विना लोमशाः । तूलं कार्पासः । दद्रूः कुष्ठविकारः । साऽस्यास्तीति दद्रुणः । 'दद्रूवा ह्रस्वत्वं च' इति नः । उन्मत्ता अप्युद्वर्तनं विना दाव से जली हुई भूमियों में रगड़ मारने से हवा स्याह हो गई थी। पवनों ने मानों मलिन वेश धारण किये हुए जैन साधुओं के आचार सीख कर वन-मयूरों के पंख ग्रहण करना आरम्भ कर दिया । करंज नामक वृक्ष की मंजरियों के बीज हवा से इस प्रकार बजने लगे मानों प्रस्थान का ढक्का बज उठा हो । घाम से पीड़ित वनैले भैसों की माला से मोटे निश्वास इस तरह निकल रहे थे मानों उस हवा के प्ररोह फूट रहे हों । तेज दौड़ने वाले वातहरिण के यूथ इस प्रकार उड़ने लगे मानों पवन के बच्चे हों । भूसे की जलती हुई ढेर की टेढ़ी धूमरेखा से ऐसा लगता था मानों हवा ने अपनी भौंहें टेढ़ी की हों। गर्मी इस तरह बरसती थी मानों अवीचि नामक नरक की ज्वाला हो । सेमल के ढोढों के फटने से रुई बिखर रही थी, मानों हवा के रोंगटे हों। दाद के रोगी की भाँति हवा सूखे CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

द्वितीय उच्छ्वासः ८५ Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सूचीशतैः, जिह्वाला इव वैश्वानरशिखाभिः, उत्सर्पंतसर्पकञ्चुकैश्चूडाला इव ब्रह्मास्तम्भरसाभ्यवहरणाय कवलग्रहमिवोष्णैः कमलवनमधुभिरभ्य- स्यन्तः सकलसलिलोच्छोषणघर्मघोषणाघोरपटहैरिव शुष्कवेणुवनास्फो- टनपटुरवैस्त्रिभुवनबिभीषिकामुद्भावयन्तः, च्युतचपलचाषपक्षश्रेणीशारित- सृतयः, त्विषिमन्मयूखलतालातप्लोषकल्माषवपुष इव स्फुटितगुञ्जाफल- स्फुलिङ्गाङ्गाराङ्किताङ्गाः, गिरिगुहागम्भीरभांकारभीषणभ्रान्तयः, भुवन- दद्रूयुक्ता भवन्ति । शिरालाः प्रकटस्नायवः । उन्मत्ता अपि कृशत्वाच्छिराला भवन्ति । वेणी पङ्क्तिः । शिरासादृश्यप्रतिपादनाय वेणीपदम् । श्मश्रुः कूर्चंः । शुकाः किशारवः । उन्मत्ता अपि केशवपनाभावाद्दीर्घश्मश्रवः । दंष्ट्रा बहिर्निर्गता दन्ताः । शललः श्वावित् । सूची दीर्घकण्टकरूपाणि रोमाणि, अन्ये तु—दंष्ट्रालाः शललाः, श्वाविधः पक्षाश्च शलला उच्यन्ते । तथा च—'श्वाविधः शललैरिव' इति महाभारते दृश्यत इत्याहुः । उन्मत्ता अप्येवमादिविकारेण सर्वं मीषयन्ते । एवं जिह्वाला अपि । एवमेव स्नानादिना विनोन्मुक्तचूदत्वादुत्सर्पदित्यादि । कञ्चुकं त्वक् । ब्रह्मास्तम्भो ब्रह्माण्डः । रसाभ्यवहरणं शोषणम्, रसानां च मधुरादीनां भोजनम् । 'असंचार्यों मुखे पूर्णे गण्डूषः केवलोऽन्यथा' । अभ्यस्यन्त इति । एवमिदं शोष- 'यिष्याम इति । घर्मो ग्रीष्मः । घोषणा श्रावणा । विभीषिकामिति । ये सगर्वा जगद्ग्रसनशीलास्ते त्रिभुवनेऽपि भयमुत्पादयन्ति । चाषः किकीदिविः पक्षिभेदः । उन्मत्तपक्षे—विस्मरणशीलत्वाच्च्युतेत्यादि योज्यम् । सृतिर्मार्गः । त्विषिमान् रविः । अलातमुल्मुकम् । कल्माषं रक्तकृष्णम् । गुञ्जा रक्तिका । उपलानि लोहितकृष्णानि भवन्ति । स्फुलिङ्गा अग्निकणाः । अङ्गाराङ्कितानीवाङ्गाराङ्कितानि दग्धान्यङ्गानि । ये च साङ्गारास्ते मलिनशरीरा भवन्ति । उन्मत्ता अप्यग्निशस्त्रश्वभ्रादिषु बलादति- पतन्ति । भांकारभीषणा भ्रमन्ति च ॥ अभिचार उच्चाटनम् । अभिचारिणश्चोच्चा- पत्तों का खुजाने क लिए बटारने लगीं। हवा की शिराओं के समान तिनके उड़ने लगे। जब कि नुकीली शिखाएँ वायु की बढ़ी हुई दाढ़ी के समान हिल रही थीं। उड़ते हुए शलल के सैकड़ों कांटेदार रोंगटे हवा के दाँत के समान थे। आग की लपटें हवा की जीभ हो रही थीं। साँप के केंचुल हवा में बिखरे हुए बाल के समान उड़ने लगे। ब्रह्माण्ड के सारे रस को चाट जाने के लिए हवा मानों कमल के मधु का ग्रास बनाकर अभ्यास कर रही थी। बाँसों के चटकने की तीखी आवाज होने लगी मानों सारे जलों को सोख लेने वाले आतपों का घोषणा-पटह जल रहा हो, इस प्रकार हवा ने तीनों लोकों को भयभीत कर दिया। चाष पक्षी के पंख झड़कर मार्ग को ढँक रहे थे। हवा का शरीर मानों सूर्य की किरणों के जलते अङ्गारों से झुलस कर कुछ काला और लाल (कल्माष) हो गया था, चटकते हुए गुञ्जाफलों के समान अग्निकणवाही अंगारों से हवा के अङ्ग-अङ्ग भर गये। पहाड़ की गुफाओं में गंभीर झंकार भर कर हवा ने भयानक भ्रम उत्पन्न कर दिया। संसार को भस्म करने के अभिचार (वेदविहित हिंसात्मक कर्म उच्चाटन) में चरु पकाने में चतुर हवा ने नीम के गुच्छों को इस तरह बरसाया

८६ हर्षचरितम् Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri भस्मीकरणाभिचारचरुपचनचतुराः, रुधिराहुतिभिरिव पारिभद्रद्रुमस्तबक- वृष्टिभिस्तर्पयन्तस्तारान्वनविभावसून, अशिशिरसिकतातारकितरंहसः, तप्तशैलविलीयमानशिलाजतु रसलवलिप्तदिशः, दावदहनपच्यमानचटकाण्ड- खण्डखचिततरुकोटरकीटपटलपुटपाकगन्धकटवः, प्रावर्तन्तोन्मत्ता मातरिश्वानः। सर्वतश्च भूरिभस्त्रासहस्रसंधुक्षणक्षुभिता इव जरठाजगरगम्भीरगल- गुहावाहिवायवः, क्वचित्स्वच्छन्दतृणचारिणो हरिणाः, क्वचित्तरुतल- विवरवर्तिनो बभ्रवः, क्वचिज्जटावलम्बिनः कपिलाः क्वचिच्छकुनिकुल- टनमारणाद्यर्थं चरुपचनं कुर्वन्ति, रक्तेन चाग्नीन्प्रीणयन्ति। पारिभद्रा निम्बाः। मदना इत्यन्ये। उन्मत्ता अपि निर्विवेकतया रक्तादि यत्किंचिदशुचिप्रायमग्निषु निक्षिपन्ति, तत एव विश्वस्य दोषाय पर्यवस्यन्ति। तारकितमिव रंहो वेगो येषां ते। शिलाजतु अश्मसारः। दावदहनेन पच्यमानानि यानि चटकाण्डानि तेषां विदारणवशात्स्फुटिता ये खण्डाः कपालानि तैः। दोलावदुपनिपतितैः खचितानि कषायमानानि यानि तरुकोटरेषु कीटपटलानि कृमिसमूहास्तेषामतिपेलशत्वेन यत एव तसैः खण्डैरु पर्याच्छादकतया स्थितै. पुटपाकैः प्रसवधूमोऽभ्यन्तरपाकस्तद्गन्धेन कटव उद्वेजकाः। अत्राग्निपाकेन खण्डत्वं खण्डेभ्यो रसनिःसरणात्खचितत्वं कीटा- नाम्। उन्मत्ता इति। ये चोन्मत्तास्ते सिकताव्याप्ताः कर्दमविलिप्तदिशो गन्धकटवः शाटीकराद्याः पूर्वोक्ताः क्रियाः प्रायेण कुर्वत इति। सर्वत्रात्र महावाक्ये ध्वनिच्छा- यान्वेष्या। मातरिश्वानो वायवः। सर्वतश्चेत्यादौ। दावाग्नयः प्रत्यदृश्यन्तेति संबन्धः। भस्त्रा इति। संधुक्षणमु- द्दीपनम्। जरठाजगरा वृद्धसर्पाः। गला एव गुहा गलगुहाः। स्वच्छन्दमपविघ्नम् यथारुचि। चरणं भक्षणम्, गमनं च। हरिणाः शुक्लाः, मृगाश्च। बभ्रवः कपिलाः, मानों रुधिर की आहुति दे रही हो, हवा ने इस प्रकार वृक्षों में लगी हुई आग को तृप्त किया। हवा के वेग में आतप के तेज से बालू तारे की तरह चमकने लगे। गर्म चट्टानों से शिलाजीत का रस बह-बह कर दिशाओं को लेपता हुआ फैलने लगा। वन में लगी आग की गर्मी से चिड़ियों के अंडे फूटकर पेड़ों के कोटरों में बिछ गए थे जिनमें झुलसे हुए कीड़ों से मिलकर पकने से पुटपाक की उग्रगन्ध उठ रही थी।† चारों ओर भीषण वनाग्नियाँ दिखाई पड़ने लगीं। मानों वे अग्नियाँ हजारों धौकनियों के चलाने से क्षुभित होकर बढ़ती जा रही थीं। पुराने अजगर, साँप के गले की मीठी गुहा से निकलने वाली वायु उन्हें उत्तेजित कर रही थीं। कहीं हिरनों की भाँति अग्नियाँ घासों में स्वच्छन्द विचरण करतीं, कहीं नेवलों की तरह वृक्षों के नीचे विवरों में घुस पड़तीं, कहीं तप- स्वियों की तरह विशाखों की पीली जटाएँ धारण करतीं, कहीं बाजों के समान पक्षियों के † हवा के सभी विशेषण उन्मत्त या पागल के स्वभाव के अनुकूल अर्थ में भी है। CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

कुलायपातिनः श्येनाः, क्वचिद्विलीनलाक्षारसलोहितच्छवयोऽधराः, क्वचि- दासादितशकुनिपक्षकृतपटुगतयो विशिखाः, क्वचिद्दग्धनिःशेषजन्महेतवो निर्वाणाः, क्वचित्कुसुमवासिताम्बरसुरभयो रागिणः, क्वचित्सधूमोद्गारा मन्दरुचयः, क्वचित्सकलजगद्ग्रासघस्मराः सभस्मकाः, क्वचिद्वेणुशिखर- नकुलाश्च । इतरत्र, —जटा मूलानि च । कपिलाः पिङ्गलाः कपिलाख्यमुनिव्रत- ग्रहणान्मनुष्या एवाभेदोपचारेण कपिलाः । एते च जटावल्कलधारिणः । कुलाया नीडाः । श्येनाः शुक्लाः, पाक्षिकाश्च । अधरा धर्तुमशक्याः, अधोमर्वा वा । लाक्षाया विलीनतया पीतत्वात् । ओष्ठाश्चाधराः । आ समन्तात्सादिता आहताः, स्वीकृताश्च । स्निग्धतया नीरसतया च । शकुनीनां पक्षेषु कृतपटुगतयः, निःसारतया कालस्थापितत्वात् । विगता शिखा ज्वाला येषां ते, विविधशिखाः शराश्च । निःशेषाः समस्ताः, प्राक्तनजन्मान्तरसंचिता अपि । जन्महेतवस्तुणाद्याः, कर्माणि च । निर्वाणाः शान्ताः, मोक्षगामिनश्च । कुसुमं धूमः पुष्पं च । अम्बरं नभः, वस्त्रं च । रागिणो लोहिताः, शृङ्गारिणश्च । अजीर्णकृतोऽपि धूमोद्गारः । रुचिर्दीप्तिः, भोज- नाभिलाषश्च । जगदेव ग्रासः कवलं तद्भक्षणशीलाः । भस्मभूरिकक्ष्वात्यशनव्याधिः । वृद्धा वृद्धिं गताः, स्थविराश्च । ते वेणुशिखरमवलम्बन्ते यष्टिं गृह्णन्ति । अचलाः पर्व- ताः । अन्यत्र, —क्षयस्य दीर्घकालपर्यवसायित्वादचलमविच्छिन्नं मक्षितशिलाह्वयाः । उक्तं च—‘शिलाधातुप्रयोगाद्वा प्रसादाद्वाथ शांकरात् । अजामूत्रप्रयोगाद्वा क्षयः घोसलों पर टूट पड़तीं, कहीं द्रवित होकर बढ़ते हुए लाक्षारस के अधर के समान लाल हो जातीं। कहीं पैदा होने के सभी कारणों को जला कर बुझ जाती ( निर्वाण की अवस्था में भी जन्म लेने के सभी हेतु क्षपित हो जाते हैं ), कहीं रागियों की भाँति धुएँ की धुआंसी गन्ध से आकाश को भर देतीं ( रागी लोग भी फूलों की गन्ध से बसे वस्त्र पहनते हैं ), कहीं धुयें को उड़ेल कर शोभा मन्द कर देतीं । (धूमोद्गार या ढेंकार के रोग वालों की रुचि या भोजनाभि- लाष मन्द पड़ जाता है) कहीं सारे संसार को खा जाने की प्रवृत्ति करतीं और भस्म कर देतें ( भस्मक रोग वाले भी बहुत खाया करते हैं ), कहीं अत्यन्त बढ़कर बांसों की फुनगियों तक पहुँच जातीं। ( जो अत्यन्त वृद्ध हो जाते हैं बांस की लाठी का सहारा लेते हैं ) कहीं क्षयशील होकर पर्वत के शिलाजतु के उपयुक्त बन जातीं ( क्षय रोग वाले भी हमेशा शिलाजीत का सेवन करते हैं ) कहीं अत्यन्त बढ़ कर सभी रस का योग करने लग जातीं ( मोटे तगड़े लोग सभी प्रकार के मधुरादि रसों का सेवन करते हैं ) कहीं रौद्र रूप धारण करके गुग्गुलुओं को जलातीं (रुद्र के उपासक लोग भी गुग्गुलु जलाया करते हैं ), कहीं स्थाणुओं (ठूँठ वृक्षों) पर चढ़कर मूल को ज्वलित करके मदन वृक्ष की फूलों में साथ शाखाओं को भी जलातीं ( स्थाणु अर्थात् शिव जी ने प्रज्वलित नेत्र की अग्नि से फूल के बाणों वाले कामदेव को जला डाला था ), कहीं चंचल शिखाओं के द्वारा नृत्य आरम्भ करके आरभटी शैली में नाचने

८८ हर्षचरितम् लग्नपूर्तयोऽत्यन्तवृद्धाः, क्वचिदचलोपयुक्तशिलाजतवः, क्षयिणः क्वचि- त्सर्वरसभुजः पीवानः, क्वचिद्दग्धगुग्गुलवो रौद्राः, क्वचिज्ज्वलितनेत्रदहन- दग्धसकुसुमशरमदनाः कृतस्थाणुस्थितयः, चटुलशिखानर्त्तनारम्भार- भटीनटाः क्वचिच्छुष्ककासारसृतिभिः स्फुटन्नीरसनीवारबीजलाजवर्षि- भिर्ज्वालाञ्जलिभिरर्चयन्त इव घर्मघृणिम्, अघृणा इव हठहूयमानकठोर- स्थलकमठवसाविस्रगन्धगृध्नवः, स्वमपि धूममम्भोदसमुद्भूतिभियेव भक्षयन्तः सतिलाहुतय इव स्फुटद् बहलबालकीटपटलाः कक्षेषु, श्वित्रिण इव प्लोषविचटद्वल्कलधवलशम्बूकशुक्तयः, शुष्केषु सरःसु, स्वेदिन इव विलोयमानमधुपटलगोलगलितमधूच्छिष्टवृष्टयः काननेषु, खलतय इव क्षीयेत नान्यथा ।।' इति । क्षयो विनाशः, व्याधिभेदश्च यक्ष्माख्यः । रसः सलि- लादिः । अत एव पीवानः । अन्यथा कथं सलिलादिभक्षणशक्तिवममीषां प्रस- ज्येत् । ये च मधुरादिसर्वरसानुपभुञ्जते ते स्थूला भवन्ति । रौद्रा भीषणाः, रुद्र- भक्ताश्च । नेत्राणां मूलानां दहनेन दग्धाः सकुसुमाः काण्डानि मदना वृक्षभेदाश्च यैः । स्थाणुश्छिन्नशाखो वृक्षः, शिवश्च । स्थितिः स्थानम् व्यवहारश्च । स्थाणुनापि नयनाग्निना सकुसुमशरः कामो दग्धः । चटुलत्वेन नर्त्तनाम्मः, रवश्च । शुष्कतवा- च्चटुलादेरारभटीग्रहणम् । कासाराणि नड्वलास्तेषु याः सृतयः । क्वचित् 'स्मृतयः' इति पाठः । इतरत्र तु—शुष्ककं शुष्कगीतं मुष्ठुमादि । आसायंन्त इत्यासाराः । आसारितानि यद्यपि गीयन्त एव, तथापि 'वर्धमानमथप्रोह ताण्डवं यंत्र योज्यते' इति । ताण्डवं ह्यारभटीप्रधानम् । अर्चयन्त इवेति । तेषां तदभिमुखत्वात् । घर्म- घृणिः सूर्यः । अघृणा अजुगुप्साः । कमठः कूर्मः । 'विस्रं स्यादामगन्धि यत्' गृध्नवो लम्पटाः । समुद्भूतिः संभारः । धूमात्किल मेघोत्पत्तिमॅघाः शमयन्ति । कीटाः कृमयः । प्लोषो दाहः । वल्कलशब्दस्त्वगुपलक्षणार्थः । शम्बूकाः शक्तिमन्तः प्राणि- भेदाः । मधुपटलगोलो माक्षिककरण्डः । मयूच्छिष्टं सिक्यकम् । खलतयः खल्वाटाः । वाली नट बन जाती (ये नट भी 'चटुलशिखानर्तन करते हैं), कहीं सूखे जलाशयों में फैल कर नीरस नीवार नामक धान के जावे की तरह अपनी ज्वालाओं अंजलियों से भगवान् सूर्य की मानो पूजा करतीं । घृणारहित की भाँति कठोर स्थलकमठों के पकते हुए हृदय-मांस के लिए मानों लालायित हो रही थीं मानों मेघों के उठ जाने के भय से अपने धूम को खाती जा रही थीं। घासों में आग लग जाने से छोटे-छोटे कीड़े पकड़-पकड़ कर फूटने लगे मानों अग्नि में जल की आहुति पड़ रही हो । सूखे हुए सरोवरों में उजले उजले घोंघे और सीपियाँ आग से इस तरह चटक रही थीं मानों श्वेत कुष्ठ के रोगी की चमड़ी हों । जंगलों में आग मधुमक्खियों के छाते को उजाड़ रही थी, उनसे मधु की धार इस प्रकार बरसने लगी मानों आतप से पीड़ितों (अग्नियों) का पसीना बहने लगा । विस्तीर्ण बहुत

द्वितीय उच्छ्वासः ८९ परिशीर्यमाणशिखासंहतयो महोषरेषु, गृहीतशिलाकवला इव ज्वलित- सूर्यमणिशकलेषु शिलोच्चयेषु, प्रत्यदृश्यन्त दारुणा दावाग्नयः । तथाभूते च तस्मिन्नत्युग्रे ग्रीष्मसमये कदाचिदस्य स्वगृहावस्थि- तस्य भुक्तवतोऽपराह्नसमये भ्रात्रा पारशवश्चन्द्रसेननामा प्रविश्याकथ- यत्—'एष खलु देवस्य चतुःसमुद्राधिपतेः सकलराजचक्रचूडामणिश्रेणी- शाणकोणकषणनिर्मलीकृतचरणनखमणेः सर्वचक्रवर्तिनां धोरेयस्य महाराजाधिराजपरमेश्वरश्रीहर्षदेवस्य भ्रात्रा कृष्णनाम्ना भवतामन्तिकं प्रज्ञाततमो दीर्घाध्वगः प्रहितो द्वारमध्यास्ते' इति । सोऽब्रवीत्—'आयु- ष्मन् ! अविलम्बितं प्रवेशयैनम्' इति । अथ तेनानीयमानम्, अतिदूरगमनगुरुजडजङ्घाकाण्डम्, कार्दमि- कचेलचीरिकानियमितोच्चण्डचण्डाटकम्, पृष्ठप्रेङ्खत्पटच्चरकर्पटघटितगल- शिखा ज्वाला, चूडा च । ऊषरं सिकताबहलो रूक्षो देशः । शिलोच्चयो गिरिः । 'दावो वनगतो वह्निर्दावश्च वनमुच्यते' । तथाभूतदेश इत्यादिनात्मानं प्रति तेषामादरातिशयं दर्शयति । आकुर्वत इति । न त्वप्रस्तावे । एतेन स्वस्य किमपि माहात्म्यमाह । स्वयमवसरमन्तरेण वा तस्य तदा प्रवेशाभावात् । एतदेव देव्येत्यादिविशेषणसंदर्भमुखेन द्वारमध्यास्त इत्यनेन पोषयिष्यते । पारशवः शूद्रापुत्रः । शाणो मणिकषणम् । कोणोऽश्रिः । चक्र- वर्तिनः सार्वभौमाः । धोरेयो मुख्यः । प्रज्ञाततमोऽतिप्रतीतः । एतेन च बाणं प्रति बहुमान एव गम्यते । जडा गमनाशक्ताः । कर्दमेन रक्तं कार्दमिकम् । चेलं वस्त्रम् । चीरिका खण्डिका । स्थानों में खल्वाट की भाँति उनकी शिखाएँ (ज्वालाएं या चोटियाँ) झड़ने लगीं। ज्वलित सूर्यकान्त मणियों के खण्डों वाले पर्वतों पर मानों शिलाओं के ग्रास ग्रहण करने लगीं । इस प्रकार ग्रीष्मकाल अत्यन्त प्रखर हो उठा। एक दिन जब बाण खा-पीकर अपने घर में बैठे थे तभी दोपहर के बाद पारशव (शूद्रा माता से उत्पन्न) भ्राता चन्द्रसेन ने भीतर प्रवेश कर निवेदन किया—'चारों समुद्रों के अधिपति, समस्त राजसमूह की चूडामणियों के शाण की रगड़ से निर्मल नखमणि वाले, समस्त चक्रवर्ती राजाओं में धुरन्धर, महाराजा- धिराज परमेश्वर श्रीमान् हर्षदेव के भाई कृष्ण ने अत्यन्त विश्वासपात्र अपना लम्बा रास्ता तय करनेवाला दूत पठाया है जो द्वार पर खड़ा है।' बाण ने कहा—'आयुष्मन्, शीघ्र उसे अन्दर लाओ।' तब बाण ने उसके द्वारा लाये गये प्रवेश करते हुए उस लेखहारक को देखा। लम्बी सफर करने से उसकी जाँघें भर गई थीं। मटियाले रंग की पेटी से उसका ऊँचा चंडातक

ग्रन्थिम्, अतिनिबिडसूत्रबन्धनम्नितान्तरालकृतलेखव्यवच्छेदया लेख- मालिकया परिकलितमूर्द्धानम्, प्रविशन्तं लेखहारकमद्राक्षीत् । अप्राक्षीच्च दूरादेव—'भद्र, भद्रमशेषभुवननिष्कारणबन्धोस्तत्रभवतः कृष्णस्य ? इति । स 'भद्रम्' इत्युक्त्वा प्रणम्य नातिदूरे समुपाविशत् । विश्रान्तश्चा- ब्रवीत्—'एष खलु स्वामिना माननीयस्य लेखः प्रहितः' इति विमुच्या- र्पयत् । बाणस्तु सादरं गृहीत्वा स्वयमेवावाचयत्—'मेखलकात्संदिष्टम- वधार्य फलप्रतिबन्धी धीमता परिहरणीयः कालातिपात इत्येतावदत्रार्थ- जातम् । इतरद्वार्तासंवादनमात्रकम्' । अवधृतलेखार्थश्च समुत्सारितपरि- जनः संदेशं पृष्टवान् । मेखलकस्त्ववादीत्—'एवमाह मेधाविनं स्वामी— जानात्येव मान्यो यथैकगोत्रता वा, समानज्ञानता वा, समानजातिता वा, सहसंवर्धनं वा, एकदेशनिवासो वा, दर्शनाभ्यासो वा, परस्परानुराग, श्रवणं वा, परोक्षोपकारकरणं वा, समानशीलता वा, स्नेहस्य हेतवः । उच्चण्डमुच्चम् । गाढमित्यन्ये । चण्डातकमर्धोरुकं वासः । पटच्चरं जीर्णवस्त्रम् । निम्नितं नमितम् । लेखमालिकेति । अन्यैरपि तद्धस्ते लेखः प्रहित इति परागतः सबन्धः । 'परिकरित-' इति पाठे वेष्टित इत्यर्थः । तत्रभवतः पूज्यस्य नातिदूर इति । अपि तु दूर एवेति सर्वत्रैव स्वस्य प्रभावातिशयं प्रतिपादयति । फलं प्रतिबध्नाति रुणद्धीति फलप्रतिबन्धी । कालातिपातः कालात्ययः । अर्थजात- मभिधेयप्रकारः । अवधृतो ज्ञातः । एकेत्यादि कारणमुत्तरोत्तरमप्रधानम् । (पाजामा) कसा हुआ था । उसकी पीठ पर जीर्ण वस्त्र का गले में बंधा अँगोछा फहरा रहा था । लेखमालिका या चिट्ठी डोरे से बीचों बीच लपेट कर बांधी गई थी जिससे वह दो भागों में बंटी हुई जान पड़ती थी, उसे उसने अपने सिर से बाँध लिया था । बाण ने दूर ही से पूछा—'भद्र, सबके अकारणबन्धु तत्रभगवान् कृष्ण का कुशल है ?' वह 'कुशल है' यह कह कर प्रणाम करने के बाद कुछ दूर पर बैठ गया और विश्रान्त होकर बोला— 'मालिक ने यह लेख माननीय आपके पास भेजा है।' यह कह उसने खोल कर अर्पित किया । बाण ने आदर के साथ उसे ले स्वयं पढ़ा—'मेखलक से सन्देश समझ कर बुद्धिमान आप काम को बिगाड़ने वाली देरी मत करें, पत्र में इतना ही लिखा जाता है, शेष मौखिक सन्देश मात्र होगा' । बाण ने लेख का तात्पर्य समझ कर परिजनों को हटा दिया और मेखलक से सन्देश पूछा।' मेखलक बोला—'स्वामी ने मेधावी आपसे इस प्रकार कहा है—मान्य, आप जानते ही हैं कि एक गोत्र होना, बराबर ज्ञान होना, समान जाति होना, साथ में रह-कर बढ़ना, एक ही देश में निवास करना, बार-बार दर्शन होना, एक दूसरे के अनुराग को सुनना, परोक्ष में उपकार करना,