भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

प्रथम उच्छ्वासः ७३ शादुपसंपन्नया व्ययुज्यत जनन्या। जातस्नेहस्तु नितरां पितेवास्य मातृतामकरोत्। अवर्धत च तेनाधिकतरमाधीयमानधृतिर्धाम्नि निजे। कृतोपनयनादिक्रियाकलापस्य समावृत्तस्य चास्य चतुर्दशवर्ष- देशीयस्य पितापि श्रुतिस्मृतिविहितं कृत्वा द्विजजनोचितं निखिलं पुण्यजातं कालेनादशमीस्थ एवास्तमगमत्। संस्थिते च पितरि महता शोकेनाभीलमनुप्राप्तो दिवानिशं दह्यमानहृदयः कथंकथमपि कतिपया- न्दिवसानात्मगृह एवानैषीत्। गते च विरलतां शोके शनैः शनैर- विनयनिदानतया स्वातन्त्र्यस्य, कुतूहलबहुलतया च बालभावस्य, धैर्यप्रतिपक्षतया च यौवनारम्भस्य, शैशवोचितान्यनेकानि चापल्यान्या- चरन्नित्वरो बभूव। अभवंश्चास्य सवयसः समानाः सुहृदः सहा- मर्यादः। अचलानां गिरीणां कुलैर्वृन्दैः स्थितियंरस्य। चतुरुदधिवत्तैश्च गम्भीरः। अग्र- जन्मानो द्विजाः। सोमस्तृणभेदः, इन्दुश्च। उपसंपन्ना मृता। निजे धाम्नि स्वे गृहे। उपनयनं मेखलादानम्। समावृत्तो निष्पादितवृत्तः। स्नातक इत्यर्थः। वेद- वेदाङ्गपाठक इत्यन्ये। ईषदसमाप्तश्चतुर्दशवर्षश्चतुर्दशवर्षदेशीयः। 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः।' दशामुपैतो दशमीस्थ उदाहृतः, न दशमीस्थः। अपूर्णायुरित्यर्थः। संस्थितो मृतः। आभीलं कष्टम्। इत्वरो गमनशीलः। 'अभवंश्च' ही जाने से पिता ने ही पूर्णरूप से उसकी माता के स्थान की पूर्ति की और उनके द्वारा अधिकतर धैर्य धारण कराया जाता हुआ वह अपने घर पर बढ़ा। बाण के उपनयन आदि कार्य-कलाप हुए और उसका समावर्तन-संस्कार भी हो चुका। बाण की आयु चौदह वर्ष की भी पूरी नहीं होने पाई थी कि उसके पिता भी वेद (श्रुति) और धर्मशास्त्र (स्मृति) द्वारा विहित एवं ब्राह्मणजन के उचित समस्त पुण्य-कर्मों को सम्पन्न करके बिना वृद्धावस्था† को प्राप्त हुए चल बसे। पिता के मरने पर उसे महान् शोक के कारण कष्ट हुआ और दिन-रात हृदय में खौलते हुए उसने अपने घर पर ही कुछ दिन बिताये। धीरे-धीरे जब उसका शोक कम हुआ तब उसे वह स्वतंत्रता मिल गई जिससे अविनय या अनुशासनहीनता बढ़ती गई। लड़कपन में बहुत से कुतूहल हो जाते हैं। यौवन का आरम्भ धैर्य को नहीं रहने देता। इसलिए बाण शैशवकाल के उचित अनेक चपलताओं में पड़ कर आवारा (इत्वर) हो गया। अब तो उसके बहुत से सुहृद् † शङ्कर के अनुसार दशा को प्राप्त, (शत-वर्ष की) पूर्ण आयु को पहुँचा व्यक्ति दश- मीस्थ होता है। हिन्दू-संस्कृति में मनुष्य की आयु सौ वर्ष की मानी गई है, किन्तु चतुर्दश- वर्षीय बाण के पिता अभी पूर्णायु नहीं थे, चल बसे।