हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 116, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ हर्षचरितम् याश्च । तथा च । भ्रातरौ पारशवौ चन्द्रसेनमातृषेणौ, भाषाकविरी- शानः परं मित्रम्, प्रणयिनौ रुद्रनारायणौ, विद्वांसो वारबाणवास- बाणौ, वर्णकविर्वेणीभारतः प्राकृतकृत्कुलपुत्रो वायुविकारः, बन्दिनाव- नङ्गबाणसूचीबाणौ, कात्यायनिका चक्रवाकिका, जाङ्गुलिको मयूरकः, ताम्बूलदायकश्चण्डकः, भिषक्पुत्रो मन्दारकः, पुस्तकवाचकः सुदृष्टिः, कलादश्चामीकरः हैरिकः सिन्धुषेणः, लेखको गोविन्दकः, चित्रकृद्वीर- वर्मा, पुस्तककृत्कुमारदत्तः, मार्दङ्गिको जीमूतः, गायनौ सोमिलग्रहा- दित्यौ, सैरन्ध्री कुरङ्गिका, वांशिकौ मधुकरपारावतौ, गान्धर्वो- इत्यादिनात्मनस्तथाभूतकलावित्संपर्कमैश्वर्यातिशयं दर्शयति । पारशवो द्विजः शूद्रायां जातः । 'परस्त्री परश्वम्' इति बिदाद्यञ् परश्वादेशश्च । भाषागेयवस्तु- वाचस्तेषु वर्णकविः । गाथादिषु गीतविदित्यर्थः । अपभ्रंशगीतवित्† । 'पञ्चाश- द्वर्षदेशीयां वीरां संस्थितभर्तृकाम् । वदन्ति कात्यायनिकां धृतकाषायवाससम्' ‡ जाङ्गुलिको गारुडिकः । भिषग्वैद्यः । 'स्वर्णकारः कलादः स्यात्तदध्यक्षस्तु हैरिकः' । पुस्तककृल्लेप्यकारः । 'प्रसाधनोपचारज्ञा सैरन्ध्री स्ववशा स्मृता' । संवाहिका या पादादिमर्दनं विधत्ते । लासको नर्तयति यः । युवेत्यादिना वयसः समानत्वमुच्यते । और सहायक मिल गए जो उसकी अवस्था के थे और उसी के समान ( आवारा ) थे । चन्द्रसेन और मातृषेण, जो शूद्रा माता से उत्पन्न द्विजपुत्र ( पारशव ) भाई थे, भाषाकवि ईशान, जो बाण का परम मित्र था; रुद्र और नारायण, जो बाण के स्नेही थे; वारबाण और वासबाण, जो विद्वान् थे; वर्णकवि वेणी भारत; प्राकृत भाषा में रचना करने वाला कुलपुत्र वायुविकार; अनङ्गबाण और सूचीबाण, जो बन्दीजन थे; कात्यायनिका चक्र- चक्रवाकिका ; जाङ्गुलिक (विषवैद्य या गारुडी ) मयूरक पान की खिल्ली लगा कर देने वाला चंडक, भिषक्पुत्र मन्दारक, पुस्तकवाचक सुदृष्टि, स्वर्णकार चामीकर, सुनारों का अध्यक्ष या हीरा काटने वाला सिन्धुषेण, लेखक गोविन्दक, चित्रकार वीरवर्मा, मिट्टी के खिलौने बनाने वाला ( पुस्तककृत् = लेप्यकार ) कुमारदत्त, मृदङ्ग बजाने वाला जीमूत, गायक सोमिल और ग्रहादित्य सैरन्ध्री ( प्रसाधिका = बनाव सिंगार करने वाली ) कुरंगिका, वांशिक ( वंशी बजाने वाले ) मधुकर और पारावत, गान्धर्वोपाध्याय ( संगीतगुरु ) दर्दुरक, संवाहिका † यह अपभ्रंश भाषा में गीत रचना करने वाला था। ‡ कात्यायनिका-शङ्कर द्वारा उद्धृत वचन के अनुसार पचास वर्ष की अवस्था वाली, वीरा, मृतपतिका तथा काषाय वस्त्र धारण करने वाली स्त्री । 'अमरकोश' में भी—'कात्याय- न्यर्थेवृद्धा या काषायावसनाऽथवा ।' ( मनुष्यवर्ग, १७ )