भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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प्रथम उच्छ्वासः ७५ पाध्यायो दर्दुरकः, संवाहिका, केरलिका लासकयुवा ताण्डविकः, आक्षिक आखण्डलः, कितवो भीमकः, शैलालियुवा शिखण्डकः, नर्तकी हरिणिका, पाराशरी सुमतिः, क्षपणको वीरदेवः, कथको जयसेनः, शैवो वक्रघोणः, मन्त्रसाधकः करालः, असुरविवरव्यसनी लोहिताक्षः, धातुवादविद्विहंगमः, दार्दुरिको दामोदरः, ऐन्द्रजालि- कश्चकोराक्षः, मस्करी ताम्रचूडकः । स एभिरन्यैश्चानुगम्यमानो बालतया निध्नतामुपगतो देशान्तरावलोकनकौतुकाक्षिप्तहृदयः सत्स्वपि पितृपितामहोपात्तेषु ब्राह्मणजनोचितेषु विभवेषु सति चाविच्छिन्ने विद्याप्रसङ्गे गृहान्निर्गत । अगाच्च निरवग्रहो ग्रहवानिव नवयौवनेन स्वैरिणा मनसा महतामुपहास्यताम् । अथ शनैः शनैरत्युदारव्यवहृतिमनोहृन्ति वृहन्ति राजकुलानि अक्षैर्दीव्यतीत्याक्षिको द्यूतकारः । कितवो धूर्तः । शैलाली स्वयं यो नृत्यति नटः । पाराशरी भिक्षुः । असुरविवरव्यसनी पातालाभिलाषी । धातुवादविद्रसवादज्ञः । मस्करी परिव्राट् । निध्नतामस्वातन्त्र्यम् । कौतुकेति । न पुनरर्थामिलिप्सया । एत- देव सत्स्वपीत्यादिना प्रकाशयति । निरवग्रहः स्वतन्त्रः । ग्रहवान्भूतगृहीतः । स्वैरिणा स्वतन्त्रेण । अत्युदारेत्यादिः प्रकृतोपयोगी, यस्यात्कविना तथाविधवस्तुवेदिनावश्यमेव ( पैर दबाने वाली ) केरलिका, नृत्य करने वाला ताण्डविक, आक्षिक ( पासा खेलने वाला ) शिखंडक, धूर्त भीमक, स्वयं नृत्य करने वाला युवक नट शिखण्डक, नर्तकी हरिणिका, पारा- शरी ( संन्यासी ) सुमति, क्षपणक ( जैन साधु ) वीरदेव, कथक ( कथावाचक ) जयसेन, शैव- वक्रघोण, मन्त्रसाधक कराल, पाताल में घुस कर यक्ष या राक्षस को सिद्ध करने वाला लोहि- ताक्ष, रसायन बनाने की विद्या जानने वाला विहंगम, दर्दुर नामक घटवाद्य बजाने वाला दामोदर, ऐन्द्रजालिक चकोराक्ष, मस्करी ( परिव्राजक ) ताम्रचूड । ये मित्र तथा कुछ और भी लोग बाण के साथ चलते थे । लड़कपन के कारण वह विवश हो गया । उसके मन में देशान्तरों को देखने की बड़ी उत्कण्ठा थी । यद्यपि पिता-पितामह द्वारा उपार्जित ब्राह्मणजन के उचित धन सम्पत्ति उसके घर थी और विद्या का अविच्छिन्न प्रसंग भी प्राप्त था तथापि वह घर से निकल पड़ा । जैसे किसी पर ग्रहों की बाधा सवार हो वैसे ही स्वच्छन्द होकर और नवयौवन एवं स्वतंत्र मन के कारण बड़े लोगों की खिल्ली का पात्र बना । तब उसने धीरे-धीरे बड़े-बड़े राजकुलों को देखा जिनमें होने वाले उदार व्यवहारों ने उसके मन को हर लिया । अनिन्द्य विद्याओं के ( अध्ययन-अध्यापन ) से उद्भासित गुरु- कुलों में रहा । बड़ी-बड़ी गोष्ठियों में बैठने लगा जो गुणी जनों के बहुमूल्य आलाप के कारण