हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ हर्षचरितम् कलौ, वहत्सु वत्सरेषु, व्रजत्सु वासरेषु, अतिक्रामति च काले प्रसव- परम्पराभिरनवरतमापतति विकाशिनि वात्स्यायनकुले, क्रमेण कुबेर- नामा वैनतेय इव गुरुपक्षपाती द्विजो जन्म लेभे । तस्याभवन्नच्युत ईशानो हरः पाशुपतश्चेति चत्वारो युगारम्भा इव ब्राह्मतेजोजन्यमान- प्रजाविस्तारा नारायणबाहुदण्डा इव सच्चक्रनन्दकास्तनयाः । तत्र पाशुपतस्यैक एवाभवद् भूभार इवाचलकुलस्थितिः स्थिरश्चतुरुदधि- गम्भीरोऽर्थपतिरिति नाम्ना समग्राग्रजन्मचक्रचूडामणिर्महात्मा सूनुः। सोऽजनयद् भृगुं हंसं शुचिं कविं महीदत्तं धर्मं जातवेदसं चित्रभानुं त्र्यक्षं महिदत्तं विश्वरूपं चेत्येकादश रुद्रानिव सोमामृतरसशीकरच्छु- रितमुखान्पवित्रान्पुत्रान् । अलभत च चित्रभानुस्तेषां मध्ये राजदेव्य- भिधानायां ब्राह्मण्यां बाणमात्मजम् । स बाल एव बलवतो विधेर्व- पक्षैश्च यो याति सः । द्विजो विप्रः, विधुः, पक्षी च । युगारम्भा अपि चत्वारः । ब्रह्म वेदादि, स्रष्टा च ब्रह्मा । सच्चक्रस्य साधुवृन्दस्य नन्दकास्तोषयितारः । चक्रं सुदर्शनं च । नन्दकः खड्गश्च । बाहवोऽपि चत्वारः । अचलकुलस्थितिरभिन्नवर्षं- कलिकाल आया, साल के साल गुजरे, दिन बीते, समय बहुत चला गया । वात्स्यायन- कुल जन्म-परम्परा से निरन्तर विकसित होता गया । इसी क्रम में गुरु में पक्षपात ( भक्ति ) करने वाले कुबेर नामक द्विज विनता के पुत्र गरुड़ के समान हुए (गरुड़ भी अपने गम्भीर पक्षों से पतन या गमन करते हैं तथा द्विज अर्थात् पक्षी हैं)। उनके चार पुत्र हुए-अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत, जो चार युगारम्भ के समान थे, जिनके ब्राह्म तेज से सन्तति चारों ओर फैल रही थी, नारायण के बाहुदण्ड की भांति जो साधुवृन्द को सन्तुष्ट करते थे (नारायण का बाहु- दण्ड सुदर्शन नामक चक्र और नन्दकनामक खड्ग से युक्त है)। उसमें पाशुपत के एक ही अर्थपति नामक पुत्र भू-भार की भांति कुल-मर्यादा का पालन करने वाले (पक्ष में अचल अर्थात् पर्वतों के कुल (समूह) के कारण स्थित रहने वाला), स्थिर, समुद्र की भाँति गम्भीर, समस्त ब्राह्मणों के चूडामणि एवं महात्मा पुत्र हुए । अर्थपति ने रुद्रों के समान ग्यारह पुत्र उत्पन्न किये- भृगु, हंस, शुचि, कवि, महीदत्त, धर्म, जातवेदस्, चित्रभानु, त्र्यक्ष, अहिदत्त और विश्वरूप । जो सोम (तृण-विशेष अथवा चन्द्रमा) के अमृतमय शीकर से सिक्त मुख वाले और पवित्र थे । उनमें से चित्रभानु ने राजदेवी नामक ब्राह्मणी में बाण नामक पुत्र को पाया । बल- वान् दैवयोग से बाण बाल्यकाल में ही माता के मर जाने से मातृहीन हो गया । स्नेह उत्पन्न