भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ८२ हर्षचरितम्

संदेहमुह्यन्महामहिषविषाणकोटिविलिख्यमानस्फुटत्स्फटिकदृषदि, घर्म- मर्मरितगर्मुति, तप्तपांशुकुकूलकातरविकिरे, विवरशरणश्वाविधे, तटार्जुन- कुररकूर्जाज्वरविवर्तमानोत्तानशफरशारपङ्कशेषपल्वलाम्भसि, दावजनित- जगन्नीराजने, राजनीराजयक्ष्मणि, कठोरीभवति निदाघकाले प्रतिदिश- माटीकमाना इवोषरेषु प्रपावाटकुटीपटलप्रकटलुण्ठकाः, प्रपक्वकपिकच्छू- च्छूच्छटाच्छोटनचपलैरकाण्डकण्डूला इव कर्षन्तः शर्करीलाः कर्करास्थलीः,

'सिन्दूरा इव । लोहितत्वात् । ग्रामस्य ग्रामान्तरेण मर्यादा सीमा । स्यन्दः स्रुतिः । विलिख्यमाना विपाट्यमानाः । मर्मरिताः शुष्कत्वेन शब्दद्रायमानाः । गर्मुतो लताः । कुकूलं तुषाग्निः । विकिराः कुक्कुटाद्याः । श्वाविधः शललाः सेहिकाख्या हिंस्राः प्राणिनः । तटशब्देन नैकट्यमाह । अर्जुनाः ककुभवृक्षाः । कुरराः क्रौञ्चपक्षिणः । कूजा शब्द एव संतापकारित्वाज्ज्वरस्तेन स्फुरन्तः शफरा मत्स्यास्तैः । शारं सितोद- रत्वात् । पल्वले नड्वले । कुररास्तटस्था यदा कूजन्ति तदा मत्स्याः पीडताः सन्त उत्प्लवन्तीति वस्तुधर्मोऽयम् । नीराजनमिति । नीराजनं शान्तिकर्म । राजयक्ष्मा क्षयव्याधिः । शनैः शनैरपचयकारित्वात् । मातरिश्वानः कीदृशाः प्रावर्तन्ते- त्याह—प्रतिदिशमित्यादि । आटीकमाना उच्चैर्भ्रमन्तः । साभिप्रायमेतत् । रजो- वशादेतेषां तथाविधसंनिवेशात् । ग्रीष्म ह्येवंविधा मारुताः प्रावर्तन्तेति कालधर्मः । उन्मत्तपक्षे—आटीकमाना इत्यादि सर्वं वक्ष्यमाणयोग्यतया योजनीयम् । उद्धत- भ्रमणाद्या ह्युन्मादस्यानुभावाः । तदुक्तम्—'अनिमित्तहसितरुदितोत्कृष्टाबद्बप्रलापश- यनोत्थितप्रधावितवृत्तगीतपठितस्मितपांसवधूनननिर्माल्यचीरघटवक्त्रशरावाभरण- स्पर्शानोपभोगैरन्यैश्चाव्यवस्थितचेष्टानुककरणादिभिरनुभावैरभिनयेत्' इति । ऊषरं सिकताबहुलो रूक्षो देशः । प्रपा सत्रम् । वाटः कुनालम् । पटलं छदिः । कपिकच्छूः

भ्रम से शेर के बच्चे चाटने लगे । घाम की गर्मी से उफने हुए हाथी अपनी सूँड से गाज उछाल कर पर्वत के मध्यभाग को सींचने लगे । सूर्य के कारण कष्ट में पड़े हुए हाथियों के क्षीण मद की श्यामलेखाओं पर भौंरे मूक होकर बैठ गए । मन्दार के सिन्दूरिया फूलों से सीमाएँ लाल हो गईं । जल के भ्रम से मोह में पड़े भैंसे सींगों के अग्र भाग से स्फटिक के पत्थरों को उपाटने लगे । लताएँ घाम से सूख कर खरखराने लगीं । भूसे की आग के समान तपती धूल से मुर्गे आदि व्याकुल हो उठे । सेही बिल में घुसने लगे । किनारे के अर्जुन वृक्षों पर बैठे हुए क्रौञ्च पक्षी कड़ी आवाज में बोलने लगे, जिससे डरकर सूखते हुए तालाबों की मछलियाँ तड़फड़ा उठती थीं । वनाग्नियां इस तरह लगने लगीं जैसे सारे जगत् की आरती उतार रही हों । वह निदाघकाल रात्रि का क्षय रोग बन गया और वह घटने लगीं । चारों ओर अंधड़ के रूप में उन्मत्त हवा चल पड़ी । बलुहट सीवानों में ऊँची उड़ान भरने लगीं । पनसाले और राह की कुटियों की खपड़पोश छाहों की सामने लूट होने लगी । पके किवाच के गुच्छों के साथ छेड़छाड़ करने की गुस्ताखी के कारण उठी हुई खाज को

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