भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः ८३ स्थूलदृषच्चूर्णमुचः, मुचुकुन्दकन्दलदलनदन्तुराः, संतततपनतापमुखर- चीरीगणमुखशीकरशीक्यमानतनवः, तरुणतरतरणितापतरले तरन्त इव तरङ्गिणि मृगतृष्णिकातरङ्गिणीनामलीकवारिणि, शुष्यच्छमीमर्मरमारव- मार्गलङ्घनलाघवजवजङ्घालाः, रैणवावर्त्तमण्डलीरेचकरासरसरभसारब्ध- नर्त्तनारम्भारभटीनटाः, दावदग्धस्थलीमषीमिलनमलिनाः शिक्षितक्षपणक- कण्डूदायको द्रव्यभेदः । अत एवाह—कर्षन्त इति । शर्कराः पाषाणकणिका विद्यन्ते यासु ताः शर्करिलाः । पिच्छादित्वादिलच् । कंकरस्थली ऊषरभूः पाषा- णभूः । अत एवाह—स्थूलेत्यादिना । मुचुकुन्दं पुष्पभेदः । कन्दलं नवना- लम् । दन्तुरा इति । कपिकच्छुस्पर्शचालनेन च ये कण्डूलास्तादृशाश्चूर्णमुचः प्रकटदन्ताः परुषं कषन्ति । शीक्यमानाः सिच्यमानाः । तरुणतरः प्रौढः । तर- णिरादित्यः । तरन्त इवेति । बालुकावशात्तथा लक्ष्यमाणत्वात् । मृगतृष्णिका मरीचिका । तृषितमृगाणां रविरश्मिखचितासु सिकतासु नीलत्वदर्शनाज्जलबुद्धिः । वारिणीति । सतरङ्गे वारिणि ये समीकास्ते सतापं देशं तरन्ति । उन्मत्तपक्षेऽपि विचित्तत्वेनैवंकारित्वम् । शम्योऽग्निगर्भा वल्लरीभेदाः । लाघवं नैपुण्यम् । सव्यायामाध्व विषमं मार्गं लाघवेन तरन्ति । जङ्घाला वेगवन्तः । रैणवावर्ताः पांसुसंबन्धिन आव- र्त्तनरूपाः संनिवेशास्तेषां मण्डली समूहः । रेचयति पृथक्करोतीति रेचकम् । रैणवावर्त्तमण्डल्या रेचकं तथा रासे रसिते यो रसस्तेन यो रभसस्तद्वशेनैवारब्धं यन्न- र्त्तनमिव नर्तनं तदारम्भे विषय आरभटीनटा इव आरभटीनटाः । ईरयन्तीति अराः । अराश्च ते भटा अरभटाः । तेषामियमारभटी नटजातिविशेषो वीररसप्रधानः । उक्तं च—‘प्लुतावपातप्लुतगर्जितानि च्छेद्यानि मायाकृतमिन्द्रजालम् । चित्राणि यूथानि च यत्र नित्यं तां तादृशीमारभटीं वदन्ति ॥’ इति; नृत्तपक्षे—आवर्त्ता छटपटाहट से भुइयाँलोट हवा कंकरीली धरती में मानों अपनी देह रगड़ रही थी । पत्थरों के मोटे-मोटे कण बरसने लगे । मुचुकुन्द और कन्दल की कलियाँ छँट-छँट कर गिरने लगीं । सूर्य की गर्मी से व्याकुल होकर चिल पक्षी मुँह से गाज निकालने लगे । मृग- तृष्णिका रूपी नदियों के झूठे बहते हुए प्रवाह में मानों निदाघकाल की हवा सूर्य के अधिक ताप के कारण तैर रही थी । शमी के सूखे पत्ते मरुभूमि के मार्गों पर बिछे हुए थे जिन पर मर्मर करती हवा दौड़ लगा रही थी । धूल के बवंडर जगह बदलते हुए ऐसे लगते थे मानों रास के अवसर पर आनन्द-वेग से आरभटी‡ नृत्य में नट नाच रहे हों । † 'रास' एक प्रकार का प्राचीन समूह-नृत्य था । शङ्कर के उद्धृत श्लोक के अनुसार आठ, सोलह या बत्तीस आदमी मण्डल बनाकर जब नृत्य करते थे तब यह नृत्य 'रास' कहलाता था । ‡ यह एक प्रकार की नृत्य-शैली है जिसमें उछल-कूद, मारकाट, माया, इन्द्रजाल के दृश्य झुण्ड में नृत्य द्वारा प्रदर्शित किये जाते थे ।