भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 184 में से

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पृष्ठ 132

ग्रन्थिम्, अतिनिबिडसूत्रबन्धनम्नितान्तरालकृतलेखव्यवच्छेदया लेख- मालिकया परिकलितमूर्द्धानम्, प्रविशन्तं लेखहारकमद्राक्षीत् । अप्राक्षीच्च दूरादेव—'भद्र, भद्रमशेषभुवननिष्कारणबन्धोस्तत्रभवतः कृष्णस्य ? इति । स 'भद्रम्' इत्युक्त्वा प्रणम्य नातिदूरे समुपाविशत् । विश्रान्तश्चा- ब्रवीत्—'एष खलु स्वामिना माननीयस्य लेखः प्रहितः' इति विमुच्या- र्पयत् । बाणस्तु सादरं गृहीत्वा स्वयमेवावाचयत्—'मेखलकात्संदिष्टम- वधार्य फलप्रतिबन्धी धीमता परिहरणीयः कालातिपात इत्येतावदत्रार्थ- जातम् । इतरद्वार्तासंवादनमात्रकम्' । अवधृतलेखार्थश्च समुत्सारितपरि- जनः संदेशं पृष्टवान् । मेखलकस्त्ववादीत्—'एवमाह मेधाविनं स्वामी— जानात्येव मान्यो यथैकगोत्रता वा, समानज्ञानता वा, समानजातिता वा, सहसंवर्धनं वा, एकदेशनिवासो वा, दर्शनाभ्यासो वा, परस्परानुराग, श्रवणं वा, परोक्षोपकारकरणं वा, समानशीलता वा, स्नेहस्य हेतवः । उच्चण्डमुच्चम् । गाढमित्यन्ये । चण्डातकमर्धोरुकं वासः । पटच्चरं जीर्णवस्त्रम् । निम्नितं नमितम् । लेखमालिकेति । अन्यैरपि तद्धस्ते लेखः प्रहित इति परागतः सबन्धः । 'परिकरित-' इति पाठे वेष्टित इत्यर्थः । तत्रभवतः पूज्यस्य नातिदूर इति । अपि तु दूर एवेति सर्वत्रैव स्वस्य प्रभावातिशयं प्रतिपादयति । फलं प्रतिबध्नाति रुणद्धीति फलप्रतिबन्धी । कालातिपातः कालात्ययः । अर्थजात- मभिधेयप्रकारः । अवधृतो ज्ञातः । एकेत्यादि कारणमुत्तरोत्तरमप्रधानम् । (पाजामा) कसा हुआ था । उसकी पीठ पर जीर्ण वस्त्र का गले में बंधा अँगोछा फहरा रहा था । लेखमालिका या चिट्ठी डोरे से बीचों बीच लपेट कर बांधी गई थी जिससे वह दो भागों में बंटी हुई जान पड़ती थी, उसे उसने अपने सिर से बाँध लिया था । बाण ने दूर ही से पूछा—'भद्र, सबके अकारणबन्धु तत्रभगवान् कृष्ण का कुशल है ?' वह 'कुशल है' यह कह कर प्रणाम करने के बाद कुछ दूर पर बैठ गया और विश्रान्त होकर बोला— 'मालिक ने यह लेख माननीय आपके पास भेजा है।' यह कह उसने खोल कर अर्पित किया । बाण ने आदर के साथ उसे ले स्वयं पढ़ा—'मेखलक से सन्देश समझ कर बुद्धिमान आप काम को बिगाड़ने वाली देरी मत करें, पत्र में इतना ही लिखा जाता है, शेष मौखिक सन्देश मात्र होगा' । बाण ने लेख का तात्पर्य समझ कर परिजनों को हटा दिया और मेखलक से सन्देश पूछा।' मेखलक बोला—'स्वामी ने मेधावी आपसे इस प्रकार कहा है—मान्य, आप जानते ही हैं कि एक गोत्र होना, बराबर ज्ञान होना, समान जाति होना, साथ में रह-कर बढ़ना, एक ही देश में निवास करना, बार-बार दर्शन होना, एक दूसरे के अनुराग को सुनना, परोक्ष में उपकार करना,