भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

द्वितीय उच्छ्वासः ८९ परिशीर्यमाणशिखासंहतयो महोषरेषु, गृहीतशिलाकवला इव ज्वलित- सूर्यमणिशकलेषु शिलोच्चयेषु, प्रत्यदृश्यन्त दारुणा दावाग्नयः । तथाभूते च तस्मिन्नत्युग्रे ग्रीष्मसमये कदाचिदस्य स्वगृहावस्थि- तस्य भुक्तवतोऽपराह्नसमये भ्रात्रा पारशवश्चन्द्रसेननामा प्रविश्याकथ- यत्—'एष खलु देवस्य चतुःसमुद्राधिपतेः सकलराजचक्रचूडामणिश्रेणी- शाणकोणकषणनिर्मलीकृतचरणनखमणेः सर्वचक्रवर्तिनां धोरेयस्य महाराजाधिराजपरमेश्वरश्रीहर्षदेवस्य भ्रात्रा कृष्णनाम्ना भवतामन्तिकं प्रज्ञाततमो दीर्घाध्वगः प्रहितो द्वारमध्यास्ते' इति । सोऽब्रवीत्—'आयु- ष्मन् ! अविलम्बितं प्रवेशयैनम्' इति । अथ तेनानीयमानम्, अतिदूरगमनगुरुजडजङ्घाकाण्डम्, कार्दमि- कचेलचीरिकानियमितोच्चण्डचण्डाटकम्, पृष्ठप्रेङ्खत्पटच्चरकर्पटघटितगल- शिखा ज्वाला, चूडा च । ऊषरं सिकताबहलो रूक्षो देशः । शिलोच्चयो गिरिः । 'दावो वनगतो वह्निर्दावश्च वनमुच्यते' । तथाभूतदेश इत्यादिनात्मानं प्रति तेषामादरातिशयं दर्शयति । आकुर्वत इति । न त्वप्रस्तावे । एतेन स्वस्य किमपि माहात्म्यमाह । स्वयमवसरमन्तरेण वा तस्य तदा प्रवेशाभावात् । एतदेव देव्येत्यादिविशेषणसंदर्भमुखेन द्वारमध्यास्त इत्यनेन पोषयिष्यते । पारशवः शूद्रापुत्रः । शाणो मणिकषणम् । कोणोऽश्रिः । चक्र- वर्तिनः सार्वभौमाः । धोरेयो मुख्यः । प्रज्ञाततमोऽतिप्रतीतः । एतेन च बाणं प्रति बहुमान एव गम्यते । जडा गमनाशक्ताः । कर्दमेन रक्तं कार्दमिकम् । चेलं वस्त्रम् । चीरिका खण्डिका । स्थानों में खल्वाट की भाँति उनकी शिखाएँ (ज्वालाएं या चोटियाँ) झड़ने लगीं। ज्वलित सूर्यकान्त मणियों के खण्डों वाले पर्वतों पर मानों शिलाओं के ग्रास ग्रहण करने लगीं । इस प्रकार ग्रीष्मकाल अत्यन्त प्रखर हो उठा। एक दिन जब बाण खा-पीकर अपने घर में बैठे थे तभी दोपहर के बाद पारशव (शूद्रा माता से उत्पन्न) भ्राता चन्द्रसेन ने भीतर प्रवेश कर निवेदन किया—'चारों समुद्रों के अधिपति, समस्त राजसमूह की चूडामणियों के शाण की रगड़ से निर्मल नखमणि वाले, समस्त चक्रवर्ती राजाओं में धुरन्धर, महाराजा- धिराज परमेश्वर श्रीमान् हर्षदेव के भाई कृष्ण ने अत्यन्त विश्वासपात्र अपना लम्बा रास्ता तय करनेवाला दूत पठाया है जो द्वार पर खड़ा है।' बाण ने कहा—'आयुष्मन्, शीघ्र उसे अन्दर लाओ।' तब बाण ने उसके द्वारा लाये गये प्रवेश करते हुए उस लेखहारक को देखा। लम्बी सफर करने से उसकी जाँघें भर गई थीं। मटियाले रंग की पेटी से उसका ऊँचा चंडातक