भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

त्वयि तु विना कारणेनादृष्टेऽपि प्रत्यासन्ने बन्धाविव बद्धपक्षपातं किमपि स्निह्यति मे हृदयं दूरस्थेऽपीन्दोरिव कुमुदाकरे । यतो भवन्तमन्तरेणा- न्यथा चान्यथा चायं चक्रवर्ती दुर्जनैर्ग्राहित आसीत् । न च तत्तथा न सन्त्येव ते येषां सतामपि सतां न विद्यन्ते मित्रोदासीनशत्रवः । शिशुचापलापराचीनचेतोवृत्तितया च भवतः केनचिदसहिष्णुना यत्किं- चिदसद्दशमुदीरितम्, इतरो लोकस्तथैव तद्गृह्णाति वक्ति च । सलिलानीव गतानुगतिकानि लोलानि खलु भवन्त्यविवेकिनां मनांसि । बहुमुख- श्रवणनिश्चलीकृतनिश्चयश्च किं करोतु पृथिवीपतिः । तत्त्वान्वेषिभिश्चास्मा- भिर्दूरस्थितोऽपि प्रत्यक्षीकृतोऽसि । विज्ञप्तश्चक्रवर्ती त्वदर्थम्-यथा प्रायेण प्रथमे वयसि सर्वस्यैव चापलैः शैशवमपराध्योति । तथेति च स्वामिना प्रतिपन्नम् । अतो भवता राजकुलमकृतकालक्षेपमागन्तव्यम् । अवकेशी-

अन्यथा चान्यथा चेति । एतेन किंचिदेव संभवतीति दर्शयति । अत एवाह-न च तत्त- थेति । तथात्वे तु वाणस्य दुर्वृत्तता प्रसज्येत । कृष्णस्यापि तादृशः पक्षपातः स्वामि- प्रतारणादि च दोषायैव भवेत् । अत एव वक्ष्यति-तत्त्वान्वेषिभिरित्यादि । ग्राहित इत्येतावति वक्तव्य आसीदित्यनेन दुर्जनाः संप्रतिनिरवकाशा इति प्रतिपादितम् । अत एव वक्ष्यति-तथेति च प्रतिपन्नं स्वामिनेति । सतां साधूनामपि । सतां भव- ताम् । उदासीनो मध्यस्थः । अपराचीनापराङ्मुखी चेतोवृत्तिर्यस्याः । अवकेशी

शील में समान होना ये सब स्नेह के हेतु हैं, पर तुममें तो अकारण ही मेरा हृदय भाई के समान स्नेह का पक्षपाती हो गया है । तुम दूर हो फिर भी चन्द्रमा जैसे कुमुद में स्नेह करता है उसी प्रकार मेरा हृदय भी अकारण स्नेह से भर गया है । तुम्हारी अनुपस्थिति में दुर्जन लोगों ने सम्राट् के कान भर दिये थे, पर यह सत्य नहीं है । सज्जनों में भी कोई ऐसे नहीं हैं जिनके मित्र, उदासीन और शत्रु न हों । किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति ने तुम्हारी बाल-चपलताओं के अनुकूल चित्तवृत्ति के कारण चिढ़ कर कुछ उल्टा-पुल्टा कर दिया है, अन्य लोग भी वैसा ही समझते हैं और कहते रहते हैं । मन्दबुद्धियों के चित्त जल की तरह अस्थिर और दूसरों के कहे पर चलते हैं । बहुतों के मुँह से सुनकर सम्राट् ने अपना मत स्थिर कर लिया, क्या करते ! तत्त्व को पहचानने वाले हम लोग दूर रहने वाले भी तुमको प्रत्यक्ष जान गये हैं । तुम्हारे लिए सम्राट् तक सिफारिश पहुँचाई गई है कि इस तरह की चपलता के कारण प्रायः सबका शैशव आयु के प्रथम भाग में अपराधी हो जाता है । सम्राट् ने इस बात को स्वीकार किया । इसलिए समय-यापन न करके आप राजकुल में पधारिये । सम्राट् से बिना मिले