हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ हर्षचरितम् वादृष्टपरमेश्वरो बन्धुमध्यमधिवसन्नपि न मे बहुमतः । न च सेवावैषम्य- विषादिना परमेश्वरोपसर्पणभीरुणा वा भवता भवितव्यम् । यतो यद्यपि— स्वेच्छोपजातविषयोऽपि न याति वक्तुं देहीति मार्गणशतैश्च ददाति दुःखम् । मोहात्समाक्षिपति जीवनमप्यकाण्डे कष्टं मनोभव इवेश्वरदुर्विदग्धः ॥ तथाप्यन्ये ते भूपतयः, अन्य एवायम् । न्यक्कृतनृगनलनिषधनहुषाम्बरीष- दशरथदिलीपनाभागभरतभगीरथययातिरमृतमयः स्वामी । नास्याहङ्कार- कालकूटविषदिग्धदुष्टा दृष्टयः, न गर्वगरगुरुगलग्रहगदगद्गदा गिरः, निष्फलतरुः । स चाहष्टरविस्तरुमध्यगो न कस्यचित्प्रियः । स्वेच्छोपजाता विषया मण्डलानि यस्मात्तादृगपि देहि प्रयच्छेति वक्तुं न पार्यते । इतरत्र-स्वेच्छया स्वसंकल्पेनोपजात उत्पन्नो विषयो गोचरो यस्य । तथा चोच्यते—'काम जानामि ते मूलं संकल्पात्किल जायसे' इति । अथ च स्वेच्छया उपजाता विषया यस्यायं देही च शरीरवानिति वक्तुं न याति । न शक्यत इति विरोधः । कामस्यानङ्गत्वद् देही शरीरवानिति वक्तुं न युज्यत इत्यन्यार्थः । मार्गणा याचकाः, शराश्च मार्गणाः । जीव्यतेऽनेनेति जीवनम्, ग्रामादि जीवितं च, ईश्वरो राजा हरश्च । दुर्विदग्धो दुरुढः, दुष्टत्वाद्विशेषेण दग्धश्च । अमृतेत्यादि साभिप्रायम् । यस्मादहंकारादि कालकूटादिना रूपयति, अतश्चा- हंकारादीनामत्यन्ताभावप्रकाशनेच्छयाऽमृतमयत्वमस्य दर्शयति । अमृतमयस्य निष्फल वृक्ष की तरह आपका बन्धुओं के बीच निवास करना मुझे अच्छा नहीं लगता । आपको सेवा में झंझट समझ कर उदासीन न होना चाहिए और सम्राट् के पास आने में न डरना चाहिए । यद्यपि “बुद्धिहीन राजा कामदेव की भाँति कष्टदायक होता है, उसे अपनी इच्छा के अनुसार मण्डल ( विषय ) प्राप्त होते रहते हैं, वह किसी से 'दो' कहने नहीं जाता, सैकड़ों बार याचना करने पर दुःख देता है, मोहवश ( ग्रामादि ) जीवन सामग्री को गलत स्थान में पहुँचा देता है" ( श्लेष के अनुसार कामदेव भी इच्छा उत्पन्न होकर अनुभव का गोचर होता है, वह 'देही' अर्थात् शरीर- धारी नहीं कहलाता, सैकड़ों बाणों ( मार्गणों ) से दुःख देता है, मोह द्वारा जीवन ( प्राण ) को अकाण्ड दुरवस्था में डाल देता है ) । तथापि ऐसे राजे कोई दूसरे ही होते हैं, यह ( हर्ष ) तो उससे भिन्न है । इसके सामने नृग, नल, नहुष, निषध, अम्बरीष, दशरथ, दिलीप, नाभाग, भरत, भागीरथ, ययाति आदि क्या हैं ! स्वामी अमृतमय हैं, न तो इनकी दृष्टि अहंकार के कालकूट विष से भीनी हुई क्रूर है, न इनकी वाणी दर्परोग से गला जकड़