हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 129, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुलायपातिनः श्येनाः, क्वचिद्विलीनलाक्षारसलोहितच्छवयोऽधराः, क्वचि- दासादितशकुनिपक्षकृतपटुगतयो विशिखाः, क्वचिद्दग्धनिःशेषजन्महेतवो निर्वाणाः, क्वचित्कुसुमवासिताम्बरसुरभयो रागिणः, क्वचित्सधूमोद्गारा मन्दरुचयः, क्वचित्सकलजगद्ग्रासघस्मराः सभस्मकाः, क्वचिद्वेणुशिखर- नकुलाश्च । इतरत्र, —जटा मूलानि च । कपिलाः पिङ्गलाः कपिलाख्यमुनिव्रत- ग्रहणान्मनुष्या एवाभेदोपचारेण कपिलाः । एते च जटावल्कलधारिणः । कुलाया नीडाः । श्येनाः शुक्लाः, पाक्षिकाश्च । अधरा धर्तुमशक्याः, अधोमर्वा वा । लाक्षाया विलीनतया पीतत्वात् । ओष्ठाश्चाधराः । आ समन्तात्सादिता आहताः, स्वीकृताश्च । स्निग्धतया नीरसतया च । शकुनीनां पक्षेषु कृतपटुगतयः, निःसारतया कालस्थापितत्वात् । विगता शिखा ज्वाला येषां ते, विविधशिखाः शराश्च । निःशेषाः समस्ताः, प्राक्तनजन्मान्तरसंचिता अपि । जन्महेतवस्तुणाद्याः, कर्माणि च । निर्वाणाः शान्ताः, मोक्षगामिनश्च । कुसुमं धूमः पुष्पं च । अम्बरं नभः, वस्त्रं च । रागिणो लोहिताः, शृङ्गारिणश्च । अजीर्णकृतोऽपि धूमोद्गारः । रुचिर्दीप्तिः, भोज- नाभिलाषश्च । जगदेव ग्रासः कवलं तद्भक्षणशीलाः । भस्मभूरिकक्ष्वात्यशनव्याधिः । वृद्धा वृद्धिं गताः, स्थविराश्च । ते वेणुशिखरमवलम्बन्ते यष्टिं गृह्णन्ति । अचलाः पर्व- ताः । अन्यत्र, —क्षयस्य दीर्घकालपर्यवसायित्वादचलमविच्छिन्नं मक्षितशिलाह्वयाः । उक्तं च—‘शिलाधातुप्रयोगाद्वा प्रसादाद्वाथ शांकरात् । अजामूत्रप्रयोगाद्वा क्षयः घोसलों पर टूट पड़तीं, कहीं द्रवित होकर बढ़ते हुए लाक्षारस के अधर के समान लाल हो जातीं। कहीं पैदा होने के सभी कारणों को जला कर बुझ जाती ( निर्वाण की अवस्था में भी जन्म लेने के सभी हेतु क्षपित हो जाते हैं ), कहीं रागियों की भाँति धुएँ की धुआंसी गन्ध से आकाश को भर देतीं ( रागी लोग भी फूलों की गन्ध से बसे वस्त्र पहनते हैं ), कहीं धुयें को उड़ेल कर शोभा मन्द कर देतीं । (धूमोद्गार या ढेंकार के रोग वालों की रुचि या भोजनाभि- लाष मन्द पड़ जाता है) कहीं सारे संसार को खा जाने की प्रवृत्ति करतीं और भस्म कर देतें ( भस्मक रोग वाले भी बहुत खाया करते हैं ), कहीं अत्यन्त बढ़कर बांसों की फुनगियों तक पहुँच जातीं। ( जो अत्यन्त वृद्ध हो जाते हैं बांस की लाठी का सहारा लेते हैं ) कहीं क्षयशील होकर पर्वत के शिलाजतु के उपयुक्त बन जातीं ( क्षय रोग वाले भी हमेशा शिलाजीत का सेवन करते हैं ) कहीं अत्यन्त बढ़ कर सभी रस का योग करने लग जातीं ( मोटे तगड़े लोग सभी प्रकार के मधुरादि रसों का सेवन करते हैं ) कहीं रौद्र रूप धारण करके गुग्गुलुओं को जलातीं (रुद्र के उपासक लोग भी गुग्गुलु जलाया करते हैं ), कहीं स्थाणुओं (ठूँठ वृक्षों) पर चढ़कर मूल को ज्वलित करके मदन वृक्ष की फूलों में साथ शाखाओं को भी जलातीं ( स्थाणु अर्थात् शिव जी ने प्रज्वलित नेत्र की अग्नि से फूल के बाणों वाले कामदेव को जला डाला था ), कहीं चंचल शिखाओं के द्वारा नृत्य आरम्भ करके आरभटी शैली में नाचने