हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ें८६ हर्षचरितम् Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri भस्मीकरणाभिचारचरुपचनचतुराः, रुधिराहुतिभिरिव पारिभद्रद्रुमस्तबक- वृष्टिभिस्तर्पयन्तस्तारान्वनविभावसून, अशिशिरसिकतातारकितरंहसः, तप्तशैलविलीयमानशिलाजतु रसलवलिप्तदिशः, दावदहनपच्यमानचटकाण्ड- खण्डखचिततरुकोटरकीटपटलपुटपाकगन्धकटवः, प्रावर्तन्तोन्मत्ता मातरिश्वानः। सर्वतश्च भूरिभस्त्रासहस्रसंधुक्षणक्षुभिता इव जरठाजगरगम्भीरगल- गुहावाहिवायवः, क्वचित्स्वच्छन्दतृणचारिणो हरिणाः, क्वचित्तरुतल- विवरवर्तिनो बभ्रवः, क्वचिज्जटावलम्बिनः कपिलाः क्वचिच्छकुनिकुल- टनमारणाद्यर्थं चरुपचनं कुर्वन्ति, रक्तेन चाग्नीन्प्रीणयन्ति। पारिभद्रा निम्बाः। मदना इत्यन्ये। उन्मत्ता अपि निर्विवेकतया रक्तादि यत्किंचिदशुचिप्रायमग्निषु निक्षिपन्ति, तत एव विश्वस्य दोषाय पर्यवस्यन्ति। तारकितमिव रंहो वेगो येषां ते। शिलाजतु अश्मसारः। दावदहनेन पच्यमानानि यानि चटकाण्डानि तेषां विदारणवशात्स्फुटिता ये खण्डाः कपालानि तैः। दोलावदुपनिपतितैः खचितानि कषायमानानि यानि तरुकोटरेषु कीटपटलानि कृमिसमूहास्तेषामतिपेलशत्वेन यत एव तसैः खण्डैरु पर्याच्छादकतया स्थितै. पुटपाकैः प्रसवधूमोऽभ्यन्तरपाकस्तद्गन्धेन कटव उद्वेजकाः। अत्राग्निपाकेन खण्डत्वं खण्डेभ्यो रसनिःसरणात्खचितत्वं कीटा- नाम्। उन्मत्ता इति। ये चोन्मत्तास्ते सिकताव्याप्ताः कर्दमविलिप्तदिशो गन्धकटवः शाटीकराद्याः पूर्वोक्ताः क्रियाः प्रायेण कुर्वत इति। सर्वत्रात्र महावाक्ये ध्वनिच्छा- यान्वेष्या। मातरिश्वानो वायवः। सर्वतश्चेत्यादौ। दावाग्नयः प्रत्यदृश्यन्तेति संबन्धः। भस्त्रा इति। संधुक्षणमु- द्दीपनम्। जरठाजगरा वृद्धसर्पाः। गला एव गुहा गलगुहाः। स्वच्छन्दमपविघ्नम् यथारुचि। चरणं भक्षणम्, गमनं च। हरिणाः शुक्लाः, मृगाश्च। बभ्रवः कपिलाः, मानों रुधिर की आहुति दे रही हो, हवा ने इस प्रकार वृक्षों में लगी हुई आग को तृप्त किया। हवा के वेग में आतप के तेज से बालू तारे की तरह चमकने लगे। गर्म चट्टानों से शिलाजीत का रस बह-बह कर दिशाओं को लेपता हुआ फैलने लगा। वन में लगी आग की गर्मी से चिड़ियों के अंडे फूटकर पेड़ों के कोटरों में बिछ गए थे जिनमें झुलसे हुए कीड़ों से मिलकर पकने से पुटपाक की उग्रगन्ध उठ रही थी।† चारों ओर भीषण वनाग्नियाँ दिखाई पड़ने लगीं। मानों वे अग्नियाँ हजारों धौकनियों के चलाने से क्षुभित होकर बढ़ती जा रही थीं। पुराने अजगर, साँप के गले की मीठी गुहा से निकलने वाली वायु उन्हें उत्तेजित कर रही थीं। कहीं हिरनों की भाँति अग्नियाँ घासों में स्वच्छन्द विचरण करतीं, कहीं नेवलों की तरह वृक्षों के नीचे विवरों में घुस पड़तीं, कहीं तप- स्वियों की तरह विशाखों की पीली जटाएँ धारण करतीं, कहीं बाजों के समान पक्षियों के † हवा के सभी विशेषण उन्मत्त या पागल के स्वभाव के अनुकूल अर्थ में भी है। CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.