हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 127, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः ८५ Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सूचीशतैः, जिह्वाला इव वैश्वानरशिखाभिः, उत्सर्पंतसर्पकञ्चुकैश्चूडाला इव ब्रह्मास्तम्भरसाभ्यवहरणाय कवलग्रहमिवोष्णैः कमलवनमधुभिरभ्य- स्यन्तः सकलसलिलोच्छोषणघर्मघोषणाघोरपटहैरिव शुष्कवेणुवनास्फो- टनपटुरवैस्त्रिभुवनबिभीषिकामुद्भावयन्तः, च्युतचपलचाषपक्षश्रेणीशारित- सृतयः, त्विषिमन्मयूखलतालातप्लोषकल्माषवपुष इव स्फुटितगुञ्जाफल- स्फुलिङ्गाङ्गाराङ्किताङ्गाः, गिरिगुहागम्भीरभांकारभीषणभ्रान्तयः, भुवन- दद्रूयुक्ता भवन्ति । शिरालाः प्रकटस्नायवः । उन्मत्ता अपि कृशत्वाच्छिराला भवन्ति । वेणी पङ्क्तिः । शिरासादृश्यप्रतिपादनाय वेणीपदम् । श्मश्रुः कूर्चंः । शुकाः किशारवः । उन्मत्ता अपि केशवपनाभावाद्दीर्घश्मश्रवः । दंष्ट्रा बहिर्निर्गता दन्ताः । शललः श्वावित् । सूची दीर्घकण्टकरूपाणि रोमाणि, अन्ये तु—दंष्ट्रालाः शललाः, श्वाविधः पक्षाश्च शलला उच्यन्ते । तथा च—'श्वाविधः शललैरिव' इति महाभारते दृश्यत इत्याहुः । उन्मत्ता अप्येवमादिविकारेण सर्वं मीषयन्ते । एवं जिह्वाला अपि । एवमेव स्नानादिना विनोन्मुक्तचूदत्वादुत्सर्पदित्यादि । कञ्चुकं त्वक् । ब्रह्मास्तम्भो ब्रह्माण्डः । रसाभ्यवहरणं शोषणम्, रसानां च मधुरादीनां भोजनम् । 'असंचार्यों मुखे पूर्णे गण्डूषः केवलोऽन्यथा' । अभ्यस्यन्त इति । एवमिदं शोष- 'यिष्याम इति । घर्मो ग्रीष्मः । घोषणा श्रावणा । विभीषिकामिति । ये सगर्वा जगद्ग्रसनशीलास्ते त्रिभुवनेऽपि भयमुत्पादयन्ति । चाषः किकीदिविः पक्षिभेदः । उन्मत्तपक्षे—विस्मरणशीलत्वाच्च्युतेत्यादि योज्यम् । सृतिर्मार्गः । त्विषिमान् रविः । अलातमुल्मुकम् । कल्माषं रक्तकृष्णम् । गुञ्जा रक्तिका । उपलानि लोहितकृष्णानि भवन्ति । स्फुलिङ्गा अग्निकणाः । अङ्गाराङ्कितानीवाङ्गाराङ्कितानि दग्धान्यङ्गानि । ये च साङ्गारास्ते मलिनशरीरा भवन्ति । उन्मत्ता अप्यग्निशस्त्रश्वभ्रादिषु बलादति- पतन्ति । भांकारभीषणा भ्रमन्ति च ॥ अभिचार उच्चाटनम् । अभिचारिणश्चोच्चा- पत्तों का खुजाने क लिए बटारने लगीं। हवा की शिराओं के समान तिनके उड़ने लगे। जब कि नुकीली शिखाएँ वायु की बढ़ी हुई दाढ़ी के समान हिल रही थीं। उड़ते हुए शलल के सैकड़ों कांटेदार रोंगटे हवा के दाँत के समान थे। आग की लपटें हवा की जीभ हो रही थीं। साँप के केंचुल हवा में बिखरे हुए बाल के समान उड़ने लगे। ब्रह्माण्ड के सारे रस को चाट जाने के लिए हवा मानों कमल के मधु का ग्रास बनाकर अभ्यास कर रही थी। बाँसों के चटकने की तीखी आवाज होने लगी मानों सारे जलों को सोख लेने वाले आतपों का घोषणा-पटह जल रहा हो, इस प्रकार हवा ने तीनों लोकों को भयभीत कर दिया। चाष पक्षी के पंख झड़कर मार्ग को ढँक रहे थे। हवा का शरीर मानों सूर्य की किरणों के जलते अङ्गारों से झुलस कर कुछ काला और लाल (कल्माष) हो गया था, चटकते हुए गुञ्जाफलों के समान अग्निकणवाही अंगारों से हवा के अङ्ग-अङ्ग भर गये। पहाड़ की गुफाओं में गंभीर झंकार भर कर हवा ने भयानक भ्रम उत्पन्न कर दिया। संसार को भस्म करने के अभिचार (वेदविहित हिंसात्मक कर्म उच्चाटन) में चरु पकाने में चतुर हवा ने नीम के गुच्छों को इस तरह बरसाया