हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
४. उच्छ्वास ७-८: हर्षवर्धन का दिग्विजय-प्रयाण, राज्यश्री-उद्धार एवं ग्रन्थ उपसंहार
१०४ हर्षचरितम् जातिभिः सर्वदेशान्तरागतैश्च दूतमण्डलैरूपास्यमानम् सर्वप्रजानिर्माण- भूमिमिव प्रजापतीनां, लोकत्रयसारोच्चयरचितं चतुर्थमिव लोकम्, महा- भारतशतैरप्यकथनीयसमृद्धिसंभारम्, कृतयुगसहस्रैरिव कल्पितसन्निवेशम् स्वर्वाबुंदैरिव विहितरामणीयकम्, राजलक्ष्मीकोटिभिरिव कृतपरिग्रहं राजद्वारमगमत् । अभवच्चास्य जातविस्मयस्य मनसि—‘कथमिवेदमियत्प्रमाणं प्राणि- जातं जनयतां प्रजासृजां नासीत्परिश्रमः, महाभूतानां वा परिक्षयः, पर- माणूनां वा विच्छेदः, कालस्य वान्तः, आयुषो वा व्युपरमः, आकृतीनां वा परिसमाप्तिः' इति । मेखलकस्तु दूरादेव द्वारपाललोकेन प्रत्यभिज्ञाय- मानः 'तिष्ठतु तावत्क्षणमात्रमत्रैव पुण्यभागी' इति तमभिधायाप्रतिहतः पुरः प्राविशत् । प्रोक्तमधीयते पाराशरिणो यतयस्तैः । वर्णिभिर्ब्रह्मचारिभिः । सर्वप्रजेति । अत्र हि स्थित्वा यदि प्रजापतयो न सृज्येयुः तत्कथं सर्वे भावाः कारणभूता इव तत्र लक्ष्येरन् । अर्बुदं दशकोटयः । कोटिलक्षशतम् । इह तु बहुसंख्योपलक्षणार्थावर्बुदकोटिशब्दौ । परिसमाप्तिरन्तारम्भः । तिष्ठत्विति । विद्यायुक्ते कदाचिदनादरशङ्केत्येतदर्थं- माह—पुण्यभागीति । पतियों को सब प्रकार की प्रजाओं के निर्माण का स्थान था। तीनों लोकों के सार को इकट्ठा करके मानो कोई चौथा लोक बना दिया गया था। सैकड़ों महाभारत भी लिखे जाँय फिर भी उसके वैभव का वर्णन नहीं किया जा सकता । मानो हजारों सतयुगों ने अपने-अपने रहने के लिए वहां भवन बना लिया था । मानो करोड़ों स्वर्गों उसको शोभा बढ़ा रहे थे। करोड़ों की संख्या में राजलक्ष्मी ने आकर उसे मानों अपना आश्रय बना लिया था । बाण को आश्चर्य हुआ, उसके मन में हुआ—'इतने प्राणियों को उत्पन्न करते हुए प्रजापतियों को कैसे नहीं थकान हुई ? या पांचों महाभूत समाप्त क्यों न हुए ? परमाणुओं का विच्छेद क्यों न हुआ ? समय का अन्त या आयु का खात्मा या आकृतियों की परिसमाप्ति क्यों न हुई ?' इधर मेखलक को दूर से ही द्वारपालों ने पहचान लिया । 'पुण्यभागी आप क्षण भर यहीं ठहरें' बाण से यह कह मेखलक बेरोकटोक भीतर घुस गया ।
द्वितीय उच्छ्वासः १०५
अथ स मुहूर्तादिव प्रांशुना, कर्णिकारगौरेण, वीध्रकञ्चुकच्छन्नवपुषा, समुन्मिषन्माणिक्यपदकबन्धबन्धुरवस्तबन्धकृशावलग्नेन, हिमशैल- शिलाविशालवक्षसा, हरवृषककुदकूटविकटांसतटेन, उरसा चपलहृषीक- हरिणकुलसंयमनपाशमिव हारं बिभ्रता, 'कथयतं यदि सोमवंशसंभवः सूर्यवंशसंभवो वा भूपतिरभूदेवंविधः' इति प्रष्टुमानीयताभ्यां सोमसूर्याभ्या- मिव श्रवणगताभ्यां मणिकुण्डलाभ्यां समुद्भासमानेन, वहद्वदनलावण्य- विसरवेणिकाक्षिप्यमाणेराधिक्रारगौरवाद्वोयमानमार्गेणेव दिनकृतः किरणैः प्रसालब्धया विकचपुण्डरीकमुण्डमालयेव दीर्घया दृष्ट्या दूरादेवानन्द- यता, नैष्ठुर्याधिष्ठानेऽपि प्रतिष्ठितेन पदे पदे प्रश्रयमिवावनम्रेण, मौलिना
अथेत्यादौ । ईदृशपुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचदिति संबन्धः । अन्तराले स्वतन्त्ररादिवर्णनामावादथेत्यादिना समनन्तरमेव निर्गमनेन पुनरादर एव प्रती- यते । अत आह—मुहूर्तादिवेति । पुरुषानुगतत्वेन चादर एव पोष्यते । वीध्रं निर्म- लम् । बन्धुरं शोभनम् । वस्तं सुवर्णपट्टिकाकटिसूत्रम् । तस्य बन्धेन निवेशनेन कृशमवलग्नं मध्यं यस्य तेन । हिमशैले । हिमग्रहणं राज्ञो धवलत्वात् । हरग्रहणं जराशौक्ल्यप्रतिपादनाय पूर्ववत् । हृषीकाणीन्द्रियाणि । आनीताभ्यामिति । आन- यने तस्य प्रमविष्णुता ध्वन्यते । यश्च स्रष्टुमानीयते स श्रवणं गच्छति । वेणिका
तब कुछ ही क्षण में मेखलक बाहर निकला उसके पीछे-पीछे एक दूसरा भी पुरुष था । वह लम्बा और कर्णिकार की भाँति पीतवर्ण का था । उसका शरीर निर्मल कंचुक से ढँका था । उसकी कमर चमकते हुए माणिक्य के पदकों वाली सुन्दर पेटी से बँध जाने के कारण पतली हो गई थी । उसकी छाती हिमालय की चट्टान के समान चौड़ी थी । शिव के वाहन वृषभ की पीठ के टाट के समान उसके दोनों कन्धे थे । वह अपने चंचल इन्द्रिय- हरिणों को बांध रखने के लिए पाश के समान अपने वृक्ष पर हार धारण किये हुए था । चन्द्र और सूर्य के समान मणिकुण्डल उसके कानों में शोभित हो रहे थे, मानों वे (चन्द्र और सूर्य) उन कानों से पूछ रहे थे कि 'यदि चन्द्रवंश में या सूर्यवंश में कोई हर्ष जैसा सम्राट् उत्पन्न हुआ हो तो उसे बताओ।' वह दूर ही से अपनी बड़ी-बड़ी आँखों द्वारा आनन्दित कर रहा था, उसकी आँखें खिले हुए पुण्डरीक की मानो मुण्डमाला थी, जिसे सूर्य की किरणों ने प्रसन्न होकर मानो अर्पित किया था, क्योंकि उसके मुख की लावण्यप्रभा के प्रवाह से वे किरणें बिल्कुल तिरस्कृत हो रही थीं, फिर भी सूर्य के अधिकार-गौरव को देख- कर उसने उनके लिए मार्ग दे दिया था । अत्यन्त निष्ठुर पद पर प्रतिष्ठित होने पर भी वह अपने झुके मस्तक से विनय की भाँति सफेद पगड़ी धारण किये था। उसके बायें हाथ में स्थूल
१०६ हर्षचरितम् पाण्डुरमुष्णीषमुद्वहता, वामेन स्थूलमुक्ताफलच्छुरणदन्तुरत्सरुं करकिस- लयेन कलयता कृपाणम्, इतरेणापनीततरलतां ताडिनीमिव लतां शात- कौम्भीं वेत्रयष्टिमुन्मृष्टां धारयता पुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचत्— 'एष खलु महाप्रतीहाराणामनन्तरश्चक्षुष्यो देवस्य पारियात्रनामा दौवा- रिकः। समनुगृह्णात्वेनमनुरूपया प्रतिपत्त्या कल्याणाभिनिवेशी' इति। दौवारिकस्तु समुपसृत्य कृतप्रणामो मधुरया गिरा सविनयमभाषत— 'आगच्छत। प्रविशत देवदर्शनाय। कृतप्रसादो देवः' इति। बाणस्तु 'धन्योऽस्मि, यदेवमनुग्राह्यं मां देवो मन्यते' इत्युक्त्वा तेनोपदिश्यमान- मार्गः प्राविशदभ्यन्तरम्। अथ वनायुजैः, आरट्टजैः, काम्बोजैः, भारद्वाजैः, सिन्धुदेशजैः, पारसी- प्रवाहः। वामेनेति। तदा तस्य व्यापारानुपपत्तेः अपनीतेत्यादिनास्य नियम- विधायित्वं पोष्यते। उन्मृष्टामुत्तंसिताम्। अनेन भास्वरतैव पोष्यते। अनन्तरः प्रधानम्। चक्षुष्यः प्रियः। आगच्छतेत्यादौ बहुत्वनिर्देशेनादर एवास्यापाद्यते। अथेत्यादौ एवंविधैस्तुरङ्गैरारचितां मन्दुरां विलोकयन्दूरादिमधिष्ण्यागारम- पश्यदिति सम्बन्धः। वनायुजादीनि देशविशेषेणाश्वानां नामानि। शोणैरित्यादि- मोतियों की जड़ाऊ मूठ वाली तलवार था और दाहिनी हाथ में तरलता से रहित विद्युल्लता के समान; चमक चढ़ी सोने की वेत्रयष्टि थी। मेखलक ने कहा—'यह महाप्रतीहारों का मुखिया, महाराज का प्रिय, परियात्र नामक दौवारिक है। कल्याण में अभिनिवेश रखने वाले आप इसका उचित सम्मान करें। दौवारिक पारियात्र ने पास आकर प्रणाम किया और मधुर आवाज में विनयपूर्वक बोला—'आप आइए, और महाराज के दर्शन के लिए प्रवेश कीजिए, महराज आप पर प्रसन्न हैं। बाण ने कहा—'मैं धन्य हूँ, जो मुझे महाराज इस प्रकार अपने अनुग्रह के योग्य समझ रहे हैं।' यह कहकर पारियात्र के द्वारा मार्ग दिखाने जाने पर बाण ने भीतर प्रवेश किया। बाण ने भीतर प्रवेश करते ही अनेक राजवल्लभ तुरङ्गों की बनी हुई मन्दुरा (घोड़साल) देखीं। वहाँ कुछ वनायुज (वानाघाटी वजीरिस्तान में उत्पन्न) घोड़े, कुछ आरट्टज (वाहीक या पंजाब में उत्पन्न) घोड़े; कुछ काम्बोज (मध्य एशिया में वन्धु नदी के पामीर प्रदेश में उत्पन्न) घोड़े, कुछ भारद्वाज (उत्तरी गढ़वाल के) घोड़े, कुछ सिन्धुदेशज (सिंधसागर या थल दोआब के उत्पन्न) घोड़े, कुछ पारसीक (सासानी ईरान के) घोड़े थे। कुछ शोण (लालकुम्मैत), कुछ श्याम (मुदकी), कुछ श्वेत (सब्जा), कुछ पिञ्जर (समंद), कुछ हरित (नीलासब्जा),
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कैश्च, शोणैश्च, श्यामैश्च, श्वेतैश्च, पिञ्जरैश्च, हरिद्भिर्श्च, तित्तिरिकल्माषैश्च, पञ्चभद्रैश्च, मल्लिकाक्षैश्च, कृत्तिकापिञ्जरैश्च, आयतनिर्मांसमुखैः, अनुत्क- टकर्णकोशैः, सुवृत्तश्लक्ष्णसुघटितघण्टिकाबन्धैः, यूपानुपूर्वीवक्रायतोदग्र- ग्रीवैः, उपचयश्वसत्स्कन्धसंधिभिः, निर्भुग्नोरःस्थलैरस्थूलप्रगुणप्रसृते- वर्णविशेषवर्णनम् । 'शोणः पद्मारुणः स्मृतः' । पिञ्जरैरीषत्कपिलैः । हरिच्छुकनिभो वर्णः । तित्तिरिः पक्षिभेदस्तद्वच्चित्रैः । 'सिताश्च यस्य वाजिनः शफाः समस्तकं मुखम् । स पञ्चभद्रनामको नृपस्य राज्यसौख्यदः' ।। शुक्लपर्यन्ते असिततारके नयने येषां ते मल्लिकाक्षाः । उक्तं च - 'पृथुस्निग्धा समा चैव मल्लिकाकुसुमप्रभा । राजी यस्य तु पर्यन्ते परिक्षेप्ये तु लोचने ।। सह यो मल्लिकाक्षस्तु दृष्टिपर्यन्ततारकः ॥' इति । तारकाः कदम्बककल्पनेकविन्दुकल्माषितत्वचः कृत्तिकापिञ्जरा यतः । आयतेत्यादि । तदुक्तम् - 'मुखं तन्वायतनातं चतुरस्रं समाहितम् । ऋजु चैवो- पदिष्टं च परिपूर्णं च शस्यते ॥' इति । कृष्णेनाप्युक्तम् - 'उज्जा अतुंगअत्थं गिम्मं संवाहिरान अच्छअणं' इति । अनुत्कटो ह्रस्वः । कोशो मध्यम् । शिरसो ग्रीवायाश्च यन्मध्यं स घण्टिकाबन्धः । यो निगाल इत्युच्यते तस्य सुवृत्तादि शस्यते । यदाह- 'ग्रीवाशिरोऽन्तरश्लिष्टो दीर्घवृत्तः समाहितः । नाद्धर्तो नार्धितो नातिदुनहिोऽति- विधानतः ॥ सुदिग्धोऽनुपदिग्धश्च निगालो गदितः शुभः ॥' इति । यूपो यज्ञचिह्नं तस्येवानुपूर्वी यस्याः । तथा वक्रा आयता उदग्रा उद्घुरा ग्रीवा येषाम् । तदुक्तम्- 'ग्रीवा मूलम्बिनी वृत्ता दीर्घा च सुसमाहिता । गले बद्धा विदोवृत्ता तथा शिरसि चोद्यता । निगाले स्याच्च निर्मांसा वृद्धो साकुञ्चिता भृशम् । श्लिष्टमांसाब्रबद्धा च तुरगस्य प्रशस्यते ॥ इति । उपचयेत्यादि । तदुक्तम् - 'स्कन्धः सुपरिपूर्णः स्याद्व्यक्त- मांसः पृथुत्रिकः । बहुमांसाङ्गसंश्लिष्टः स्थिरमांसश्च पूरितः ॥' इति । निर्भुग्नं स्थूल- त्वादबहिर्निःसृतम् । उक्तं च - 'स्थूलास्थि महदच्छिद्रं पृथुलं यच्च निर्वलि । उर ईदृक्प्रशंसन्ति स्थूलक्रोडं महत्तरम् ॥ इति । निर्भुग्नमुत्पन्नद्रोणिकमिति केचित् । कुछ तित्तिरकल्माष (तीतरपंखी) घोड़े थे । (शुभ लक्षणो वाले घोड़े थे ढंसे) पञ्चभद्र (अर्थात् पञ्चकल्याण-हृदय, पृष्ठ, मुख और दोनों पाश्र्वों में पुष्पित था भौंरी याला), मल्लिकाक्ष (शुक्ल अपांग वाला) और कृत्तिकापंजर (तारों जैसी सफेद चित्तियों वाला, चितकबरा) । उनका मुँह लम्बा और मांसरहित था, कान छोटे-छोटे थे, घंटी (सिर और गर्दन की जोड) गोल, चिकनी और सुडौल थी, गर्दन ऊपर उठी हुई और यूप की तरह लम्बी और टेढ़ी थी, कन्धे की जोड़ मांस से फूली हुई थी, छाती निकली हुई थी, जांघे पतली और सीधी थीं, खुर लोहे की भांति कड़े थे; वेग में टूटने के भय से मानो अंतड़ियों से रहित और गोल उदर भाग था (पीठ, छाती, कटि भागों के मांस के खिंच जाने से)
१०८ हर्षचरितम्
लोहपीठकठिनखुरमण्डलैः, अतिजवतृटनभयान्निर्मितान्त्राणीवोदराणि वृत्तानि धारयद्भिः, उद्यद्द्रोणीविभज्यमानपृथुजघनैः, जगतीदोलायमान- बालपल्लवैः, कथमप्युभयतो निखातदृढभूरिपाशसंयमननियन्त्रितैः, आय- तैरपि पश्चात्पाशबन्धपरवशप्रसारितैकाङ्घ्रिभिरायततरैरिवोपलक्ष्यमाणैः, बहुगुणसूत्रग्रथितग्रीवागण्डकैः, आमीलितलोचनैः, दूर्वारसश्यामळफेनल- वशबलान् दशनगृहीतमुक्तान् फरफरितत्वचः कण्डूजुषः प्रदेशान् प्रचाल- यद्भिः, सालसवलितवालधिभिः, एकशफविश्रान्तिश्रमस्रस्तशिथिलित- जघनार्धैः, निद्रया प्रध्यायद्भिश्च, स्खलितहुंकारमन्दमन्दशब्दायमानैश्च, ताडितखुरधरणीरणितमुखरशिखरखुरलिखितक्ष्मातलैर्घासमभिलषद्भिश्च, प्रकीर्यमाणयवसग्रासरसमत्सरसमुद्भूतक्षोभैश्च, प्रकुपितचण्डचण्डालहुङ्कार- कातरतरतरलतारकैश्च, कुङ्कुमप्रमृष्टिपिञ्जराङ्गतया सततसन्निहितनीरा- ऽस्थूलप्रगुणप्रांस्यतैनिर्मांसऋजुजङ्घैः । उक्तं च—'जङ्घे वृत्ते दीर्घे निर्मांसे पूजिते निगूढसिरे' इति । मण्डलशब्देन वृत्तत्वमुच्यते । तदुक्तम्—'खुरास्तुरङ्गे वृत्ताश्च ह्रस्वाश्च सुदृढा घनाः' इति । तथा शिलातलनभैः खुरैरिति । उदराणीति । तदुक्तम्- 'उदरं वृत्तमगुरु मृगस्योपचितं तथा । अच्छिद्रह्रस्ववृत्ताल्पसमकुक्षि च पूजितम् ॥' इति । द्रोणी शोभाविशेषः । यदाह— 'पृष्ठोरःकटिपार्श्वस्थमांसोत्कर्षणनिर्मिता । द्रोणिकेति प्रशंसन्ति शोभा वाजिनि पञ्चमी ॥' इति । बाला एव पल्लवाः । उभयत इति । अत्युद्दामवेगवत्त्वादुभयत्र पाशबन्धः । गण्डको भूषणभेदः । फरफरिताः पुनः पुनरीषत्कम्पिताः । वालधिः पुच्छः । शफः समुद्गयुक्तः पादः । खुरधरणी खुराग्रःकाष्ठपट्टाच्छादिता भूः । चण्डालोऽश्वपालः । प्रमृष्टिः प्रमार्जनम् । विता- प्रकट होता हुआ शोभा-विशेष उनके पुट्ठों को विभक्त कर रहा था। पूँछ के बाल जमीन तक लटक रहे थे। किसी प्रकार अगाड़ी और पिछाड़ी गड़ी हुई, मजबूत रस्सियों से बंध कर उन्हें नियन्त्रण में रखा गया था। वे लम्बे थे, फिर भी पिछाड़ी बाँधने से उनका एक पैर बिल्कुल फल गया था, इससे और भी उनकी लम्बाई बढ़ गई थी। उनके गले का गण्डक नामक अलंकार तिगुने-चौगुने सूत में गूँथा हुआ था। वे अपने खुजलाइट युक्त अंगों, जो दूब के रस से सांवले फेनों से रंग गये थे, जिन्हें दांतों से पकड़ कर छोड़ दिया था तथा जो फरफरा रहे थे, को चलाते रहते थे। आलस्य के साथ पूँछ टेढ़ी करते थे। एक ही खुर की टेक लेकर विश्राम करने से वे थक जाते और उनकी आधी जांघ हटाने लगती। नींद में कुछ सोच रहे थे। हूँफकर धीरे-धीरे हिनहिनाने लगते थे। खुर से पृथ्वी पर ताड़न से मुखर खुरों के अग्र-भाग से पृथ्वी पर लिखते और घास की अभिलाषा कर रहे थे।
द्वितीय उच्छ्वासः १०९ जनानलरक्ष्यमाणैरिवोपरिविततवितानैः, पुरःपूजिताभिमतदैवतैः, भूपाल- वल्लभैस्तुरङ्गैरारचितां मन्दुरां विलोकयन्, कुतूहलाक्षिप्तहृदयः किंचिदन्त- रमतिक्रान्तो हस्तवामेनात्युच्चतया निरवकाशमिवाकाशं कुर्वाणम्, महता कदलीवनेन परिवृतपर्यन्तं सर्वतो मधुकरमयीभिर्मदस्स्रुतिभिर्नदीभिरिवापत- न्तीभिरापूर्यमाणम्, आशामुखविसर्पिणा बकुलवनानामिव विकसतामामो- देन लिम्पन्तं घ्राणेन्द्रियं दूरादव्यक्तमभिधिष्ण्यागारमपश्यत् । अपृच्छच्च- ‘अत्र देवः किं करोति ?' इति । असावकथयत्—'एष खलु देवस्यौपवाह्यो बाह्यं हृदयं जात्यन्तरित आत्मा बहिश्चराः प्राणा विक्रमक्रीडासुहृद्दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिः । तस्यावस्थानमण्डपोऽयं महान् दृश्यते' नकं रक्तकम् । देवतात्र गोविन्दः आरचितां भूषिताम् । हस्तवामशब्दो भाष्यकृता वामहस्तमार्ग इत्यर्थे धृतः । बकुलेत्यादिना प्राशस्त्यमेव पोषयति । तदुक्तम्—'माल- तीमुक्तपुंनागबकुलोपमसौरभम् । दानं पिष्टाम्बुसदृशं मुञ्चञ्श्वेतं तु शीतलम् ॥' इति । श्लैष्मिका दानलक्षणम् । एवं च घर्मलक्षणे तु प्रकोपसमयेऽपि तथाविधमद- वर्णनया श्लेषप्रकृतित्वं प्रकाशयति—'श्लेष्मप्रकृतिकं श्रेष्ठं मद्रजाति तथैव च' इति च शास्त्रकृता दर्शितम् । धिष्ण्यं मण्डपम् । औपवाह्यः क्रीडा हस्ती । यस्मात्केचन संनाह्याः केचिद्भद्रजातीया उभयस्वभावा भवन्ति करिणः । अस्य च यद्यपि विक्रम- क्रीडासुहृदित्यनेन दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिरित्यनेन च सांन्नाह्यत्व- मेवोक्तम्, तथाप्यौपवाह्य इति कथनेऽद्वंद्वयेऽपि योग्यत्वाद्वद्रजातीयत्वं चास्य बिखेरी जाती हुई घासों के मत्सर से क्षुब्ध हो उठे थे। सईसों की तगड़ी डंपटान सुनकर मारे डर के उनकी पुतलियाँ दीन भाव से फिरने लगती थीं। उनके अङ्ग मानों केसर से मले गये थे अतः मानों उनके समीप सदा नीराजन अग्नि जलती हो । उनके ऊपर चंदोवे तने हुये थे। उनके सामने अभीष्ट देवता पूजे गये थे। मन्दुरा को देखकर बाण का हृदय कुतूहल से भर गया और कुछ आगे बढ़कर बायीं ओर दूर होने से अव्यक्त से हाथोसाल को देखा जो अत्यन्त ऊँचा होने से आकाश को अवकाशहीन बना रहा था। केलों के विशाल वन से वह चारों ओर से घिरा हुआ था। सब ओर से नदियों की भाँति बहती हुई मद की धारायें थीं जिन पर भौरें झूल रहे थे। उसकी गन्ध दिशाओं में इस प्रकार फैल रही थी मानों मौलसिरी के फूलने की गन्ध नाक में भर रही हो। बाण ने मेखलक से पूछा—'यहाँ महाराज क्या करते हैं ?' उसने कहा—'यह महाराज का क्रीड़ाहस्ती यथार्थनामा दर्पशात है, जिसे वे युद्ध में साथ ले जाते हैं। यह महाराज का बाहरी हृदय है, दूसरे स्वरूप में आत्मा है, बहिश्चर प्राण है। उसका यह विशाल अवस्थान मण्डप दिखाई दे रहा है।' बाण ने उससे कहा—
११० हर्षचरितम् इति । स तमवादीत्—'भद्र ! श्रूयते दर्पशातः । यद्येवमदोषो वा पश्यामि तावद्धारणेन्द्रमेव । अतोऽर्हसि मामत्र प्रापयितुम् । अतिपरवानस्मि कूतूहलेन' इति । सोऽभाषत—'भवत्वेवम् । आगच्छतु भवान् । को दोषः । पश्यतु तावद्धारणेन्द्रम्' इति । गत्वा च तं प्रदेशं दूरादेव गम्भीरगलगर्जितैर्वियति चातक- कदम्बकैर्भुवि च भवननीलकण्ठकुलैः कलकेकाकलकलमुखरमुखैः क्रियमाणाकालकोलाहलम्, विकचकदम्बसंवादिमदसुरासौरभभरित- भुवनम्, कायवन्तमिवाकालमेघकालम्, अविरलमधुबिन्दुपिङ्गल- पद्मजालकितां सरसीमिवान्यवगाढां दशां चतुर्थीमुत्सृजन्तम्, निधीयते । जात्यन्तरितो द्वितीयां जातिं हस्तिरूपां प्राप्तः । यद्येवमिति । यदि सत्यं दर्पशातोऽयमदोषो वेति । वाशब्दश्चार्थे । यदि च न दोष इत्यर्थः । यतो रसदाना- दिमयेन केनचिद् द्रष्टुं न लभ्यते । कुतूहलेन परवान्कुतूहलायितः । गत्वेत्यादौ । दूरादेव दर्पशातमपश्यदिति सम्बन्धः । गर्जितं बृंहितम् । चातकाः स्तोककाः । नीलकण्ठा मयूराः । केका मयूररुतानि । मेघकालमिति । मेघकालश्च चातककदम्बनीलकण्ठकुलकदम्बकसौरभादियुक्तः । अविरला घना ये मधुविन्दव इव मधुविन्दवो माक्षिककणास्तद्वत्पिङ्गलाणि पद्मजालकानि संजातानि यस्याम् । 'पद्मकं बिन्दुजालं स्याद्गात्रकं करिणामिति' । यथा—'पद्मस्वस्तिकसंस्थानो बिन्दु- मिश्र कचैस्तथा । स्वङ्गिताङ्कस्तुषारामः शावः शक्तिकरः करी ॥' इत्युक्तम् । अन्ये मधुबिन्दवो मकरन्दकणास्तैः पिङ्गलानीति व्याख्येयम् । महत्सरः सरसी । अत्यव- गाढामिति । परिणताम् । दशां कालावस्थाम् । चतुर्थीमिति । 'चतुर्थ्यामवगाढायां 'भद्र, दर्पशात का नाम सुना जाता है। यदि ऐसी बात है और कोई झंझट न हो तो उस गजराज को देखूँगा। मुझे वहाँ ले चलो, मैं अपने कुतूहल के वेग से लाचार हूँ।' वह बोला—'ऐसी बात है तो आइये, झंझट क्या है ? तब तक गजराज को देख लें।' उस स्थान में जाकर बाण ने दूर ही से दर्पशात को देखा । उसकी गम्भीर चिग्घाड़ से आकाश में चातक पक्षी और पृथ्वी पर गृहमयूर अव्यक्त-मधुर एवं केका की आवाज से मुखरित हो असमय में कोलाहल कर रहे थे। उसकी गम्भीर चिग्घाड़ सुनकर आकाश में चातक पक्षी मेघ की गड़गड़ाहट समझ कर कोलाहल करने लगे और पृथिवी के गृहमयूर अपनी केका- वाणी द्वारा असमय में मुखरित हो उठे। खिले हुए कदम्ब के समान अपने मद की सुरासौरभ से उसने दिशाओं को भर दिया था। असमय में वर्षाकाल मानो शरीरधारी हो गया था। पूर्ण मधु-बिन्दुओं के कण पिङ्गल वर्ण. से पद्म-समूहों से भरी हुई सरसी की भांति सघन मधुमाक्षिकों की तरह पिङ्गल वर्ण के पद्मकः नाम के बूंदों से युक्त परिपक्व चतुर्थी अवस्था को छोड़ रहा था।
अनवरतमवतंसशङ्खैरामन्द्रकर्णतालदुन्दुभिध्वनिभिः पञ्चमीप्रवेशमङ्गला- रम्भमिव सूचयन्तम्, अविरतचलनचित्रत्रिपदोललितलास्यलयैर्दोलाय- मानदीर्घदेहाभोगवतया मेदिनीविदलनभयेन भारमिव लघयन्तम्, दिग्भित्तितटेषु कायकिव कण्डूयमानम्, आहवायोदस्तहस्ततया दिग्द्वार- णानिवाह्वयमानम्, ब्रह्मस्तम्भमिव स्थूलनिशितदन्तेन करपत्रेण पाटयन्तम्, अमान्तं भुवनाभ्यन्तरे बहिरिव निर्गन्तुमीहमानम्; सर्वतः- सरसकिसलयलतालासिभिर्लेशिकैश्चिरपरिचयोपचितैर्वनेरिव विक्षिप्तं, सशैवलबिसविसरशबलसलिलैः सरोभिरिव चाधोरणैराधीयमाननिदाघ- समयसमुचितोपचारानन्दम्, अपि च प्रतिगजदानपवनादानदूरोत्क्षिप्ते- नानेकसमरविजयगणनालेखाभिरिव वलिवलयराजिभिस्तनीयसीभिस्तर- ङ्गितोदरेणातिस्थवीयसा हस्तार्गलदण्डे नार्गलयन्तमिव सकलं सकुलशैल- समुद्रद्वीपकाननं ककुभां चक्रवालम्, एकं करान्तरापितेनोत्पलाशेन लेखाबिन्दुभिराचितः' इत्युक्तम् । शङ्खैः । शङ्खशब्दैरित्यर्थः । कर्णेत्यादि । कर्णौ च दुन्दुभिश्वनितौ । 'कर्णौ च करिणः कार्यंकारिणो सत्प्रशंसिनौ' इति । पञ्चमो दशा त्रिपदी । एकपदोत्क्षेपे पादत्रयावस्थितिः । लयो लीलाः । आहवः संग्रामः । ब्रह्मस्तम्भो ब्रह्माण्डम् । करपत्रं क्रकचं स्थूलनिशितदन्तं भवति । तच्च भेदयति स्तम्भम् । अमान्तमवर्तमानम् । लेशिकैर्घासिकैः । आधोरणैर्गजारोहैः । वलयाकारा वलिर्वलिवलयम् । अर्गलयन्तं सनाटकं कुर्वाणम् । कुमुदवनानीत्युत्प्रेक्षा । दन्तयो- र्वर्णप्राशस्त्यमाह—'पयःकुमुदकुन्दाभौ केतकीकुमुदद्युती । मृगाङ्ककिरणालोको कीर्ति- निरन्तर कानों के शंख गम्भीर कर्णताल तथा दुन्दुभि के समान आवाज द्वारा मानों वह पांचवीं स्वास्थ्यदशा के प्रवेश का मंगळारम्भ सूचित कर रहा था। अपने तीन पैरों पर खड़ा होकर सुन्दर नृत्य की मुद्रा में स्थूल शरीर को निरन्तर लम्बित कर रहा था, मानों पृथिवी के धँस जाने के भय से बोझ को हल्का कर रहा हो। मानों वह (झूमता हुआ) दिशाओं की भीतों में अपनी देह खुजला रहा था। मानों अपनी सूँड़ उठा-उठाकर दिग्गजो को युद्ध के लिए गुहार रहा था। अपने मोटे-मोटे और तेज दाँतों के आरे से मानों ब्रह्माण्ड को फाड़ रहा था । वह संसार में न अटने के कारण मानो बाहर निकलना चाहता था। मेघों की भाँति बहुत दिनों के परिचित घसियारे सरस पत्तों और लताओं से उसे नचा रहे थे, तथा सरोवरों की भाँति महावत सेवार सहित कमलनाल के जलों को छिड़क कर ग्रीष्म-काल के समुचित उपचार का आनन्द उसे दे रहे थे। वह अपनी सूँड के अर्गलादण्ड को जिसमें मानो अनेक समरों की विजय की गणना-लेख हों, ऐसे महीन चारों ओर की लकीरों से मध्यभाग में युक्त था, प्रति-
११२ हर्षचरितम् कदलीदण्डेनान्तर्गतशीकरसिच्यमानमूलम्, मुक्तपल्लवमिवापरं लीलाव- लम्बिना मृणालजालकेन समररसोच्चरोमाञ्चकण्टकितमिव दन्तकाण्ड- मुद्वहन्तम्, विसर्पन्त्या च दन्तकाण्डयुगलस्य कान्त्या सरःक्रीडास्वा- दितानि कुमुदवनानीव बहुधा वमन्तम्, निजयशोराशिवमिव दिशाम- र्पयन्तम्, कुकरिकीटपाटनदुर्विदग्धान् सिंहानिवोपहसन्तम्, कल्पद्रुम- दुकूलमुखपटमिव चात्मनः कलयन्तम्, हस्तकाण्डदण्डोद्धरणलीलासु च लक्ष्यमाणेन रक्तांशुकसुकुमारतरेण तालुना कवलितानि रक्तपद्म- वनानीव वर्षन्तम्, अभिनवकिसलयराशीनिवोद्गिरन्तम्, कमलकवलगीतं मधुरसमिव स्वभावपिङ्गलेन वमन्तं चक्षुषां, चूतचम्पकलवलीलवङ्ग- क्कोकोलवन्त्येलालतामिश्रितानि सहसकाराणि कर्पूरपूरितानि पारिजातक- कल्याणकारको ।।' इत्युक्तम् । रक्तांशुकेति । उक्तं च—'रक्तोष्ठतालुरसनम्' इति । स्वभावपिङ्गलेनेति । उक्तं च 'शशिसूर्यसमामासे कलविङ्काक्षसन्निभे । प्रसन्नमधु- पिङ्गे च स्थिरे चामीलने तथा ॥ अपरिस्राविणी चैव कुशाग्निनिभभास्वरे । नेत्रे शस्ते समे स्निग्धे दीर्घे चाविलपक्ष्मणो ।।' इति । चूतेत्यादिना प्रशस्तत्वमाह । यदाह—'उभयस्रुतिरप्येष विवर्णो हर्षवर्जितः । यदि स्यादपगन्धश्च तदासो न द्वन्द्वी हाथी के मद-जल की वायु ग्रहण करके दूर ऊपरं उठाया मानों कुल पर्वतों, समुद्रों, द्वीपों और जंगलों सहित दिशाओं के चक्रवाल को अर्गलित कर रहा हो । उसने अपने दांत के बीच सूँड़ से कदली का पत्ररहित दण्ड रख लिया था यथा उसके पानी से दन्तमूल सिंच रहा था मानों उसका पल्लवरहित दूसरा दन्तकाण्ड लीला से लटकाये मृणालों से प्रतीत होता था कि समर के अनुराग से उत्पन्न रोमाञ्च के कंटक से युद्ध हो, इस प्रकार वह अपने दोनों दांतों का धारण कर रहा था । उसके दोनों दाँतों की कान्ति आगे की ओर फैल रही थी, मानों वह जलक्रीडा के समय चखे हुए कुमुदवनों को अनेक प्रकार से वमन कर रहा था, अपनी यशो- राशि को दिशाओं के लिए (दाँत की किरणों के रूप में) अर्पित कर रहा था, उन शेरों पर हँस रहा था जो क्षुद्र गजों को विदीर्ण करके मतवाले बन जाते हैं, या वह कल्पवृक्ष के दुकूल का अपना मुखपट (रुमाल) बना रहा था। जब वह अपनी सूँड़ लीला से उठाया करता तो उसके मुख का रक्तांशुक के समान सुकुमार तालुभाग दिखाई देने लगता था, वह मानों गटके हुए लाल कमलों को बरसाने लगा हो, या नये-नये लाल पत्तों को उगल रहा हो । वह अपनी स्वाभाविक पीली आँखों से मानो कमलों के ग्रास के साथ पिये मधुरस का उदिगरण कर रहा था। सहकार और कपूर से युक्त पारिजात के वन का उसने उपभोग किया जिनमें आम, चंपक, लवली, लवंग, इलायची के भी आस्वाद लिये थे, मानों इसी से दोनों कपोलों से बहती
वनानीवोपभुक्तानि पुनःपुन करटाभ्यां बहलमदामोद्व्याजेन विसृज- न्तम्, अहर्निशं विभ्रमकृतहस्तस्थितिभिरर्धखण्डितपुण्ड्रेक्षुकाण्डकण्डूयन- लिखितैरल कुलवाचालितैर्दानपट्टकैर्लभमानमिव सर्वकाननानि करिप- तीनाम्, अविरलोदविन्दुस्यन्दिना हिमशिलाशकलमयेन विभ्रमनक्षत्र- मालागुणेन शिशिरीक्रियमाणम्, सकलवारणेन्द्राधिपत्यपट्टबन्धबन्धुर- मिवोच्चैस्तरां शिरो दधानम्, मुहुर्मुहुः स्थगितापावृतदिङ्मुखाम्यां कर्णता- लतालवृन्ताभ्यां वीजयन्तमिव भर्तृभक्त्या दन्तपर्यङ्किकास्थितां राज- लक्ष्मीम्, आयतवंशक्रमांगतेन गजाधिपत्यचिह्नेन चामरेणेव चलता बाल- सतां मतः ॥' इति करटाभ्यां गण्डाम्याम् । अर्धेत्यादिनेक्षुकाण्डकस्य लेखनीसा- दृश्यमाह । लिखितैः कृतलेखैरप्यलिकुलेषु सत्सु वाचालितशब्दयोगो येषामित्यने- नालिकुलस्य लिप्यक्षररूपतां ध्वनयति । लिप्यक्षरेषु च सत्सु पाठ्यमानेषु वाचा- लता । दानपट्टकलिखितैः किंचिद्धि लभ्यते । अक्षरपाटिकैश्च तेषां हस्तस्थितिं क्रियते । दानि च वाच्यन्ते । यद्वा स्वहस्तेनाक्षरकरणं हस्तस्थितिः । हिमशिला वातवज्जीभूतं हिमम् । केचित्तु 'हिमानि हिमशकलानि चन्द्रकान्ताः' इत्याहुः । हिमस्य च तदा वर्णनानुचितत्वात् । पर्वतेभ्यो हिमानयनं सुलभमेवेति पूर्वोक्तमेद श्रेष्ठम् । यतश्चन्द्रकान्तानां दिवा स्रुतिर्न भवतीति । नक्षत्रमाला हस्त्याभरणभेदः । उच्चैस्तरामिति । उच्चं हि शिरः करिणः शस्यते । यदुक्तम्— 'समं महच्च पूर्णं च नातिस्तब्धोच्चमस्तकम् । नावाग्रं नातिपृथुलं वितानावग्रहं मृदु ॥' इति । दन्तावेव हुई मदधारा के व्याज से वह उन्हीं की गन्ध को फैला रहा था† । दिनरात वह अपने हाथ से तैयार किये गये, अर्ध-खण्डित ईख की लेखनी से लिखे गये एवं भौरों द्वारा पढ़े गये दानपट्टों से करपतियों के सभी जंगलों को मानो प्राप्त कर रहा था। निरन्तर पानी टपकाने वाले, चन्द्रकान्त के टुकड़ों से बने नक्षत्रमाला नामक आभूषण में वह ठंडा हो रहा था। वह ऊँचा मस्तक, जो मानों सभी वारणेन्द्रों के आधिपत्य के पट्टबन्ध के कारण निम्नोन्नत था, धारण कर रहा था। बार-बार उसके कानों के पंखे चलते रहते थे जिससे दिशायें ढकती और खुलती रहती थीं। इस प्रकार वह अपने स्वामी की भक्ति से दाँत से पलंग पर बैठी हुई राजलक्ष्मी को पंखा झल रहा था। वह अपनी हिलती हुई पूँछ से, जो † उस समय सहकार, कपूर, कक्ककोल, लवंग, पारिजातक आदि सुगन्धद्रव्य थे जिनसे मुखवास बनाया जाता था, उसी की गन्ध दर्पशात के मदजल में थी, क्योंकि जंगलों में उसने भी इनके वृक्षों का उपयोग किया था। ८ ह०
११४ हर्षचरितम् धिना विराजमानम्, स्वच्छशिशिरशीकरच्छलेन दिग्विजयपीताः सरित इव पुनःपुनर्मुखेन मुञ्चन्तम्, क्षणमवधानदाननिःस्पन्दीकृतसक- लावयवानामन्यद्विरदडिण्डिमाकर्णनाङ्गवलनानामन्ते दीर्घफूत्कारैः परिभव- दुःखमिवावेदयन्तम्, अलब्धयुद्धमिवात्मानमनुशोचन्तम्, आरोहाधिरूढि- परिभवेन लज्जमानमिवाङ्गुलीलिखितमहीतलं, मदं मुञ्चन्तम्, अवज्ञा- गृहीतमुक्तकवलकुपितारोहाटनानुरोधेन मदन्द्रीनिमीलितनेत्रत्रिभागस्, कथं कथमपि मन्दमन्दमनादरादाददानं कवलान्, अर्धजग्धतमालपल्लवस्स्रु- तश्यामलरसेन प्रभूततया मदप्रवाहमिव मुखेनाप्युत्सृजन्तम्, 'चलन्तमिव तदवस्थानसमुचितत्वात् । पर्यङ्किका च दन्तमयः पर्यङ्कः आस्त इति श्लेषः । आयत- वंशः, वक्रवंशः, शरवंशः' बालवंशश्चेति चत्वारो वंशाः । तेषु बालवंश आयत एव शास्त्रकृतामभिप्रेतः । तथा च-'यावत्पूरितपार्श्वस्थ वंशश्चापलताकृतिः । शुमो ज्ञेयो गजेन्द्राणामायतः कुरुते सुखम् ॥' इति तैरुक्तम् । आयताद्वंशात्तत्क्रमेण गोपु- च्छवदायत इति विग्रहः । समानाहों हि वालधिः शोकं करोति । यदुक्तम्- 'वकं स्थूलं च ह्रस्वं च पुच्छं कचविवर्जितम् । समानाहं हिं नागस्य भर्तुः शोककरं स्मृतम् ॥' इति । वंशं पृष्ठास्थि, कुलं च । क्रम आनुपूर्वी; पारम्पयं च । वालधिः पुच्छम् । लज्जमानमिति । एष लज्जते स भूमि लिखति, दर्प चोज्झति । अंगुली करिकराग्रावयवः, करशाखा च । तन्द्रो आलस्यम्, गाढनिद्रा वा । चलन्तमिव- उसके आयत पृष्ठवंश से निकली हुई, उसके गजाधिपत्य का चिह्न एवं चामर के समान थी, शोभित हो रहा था। अधिपति है। वह अपने मुँह से ठण्डे और सफेद जल के फुहारे बार-बार फेंकता रहता था, मानों दिग्विजय के समय सोखी हुई नदियों को उगल रहा हो । क्षण भर ध्यान देने से सभी अङ्गों को निश्चल कर देने वाले, दूसरे हाथियों के डिण्डिम घोष ( यशोगान ) के श्रवण से उत्पन्न अङ्गों के चाञ्चल्यरहित हो जाने से लम्बे फूत्कारों द्वारा अपने परिभव का कष्ट मानों आवेदन कर रहा था। वह पश्चात्ताप अनुभव करता कि उसे युद्ध करने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। दूसरे उसकी पीठ पर चढ़ते तो वह अपना परिभव महसूस करके अपने नखों से जमीन पर कुछ लिखने लगता। मद का त्याग कर रहा था। उसने कौर लेकर भी अवज्ञा से छोड़ दिया, इसपर महावत ने कुपित होकर खाने के लिए अनुरोध किया तो उसने मद से अलसा कर आँखें बन्द कर लीं। बहुत प्रयत्न करने पर रह-रहकर अनादर से कौर ले लेता था। आधा खाये हुए तमाल-पत्रों से चूता हुआ सांवला पानी इतना अधिक हो गया था, मानों वह मुख से भी मद-प्रवाह को छोड़ रहा था। दर्प से वह मानो काँप रहा था, शौर्य से जीवित था, शौर्य १. दलन्त ।
द्वितीय उच्छ्वासः ११५ दर्पेण, श्वसन्तमिव शौर्येण, मूर्च्छन्तमिव मदेन, त्रुट्यन्तमिव तारुण्येन, द्रवन्तमिव दानेन, वल्गन्तमिव बलेन, माद्यन्तमिव मानेन, उद्यन्त- मिवोत्साहेन, ताम्यन्तमिव तेजसा, लिम्पन्तमिव लावण्येन, सिञ्चन्त- मिव सौभाग्येन, स्निग्धं नखेषु, परुषं रोमविषये, गुरुं मुखे, सच्छिष्यं विनये, मृदुं शिरसि, दृढं परिचयेषु, ह्रस्वं स्कन्धबन्धे, दीर्घमायुषि, दरिद्रमुदरे, सततप्रवृत्तं दाने, बलभद्रं मदलीलासु, कुलकलत्रमायत्त- तासु, जिनं क्षमासु, वह्निवर्षं क्रोधमोक्षेषु, गरुडं नागोद्धृतिषु, नारदं कलहकुतूहलेषु, शुष्काशानिपातमवस्कन्देषु, मकरं वाहिनीक्षोभेषु, आशी- विषं दशनकर्मसु, वरुणं हस्तपाशाकृष्टिषु, यमवागुरामरातिसंवेष्टनेषु, त्यादि दर्पाधिकरणसमुचितक्रियाप्रतिपादनसामिप्रायं व्याख्येयम् । स्निग्धमिति । उक्तं च—'नखाः स्निग्धाः सिताः शस्ताः' इति । परुषं निष्कृपम् । यश्च स्निग्धः प्रीतिमान्स कथं परुषः प्रीतिशून्यो भवतीति विरोधः । एवं गुरुर्विस्तीर्णः, आचा- र्यश्च । विनय इति । उक्तं च—'विनये मुनिभिस्तुल्याः क्रुद्धा नागाश्च राक्षसाः । निस्त्रिंशस्याधिकत्वाच्च शस्त्रं नागा महीपतेः ॥' इति । स्कन्धबन्धे ग्रीवामूले । दरिद्रः कृशः दुर्गतश्च । दानं मदवारि वितरणं च । बलभद्रो हलधरः । मदो दानम्, सुराकृतश्च । नागाः करिणः, सर्पाश्च । कलहो रणोऽपि । अविदितशत्रुसैन्ये पातोऽवस्कन्दः । मकरं कूर्मम् । वाहिनी सेना नदी च । दशनकर्म दन्तव्यापारः, दशनरूपा च क्रिया । हस्त एव पाशः, प्रशस्तहस्तो हस्तपाश इति वा । हस्ते च पाशः । वागुरा जालम् । परिणतिषु दन्तविदारणकर्मसु । कालं यमम् । शुभाशुभादि- से श्वास ले रहा था, मद से मूर्च्छित हो रहा था, जवानी से उसके अङ्ग-अङ्ग टूट रहे थे, दान- जल के रूप में वह ढल रहा था, बल से मचल रहा था, मान के कारण अपने मद को और भी प्रकट कर रहा था, उत्साह से उठ रहा था, तेज से तमतमा रहा था, वह अपने भड़कीले चेहरे से सबको लिंप रहा था, सौभाग्य से सींच रहा था, स्निग्धता उसके नखों में थी, परुषता उसके रोमों में, गुरुता मुख में, सच्छिष्यता विनय में, मृदुता सिर में, दृढ़ता परिचय में, ह्रस्वता ग्रीवामूल में, लम्बी आयु, पेट छोटा और दान में हमेशा उसकी प्रवृत्ति थी, वह मद- लीलाओं में बलभद्र, अधीनता स्वीकार करने में कुलांगना, क्षमा करने में जिन, क्रोध और त्याग करने में अग्नि और वर्षा, नागों (हाथियों, सर्पों) को उठा लेने में गरुड़, झगड़े के कुतू- हल में नारद, आक्रमण में शुष्क वज्रपात, वाहिनी (सेना या नदी)को क्षुभित करने में मकर, काटने में सर्प, सूंड से पकड़ कर खींच लेने में वरुण, शत्रुओं को घेरने में यमपाश, दांतों का
११६ | हर्षचरितम्
कालं परिणतिषु, राहुं तीक्ष्णकरग्रहणेषु, लोहिताङ्गं वक्रचारेषु, अलातचक्रं मण्डल भ्रान्तिविज्ञानेषु, मनोरथसंपादकं चिन्तामणिपर्वतं विक्रमस्य, दन्तमुक्ताशैलस्तम्भनिवासप्रासादमभिमानस्य, घण्टाचामरमण्डनमनो- हरमिच्छासंचरणविमानं मनस्वितायाः, मदधारादुर्दिनान्धकारं गन्धो- दकधारागृहं क्रोधस्य, सकाञ्चनप्रतिमं महानिकेतनमहंकारस्य, सगण्ड- शैलप्रस्रवणं क्रीडापर्वतमवलेपस्य, सदन्ततोरणं वज्रमन्दिरं दर्पस्य, उच्चकुम्भकूटाट्टालकविकटं संचारिगिरिदुर्गं राज्यस्य, कृतानेकबाणविवर- सहस्रं लोहप्राकारं पृथिव्याः, शिलीमुखशतझांकारितं पारिजात-
कर्मविपाकेषु च कालमहरादिरूपम् । तीक्ष्णं कृत्वा करेण हस्तेन ग्रहणम्, रविश्च तीक्ष्णकरः । लोहिताङ्गोऽङ्गारकः । वक्रं कुटिलम् । पश्चाच्च मण्डलाकृत्या भ्रान्ते- र्भ्रमणस्य विज्ञानानि कौशलातिशयगतिः । गोमूत्रिकामण्डले त्रिविधा हि गतिः । तत्रालातचक्रमुलमुकचक्रं भ्रमणं करोति । मनोरथसम्पादकमिति । शेषे षष्ठीसमासः । 'कर्मण्यण्' इति वाऽणिक्कृते स्वार्थे कः । दन्तौ मुक्ताशैलस्य श्वेतपाषाणस्य स्तम्भा- विव यस्य । अन्यत्र—दन्तस्य मुक्ताशैलानां च स्तम्भा यत्र । प्रतिमा दन्तकोशः, देवताकृतिश्च । महानिकेतनं साधुदेवगृहम् । गण्डावेव शैलौ तत्र प्रस्रवणं दाननि- र्यासः । सह तेन वर्तते निर्झरश्च । 'महतो मुक्तपाषाणान्गण्डशैलान्प्रचक्षते ।' संचारी जङ्गमः । यदाह कौटिल्यः—'हस्तिनो हि जङ्गमं दुर्गम्' इति । कृतान्येकानि बाणविवरसहस्राणि यस्य तम् । प्राकारेषु बाणानुत्स्रष्टुं विवरसहस्राणि क्रियन्ते, य इन्द्रकोशा इति चाणक्यादिषु प्रसिद्धाः । भून्न्दनो राजा । 'देवोद्यानं च
प्रहार करने में काल, सूंड से प्रचण्ड आघात करने में (कर से ग्रहण में या सूर्य के ग्रहण करने में) राहु, टेढ़े चाल में मंगलग्रह और मण्डलाकार भ्रमण करने में अलातचक्र था। वह विक्रम का चिन्तामणि पर्वत था जो सब प्रकार के मनोरथ को सम्पन्न करने वाला था। वह अभिमान का निवासभवन था जिसमें मुक्ताशैल के दो खम्भे दाँतों के रूप में लगे थे। वह मनस्विता का स्वेच्छाचारी विमान था जो घण्टा और चैंवर के आभूषणों से सुसज्जित था। क्रोध का वह सुगन्धित जल से भरा हुआ धारा गृह था जिससे मद की धारा के हमेशा बरसते रहने से अन्धकार छाया हुआ था। वह अहंकार का महानिकेतन था जिसमें सोने की मढ़ी हुई प्रतिमाएँ थी। वह अवलेप का क्रीड़ापर्वत था, उसके गण्डस्थल से झरने के रूप में मद की धारा झरती रहती थी। दर्प का वह वज्रमन्दिर था जिसमें दाँतों के तोरण लगे हुये थे। वह राज्य का संचरणशील गिरिदुर्ग था, जिससे कुम्भ के रूप में ऊपरी भाग में अट्टालक था। वह पृथ्वी की लौह दीवार था जिसमें बाणों की मार से हजारों छिद्र बने
द्वितीय उच्छ्वासः ११७ पादपं भूनन्दनस्य, तथा च संगीतगृहं कर्णतालताण्डवानाम्, आपानमण्डपं मधुपमण्डलानाम्, अन्तःपुरं शृङ्गाराभरणानाम्, मदनोत्सवं मदलीला- लास्यानाम्, अक्षुण्णप्रदोषं नक्षत्रमालामण्डलानाम्, १अकालप्रावृट्कालं मदमहानदीपूरप्लवानाम्, अलीकशरत्समयं सप्तच्छदवनपरिमलानाम्, अपूर्वहिमागमं शीकरनीहाराणाम्, मिथ्याजलधरं गर्जिताडम्बराणां दर्पशातमपश्यत् । आसीच्चास्य चेतसि—'नूनमस्य, निर्माणे गिरयो ग्राहिताः परमाणु- ताम् । कुतोऽन्यथा गौरवमिदम् । आश्चर्यमेतत् । विन्ध्यस्य दन्तावादिव- राहस्य करः' इति विस्मयमानमेवं दौवारिकोऽब्रवीत्— 'पश्य,— मिथ्यैवालिखितां मनोरथशतैर्निःशेषनष्टां प्रियं चिन्तासाधनकल्पनाकुलधियां भूयो वने विद्विषाम् । नन्दनम्' । कर्णतालानां ताण्डवानीव ताण्डवानि । अन्यत्र,—लाभप्रधानानि ताण्ड- वानि । मधुपा भ्रमराः, विटाश्च । शृङ्गारः सिन्दूरादिदानम्, रसभेदश्च । अक्षुण्णः परिपूर्णः, अभ्रादिनानावृतः अपूर्वो वा । ग्राहिताः प्रापिताः । मिथ्यैवेति । तस्या निःशेषनष्टत्वात्पुनरभावप्रसङ्गात्निःशेषे- त्याद्यभिप्रायेणाह—मनोरथशतैरिति । तस्यां व्यापाररहितत्वाच्छून्यमनस्कत्वा- थे । पृथ्वी के नन्दनवन का वह पारिजात-वृक्ष था जिसमें सैकड़ों भौंरे झंकार रहे थे । कानों के संचालन रूप नृत्य का यह संगीतगृह था, भौरों का आपानमण्डप था, शृङ्गार और आभरणों का अन्तःपुर था, मदलीला के नृत्य का मदनोत्सव था, नक्षत्रमाला ( एक अलंकार ) का वह कभी नष्ट न होने वाला प्रदोष था, मद की महानदी के प्रवाह का वह असामयिक वर्षाकाल था, सप्तच्छदवन के सौरभो का मिथ्या शरत्काल था । जलकण के शीकरों का वह अपूर्व समागम था । गरज-तरज के आडम्बर का वह मिथ्या मेघ था । बाण ने मन में सोचा—'निश्चय ही दर्पशात के बनाने में पर्वतों के परमाणु लगे होंगे, नहीं तो इसमें इतनी गुरुता कहाँ से आती ? आश्चर्य होता है । यह हाथी क्या है। दाँतों वाला विन्ध्य पर्वत है । अथवा सूँड़ से युक्त भगवान् आदिवराह है ।' इस तरह आश्चर्य में पड़े हुए बाण से दौवारिक ने कहा—'देखो— 'पराजित होकर वन में भागे शत्रु राजा अपनी समूल नष्ट धन-सम्पत्ति को फिर १. अकाण्डप्रावृट् ।
आयाततः कथमप्ययं स्मृतिपथं शून्येभवच्चेतसां नागेन्द्रः सहते न मानसगतानाशागजेन्द्रानपि ॥ तदेहि । पुनरप्येनं द्रक्ष्यसि । पश्य तावद्देवम्' इत्यभिधीयमानश्च तेन मदजलपङ्किलकपोलपट्टपतितां मत्तामिव मदपरिमलेन मुकुलितां कथमपि तस्माद् दृष्टिमाकृष्य तेनैव दौवारिकेणोपदिश्यमानवर्त्मा समतिक्रम्य भूपालकुलसहस्रसंकुलानि त्रीणि कक्षान्तराणि चतुर्थे मुक्तास्थानमण्ड- पस्य पुरस्तादजिरे स्थितम्, दूरादूर्ध्वस्थितेन प्रांशुना कर्णिकारगौरेण व्यायामव्यायतवपुषा शस्त्रिणा मौलेन शरीरपरिवारलोकेन पंक्ति- स्थितेन कार्तस्वरस्तम्भमण्डलेनेव परिवृतम्, आसन्नोपविष्टविशिष्टेष्ट-
देवाह—सहत इत्यादि । मानसं मनः, सरोभेदोऽपि । आशाः दिशः, अभिलाषोऽपि । देवमिति इत्यादौ । चक्रवर्तिनं हर्षमद्राक्षीदिति संबन्धः । मदजलेन पङ्किले कपोल- पट्टे पतिताम् । मत्तामिवेति । मत्तश्च पतति, मुकुलितदृष्टिश्च भवति, गतिवैकल्या- दन्येन कृष्यते । भोजनं मोक्तव्यम् । भुक्ते सत्यास्थानं लोकदर्शनं तदर्थं मण्डप- स्तस्य । ऊर्ध्वस्थितेत्यादि साधारणम् । प्रांशुन्नोन्नतेन, अन्यत्र,—प्रकृष्टा अंशवो यस्य तेन । कर्णिकारमारग्वधपुष्पम् । व्यायामः श्रमः । व्यायतं विभक्तावयवम्, विशे- षेण दीर्घं च । शस्त्रिणा सायुधेन, स्तम्भा अपि शस्त्रेण वध्यन्ते । मौलभृतकश्रेणि- मित्रामित्राटविकभेदेन षट्प्रकाराः सहाया भवन्ति । अन्यत्र—मूले बुध्ने भवं मौलम् । बुध्नप्रतिष्ठमित्यर्थः । पंक्तिस्थितेनेति साधारणम् । कातंस्र्वरं सुवर्णम्, यस्योद्घृष्यमाणस्य सतः कुंकुमस्येव रागो जायते; सौगन्ध्यं च तद्धरिचन्दनम् ।
से प्राप्त करने के सैकड़ों मनोरथों की चिन्तापूर्ण कल्पना करने लगते हैं, पर किसी प्रकार जब उन्हें दर्पशात का स्मरण हो जाता है तब अत्यन्त निरास हो जाते हैं। इस प्रकार यह गजराज मन के आशारूपी गजेन्द्रों को भी सह नहीं पाता।' तो चलो, फिर इसे देखना। तब तक महाराज के दर्शन करो। दौवारिक के इस प्रकार कहने पर बाण ने दर्पशात के मदजल से पंकिल गण्डस्थल पर पड़ी हुई मतवाली-सी तथा मद के सौरभ से मूंदी हुई अपनी दृष्टि को किसी प्रकार फेर कर उसी दौवारिक द्वारा मार्ग बताये जाने पर चलकर हजारों राजाओं से भरी तीन ड्योढ़ियों को पार करके चौथी में चक्रवर्ती महाराज हर्ष को देखा। वे मुक्तास्थानमण्डप के सामने आंगन में बैठे हुए थे। दूर पर खड़े, प्रांशु (लम्बे, पक्ष में उत्कृष्ट किरणों वाले) कर्णिकार की भांति और व्यायाम से विभक्त शरीर वाले, शस्त्रधारी मौल (एक प्रकार के सहायक) अङ्गरक्षक लोग पंक्ति में खड़े सुवर्णस्तम्भ के मण्डल की भांति उनके चारों ओर विद्यमान थे। उनके समीप विशिष्ट प्रेमी जन बैठे थे।
द्वितीय उच्छ्वासः ११९ लोकम्, हरिचन्दनरसप्रक्षालिते तुषारशीकरशीतलतले दन्तपाण्डुरपादे शशिमय इव मुक्ताशैलशिलापट्टशयने समुपविष्टम्, शयनीयपर्यन्तविन्यस्ते समर्पितसकलविग्रहभारं भुजे, दिङ्मुखविसर्पिणि देहप्रभाविताने वितत- मणिमयूखे घर्मसमयसुभगे सरसीव मृदुमृणालजालजटिलजले सराजकं रम- माणम्, तेजसः परमाणुभिरिव केवलैर्निर्मितम्, अनिच्छन्तमपि बलदा- रोपयितुमिव सिंहासनम्, सर्वावयवेषु सर्वलक्षणैर्गृहीतम्, गृहीतब्रह्मचर्य- मालिङ्गितं राजलक्ष्म्या, प्रतिपन्नासिधाराधारणव्रतमविसंवादिनं राजर्षिम्, शशिमय इति वक्ष्यमाणाभिप्रायेण । तुषारेत्यादिना शीतत्वममुष्य दर्शयति । दन्ते तद्वच्च पाण्डुरे पादे । रश्मयोऽपि पादाः । मुक्तेत्यादिना शुक्लतयापि शशिमय इवेत्येतदेव पोषयति । विग्रहः कायः, रणश्च । घर्मेत्यादि । मणीनां स्वभावात एव शीतत्वात्तदीया मयूखा अपि ह्लादयन्ति । यो हि बलवानारोप्यते स सर्वाङ्गेषु गृह्यते । गृहीतब्रह्मचर्यमिति । स्वदारसंतुष्ट ऋतुकालगामी । 'गृहस्थोचितव्यापारो ब्रह्मचार्येव' इति श्रुतेः । यत्त्वेवमनुश्रूयते—'यावन्मया न सकला जिता भूमिस्ता- वन्मे ब्रह्मचर्यम्' इति श्रीहर्षः प्रतिज्ञातवान् । द्वादशभिश्च वर्षेर्जित्वा तां महिषीम- ब्रवीत्—'प्रतिज्ञा मे निर्व्यूढा' इति । ततो रोषात् 'अहमपि द्वादशवर्षं ब्रह्मचर्यं चरामि' इति सा प्रतिज्ञामकरोत् । इति ब्रह्मचर्येणाज्ञाकालोऽतिवाहितः । यश्च गृहीतब्रह्मचर्यः स कथं योषितालिङ्ग्यत इति विरोधः । असिधारा खड्गधारा, व्रतविशेषश्च । यत्र स्त्रीपुंसावकपटौ ब्रह्मचर्येण तिष्ठतः । यश्च प्रतिपन्नेषु विश्वा- सितेषु खड्गधारां पातयति स कस्मान्न विसंवदते; नान्यथा भवति कथं च राजर्षि- रसावुच्यत इति विरोधः । यश्च राजर्षिरुत्तममुनिर्गृहीतासिधारो ब्रह्मचारी च मुक्ताशैल की शिलाओं से निर्मित पट्टशयन पर, जो हरिचन्दन के रस से धुला हुआ, हिम के फुहारों से ठंडा, हाथीदांत के उज्ज्वल गोड़ों वाला एवं मानों चन्द्रमा को गढ़कर बना हुआ था, विराजमान थे । शयन के सिरे की ओर टिकी हुई भुजा पर वे सारे शरीर का भार डाले थे। उनके शरीर का प्रभा-वितान एवं मणियों का किरण जाल दिशाओं में फैल रहा था, मानों वे कोमल मृणालों से भरे तालाब में ग्रीष्म के समय उन राजाओं के साथ स्नान का आनन्द ले रहे थे, मानों केवल तेज के परमाणुओं से उनका निर्माण हुआ था। ऐसा लगता था कि उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें सिंहासन पर बैठने के लिए बाध्य किया गया था । उनके समस्त अंगों में सब के सब लक्षण दिखाई दे रहे थे । ब्रह्मचर्य ग्रहण करके भी राजलक्ष्मी से आलिङ्गित थे ।† † हर्ष ने राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मैं सम्पूर्ण भूमि को दिग्विजय न कर लूँगा तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा ।
१२० हर्षचरितम् विषमराजमार्गविनिहितपदस्खलनभियेव सुलग्नं धर्मे, सकलभूपालपरि- त्यक्तेन भीतेनेव लब्धवाचा सर्वात्मना सत्येन सेव्यमानम्, आसन्नवार- विलासिनीप्रतियातनाभिश्चरणनखपातिनीभिर्दिग्भिरिव दशभिर्विग्रहावर्जि- ताभिः प्रणम्यमानम्, दीर्घैर्दिगन्तपातिभिर्दृष्टिपातैर्लोकपालानां कृताकृतमिव प्रत्यवेक्षमाणम्, मणिपादपीठपृष्ठप्रतिष्ठितकरेणोपरिगमनाभ्यनुज्ञां मृग्य- माणमिव दिवसकरेण, भूषणप्रभासमुत्सारणबद्धपर्यन्तमण्डलेन प्रद- क्षिणीक्रियमाणमिव¹ दिवसेन, अप्रणमद्भिर्गिरिभिरपि² दूयमानं, शौर्यो- ष्मणा फेनायमानमिव चन्दनधवलं लावण्यजलधिमुद्वहन्तमेकराज्यो- र्जित्येन, निजप्रतिबिम्बान्यपि नृपचक्रचूडामणिधृतान्यसहमानमिव दर्पदुःखासिकया चामरानिलनिभेन बहुधेव श्वसन्तीं राजलक्ष्मीं दधानम्, स कयाचिदालिङ्गयेत । विषमोऽशक्यीनुष्ठानो नतोन्नतरूपः । मार्गो व्यवहारः, पन्थाश्च । विषमे पथि च स्खलति येन क्वचित्सुलग्नेन भूयते । लब्धवाचेति । सत्यस्य वागेवाश्रयणीयश्च । सर्वैस्त्यक्तः सम्भीतः संस्त्वां, त्यजामीति वाचं लब्ध्वान्यं सेवते, वारविलासिनी शरीरोपचारचतुरा मुख्यललनाप्रतिविम्बम् । दशभिरिति । नखानां दिशां च दशसंख्याकत्वात् । मणिपादेति । मणिसंबन्ध- प्रतिष्ठानमेव पोषयति । करो हस्तोऽपि । फेनायमानमिति । जल संतापेन सफेनं उन्होंने असिधाराव्रत लिया था फिर भी वे सदा एकान्त रहने वाले (अविसंवादी) राजर्षि थे। टेढ़े-मेढ़े राजमार्ग (राजा के पद) पर पैर फिसलने के भय से मानों उन्होंने धर्म का आश्रय लिया था। मानों सत्य दूसरे राजाओं से तिरस्कृत होकर डरते-डरते वचन लेकर सब प्रकार से उन्हीं की सेवा में तत्पर था। पास में खड़ी वेश्या (चामरग्राहिणी) की परछाइयाँ उनके चरण के नखों पर पड़ रही थीं, मानों दशो दिशायें शरीर धारण करके उनको प्रणाम कर रही हों। वे दूर तक लम्बे दृष्टिपात से मानो लोकपालों की गलती सही देख रहे थे। सूर्य की किरणें उनके मणिमय पादपीठ पर पड़ रही थीं मानों वह आकाश में दूर जाने के लिए सम्राट् की अनुमति पाने की इच्छा से प्रार्थना कर रहा था। आभूषणों की प्रभा से उनके चारों ओर मंडल-सा बन गया था मानो दिन उनकी प्रदक्षिणा कर रहा हो। शौर्य के दर्प से वे न झुकने वाले पर्वतों से कष्ट का अनुभव करते थे। वह उस चन्दन के सदृश उज्ज्वल लावण्य के समुद्र को धारण कर रहे थे जो उनके एकाधिपत्य के बड़े शौर्य के प्रताप से खौलकर फेनिल हो रहा था। दर्प के कारण अपने ही प्रतिबिम्बों को जो राजाओं की चूड़ा- मणियों में पड़ रहे थे, सहन नहीं कर पाते थे। चँवर की हवा के बहाने बार-बार सांस १. मिव गळितोष्मणा दिवसेन । २. भूभृद्भिर्दूयमानं ।
सकलमिव चतुःसमुद्रलावण्यमादायोत्थितया श्रिया समुपश्लिष्टम्, आभरणमणिकिरणप्रभाजालजायमानानीन्द्रधनुःसहस्राणीन्द्रप्राभृतप्रहितानि विलभमानमिव राज्ञां संभाषणेषु परित्यक्तमपि मधु वर्षन्तम्, काव्यकथास्वपीतमप्यमृतमुद्वमन्तम्, विश्रम्भभाषितेष्वनाकृष्टमपि हृदयं दर्शयन्तम्, प्रसादेषु निश्चलामपि श्रियं स्थाने स्थाने स्थापयन्तम्, वीरगोष्ठीषु पुलकितेन कपोलस्थलेनानुरागसंदेशमिवोपांशु रणश्रियः शृण्व- न्तम्, अतिक्रान्तसुभटकलहालापेषु स्नेहवृष्टिमिव दृष्टिमिष्टे कृपाणे पातय- न्तम्, परिहासस्मितेषु गुरुप्रतापभीतस्य राजकस्य स्वच्छमाशयमिव दशनांशुभिः कथयन्तम्, सकललोकहृदयस्थितमपि न्याये तिष्ठन्तम्,
नवति । असहमानमिवेति । कथं सामान्येन समान इति । सकलमित्यादि । सकल- पदेन चतु.शब्देन च शौरेरस्य विशेषमाह । ततो लवणत्वस्य तत्राद्यापि शिष्यमा- णत्वात् । अलं लावण्यमादाय । एकस्माच्च समुद्रादुत्थाय लक्ष्म्या शौरिः समुप- श्लिष्टः । लावण्यं लवणता; सौन्दर्यं च। प्राभृतं ढौकनिकम्। मधु मद्यम्, अमृतं च । विश्रम्भ विश्वासः । उपांश्वप्रकटम् । अतिक्रान्ते कलहे रणे शस्त्राणां स्नेहो दीयते रुधिरादिसलिलनिवारणाय । स्वच्छं निर्मलम् , सुप्रसादमाशयं भावं, प्रकृष्टतापभी- तस्य च स्वच्छो निर्मल आशयो जलाधारो दृश्यते । अत्र प्रतापेत्यादि प्रकरणसाह- चर्यात्स्वच्छतान्यथानुपपत्त्या च जलशब्द बिना जलाशय एव प्रतीयते । न्याये तिष्ठन्तम् । न्यायममुञ्चन्तमित्यर्थः । यः सर्वेषां हृदयस्थितः स एकस्मिन्नेव तिष्ठ-
छोड़ती हुई राजलक्ष्मी को धारण कर रहे थे, मानो चारों समुद्रों के सम्पूर्ण लावण्य को लेकर निकली हुई श्री ने उनका आलिंगन किया था। उनके आभरणों की प्रभा से हजारों इन्द्रधनुष बन गए थे, मानो उपहार के रूप में इन्द्र ने भेजा हो। राजाओं के साथ बातचीत के प्रसंग में छूटे हुए भी मधु ( मदिरा अथवा मधुर रस ) की मानो वर्षा कर रहे थे। कविता की गोष्ठियों में न पिये हुए अमृत को भी मानो उगल रहे थे। विश्रंभालाप करते हुए अपने अनाकृष्ट हृदय को मानों दिखा रहे थे। प्रसन्न होकर स्थान-स्थान में अपनी निश्चल श्री को भी अर्पित कर रहे थे। वीरगोष्ठियों में उनके कपोल रोमांच से भर आये थे मानों एकांत में रणश्री द्वारा भेजे गये अनुरागसंदेश को सुन रहे थे। बड़े-बड़े योद्धाओं के युद्धों की बातचीत के प्रसंगों में अपने प्रिय कृपाण पर मानो स्नेह की वर्षा की भांति दृष्टिपात कर रहे थे। हँसी-मजाक में मुस्कुराते हुए वे अपने प्रचण्ड प्रताप से भीत राजाओं के प्रति दाँत की किरणों से अपने स्वच्छ मनोभाव को व्यक्त कर रहे थे । सारे जन-समूह के हृदय में स्थित होकर भी न्याय पर स्थित थे। उनमें
१२२ Digitized by Arya Samaj Fहर्षचरितम्Chennai and eGangotri अगोचरे गुणानामभूमौ सौभाग्यानामविषये वरप्रदानानामशक्य आशि- षाममार्गे मनोरथानामतिदूरे देवस्यादिश्युपमानानामसाध्ये धर्मस्या- दृष्टपूर्वे लक्ष्म्या महत्त्वे स्थितम्, अरुणपादपल्लवेन सुगतमन्थरोरुणा वज्रायुधनिष्ठुरप्रकोष्ठपृष्ठेन वृषस्कन्धेन भास्वद्विम्बाधरेण प्रसन्नावलो- कितेन चन्द्रमुखेन कृष्णकेशेन वपुषा सर्वदेवतावतारमिवैकत्र दर्शयन्तम्, अपि च मांसलमयूखमालामलिनितमहीतले महति महार्हे माणिक्य- मालामण्डितमेखले महानीलमये पादपीठे कलिकालशिरसीव सलीलं विन्यस्तवामचरणम्, आक्रान्तकालियफणाचक्रवालं बालमिव पुण्ड- रीकाक्षम्, क्षौमपाण्डुरेण चरणनखदीधितिप्रतानेन प्रसरता महीं महादेवीपट्टबन्धेनेव महिमानमारोपयन्तम्, अप्रणतलोकपालकोपेने- तीति विरोधः । अरुणो लोहितः, अनूरुश्च । शोभनं गमनं ययोस्तौ मन्थरावूरू यस्य । बुद्धश्च सुगतः । वज्राख्यमायुधं तद्वन्निष्ठुरं कठोरं प्रकोष्ठस्य पृष्ठं यस्य तेन । इन्द्र- श्वाम्य वज्रमायुधम् । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । वृषो दान्तः, धर्मश्च । भास्वद्भास्वरम्; रविश्च भास्वान् । बिम्बं फलभेदः, मण्डलं च । अवलोकितं वीक्षि- तम्, बुद्धिभेदश्चावलोकितः । कृष्णः कालः, हरिश्च कृष्णः । कलिकालइति । कलि- कालस्य मलिनत्वादेवमुत्प्रेक्षा । वामपादेन पराभवनीयत्वमेव पोष्यते । कालियो लक्ष्मी का उत्कर्ष था जो गुणों का अगोचर, सौभाग्य का अभूमि, वरदान का अविषय, आशी- र्वचनों का अशक्य, मनोरथों का अमार्ग, भाग्य से भी अतिदूर, उपमानों का अविषय एवं धर्म का असाध्य था। अपने शरीर से समस्त देवताओं के अवतार को प्रकट कर रहे थे, उनके पादपल्लव अरुण (लाल, सूर्य का सारथी अरुण), सुगत (बुद्ध) अर्थात् सुन्दर गमन करने वाले और मन्दगामी दोनों ऊरु, हाथ के गट्टे वज्र के समान (वज्रायुध = इन्द्र) कड़े, वृष (बैल, धर्म) के समान कंधे, चमकते हुए (भास्वत् = सूर्य) बिम्बाधर, दृष्टिपात (अवलो- कितेश्वर) प्रसन्न, चन्द्र के सदृश मुख एवं केश काले (कृष्ण) थे। इन्होंने अपना बायाँ पैर महानील मणि के विशाल, बहुमूल्य, स्थूल प्रभाजाल से पृथ्वी को कलित करने वाले एवं माणिक्यसमूह से मण्डित मध्यभाग वाले पादपीठ पर मानों कलिकाल के सिर पर रखा था। अथवा वे बालक श्रीकृष्ण के सदृश थे जिन्होंने कालिया नाग के फनों पर आक्र- मण किया था। क्षौम वस्त्र के समान उनके चरणों के नखों की रश्मियाँ फैलती थीं मानो पृथिवी को पट्टबंध द्वारा राजमहिषी के पद पर प्रतिष्ठित कर रहे थे। सम्राट् के दोनों चरण प्रणत न होने वाले लोकपालों पर क्रोध के कारण मानो अत्यन्त लाल थे। समस्त नरपतियों के मुकुटों में अधिक पान किये हुए पद्मराग मणि की प्रभा को मानो वमन कर रहे थे, CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
द्वितीय उच्छ्वासः १२३ वातिलोहितौ सकलनृपतिमौलिमालास्वतिपीतं पद्मरागरत्नातपमिव वमन्तौ सर्वतेजस्विमण्डलास्तमयसंध्यामिव धारयन्तावशेषराजककुसुम- शेखरमधुरसस्रोतांसीव स्रवन्तौ समस्तसामन्तसीमन्तोत्तंसस्रक्सौरभ- भ्रान्तभ्रमरमण्डलैरमित्रोत्तमाङ्गैरिव मुहूर्तमप्यविरहितौ संवाहनतत्परायाः श्रियो विकचरक्तपङ्कजवनवासभवनानीव कल्पयन्तौ जलजशङ्खमीन- मकरसनाथतलतया कथितचतुरम्भोधिभोगचिह्नाविव चरणौ दधा- नम्, दिङ्नागदन्तमुसलाभ्यामिव विकटमकरमुखप्रतिबन्धबन्धुराभ्यामु- द्धेललावण्यपयोधिप्रवाहाभ्यामिव फेनाहितशोभाभ्यां कलाचन्दनद्रुमा- भ्यामिव भोगिमण्डलशिरोरत्नरश्मिरञ्जयमानमूलाभ्यां हृदयारोपितभूभार- धारणमाणिक्यस्तम्भाभ्यामूरुदण्डाभ्यां विराजमानम्, अमृतफेनपिण्ड- पाण्डुना मेखलामणिमयूखखचितेन नितम्बबिम्बव्यासङ्गिना विमल- पयोधौतेन नेत्रसूत्रनिवेशशोभिनाधरवाससा वासुकिनिर्मोकेणेव मन्दरं द्योतमानम्, अघनेन सतारागणेनोपरिकृतेन द्वितीयाम्बरेण भुव- नागभेदः । पुण्डरीकाक्षमिवि राज्ञी विशेषणम् । तेजस्विनो वीराः, आदित्याश्च । जलजेत्यादीनि महाराजविशेषणानि लक्षणानि । एवमादि च संभवति । मकर- मुखं जानुसंधिः, मकरमुखचिह्नित्तान्तकपोलश्च । उद्वेलतया लावण्यस्य समुच्छ- लद्रूपत्वमाह । फेनो रससंतानः, डिण्डीरश्च । भोगिनो नृपाः, सर्पाश्च । फेनवत्तैश्च पाण्डु । मेखला रशना, पर्वतमध्यभूमिश्च । पयो जलम्, क्षीरं च । नेत्रसूत्रं पट्टसूत्रम्, मन्थनरज्जुश्च । अघनेन, छातेन, अनभ्रेण च । ताराः सूत्रबिन्दवः नक्ष- समस्त तेजस्वियों (वीरों अथवा आदित्यों) के अस्त हो जाने के कारण मानो संध्या को धारण कर रहे थे, समस्त राजाओं के सिर की पुष्परचित माला के मधुरस के प्रवाह को मानो बहा रहे थे, समस्त सामन्तों के केशविन्यास की माला की सुगन्ध में लुभाए हुए भौंरे शत्रुओं के सिर के रूप में मानो क्षणभर भी इन चरणों को नहीं छोड़ते; सेवा में लीन लक्ष्मी के निवास के लिए खिले हुए लाल कमलों के भवनों को मानो बना रहे थे, तलवे में कमल, शंख, मछली और मकर के चिह्न थे जिनसे व्यक्त होता था कि उन्होंने चारों समुद्रों के उपभोग के चिह्नों को प्राप्त किया था। उनकी जांघें दिग्गज के दंतरूपी मुसलों के समान थीं, उद्वेल लावण्य के समुद्र के दो प्रवाहों की भाँति विशाल मकरमुखों (जानुसन्धियों, पक्ष में मकर के मुखों) के प्रति- बन्ध के कारण निम्नोन्नत, फेर से शोभित थीं एवं चन्दन के वृक्षों की भांति भोग-मण्डल (धनिकसमूह वृक्ष में सर्पसमूह) के सिर के रत्नों की किरणों से जिनका मूल भाग रंजित हो रहा था तथा सम्राट् के हृदय पर आरोपित पृथ्वी के भार के धारण के लिए माणिक्य-स्तम्भ थीं।