हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ हर्षचरितम् जातिभिः सर्वदेशान्तरागतैश्च दूतमण्डलैरूपास्यमानम् सर्वप्रजानिर्माण- भूमिमिव प्रजापतीनां, लोकत्रयसारोच्चयरचितं चतुर्थमिव लोकम्, महा- भारतशतैरप्यकथनीयसमृद्धिसंभारम्, कृतयुगसहस्रैरिव कल्पितसन्निवेशम् स्वर्वाबुंदैरिव विहितरामणीयकम्, राजलक्ष्मीकोटिभिरिव कृतपरिग्रहं राजद्वारमगमत् । अभवच्चास्य जातविस्मयस्य मनसि—‘कथमिवेदमियत्प्रमाणं प्राणि- जातं जनयतां प्रजासृजां नासीत्परिश्रमः, महाभूतानां वा परिक्षयः, पर- माणूनां वा विच्छेदः, कालस्य वान्तः, आयुषो वा व्युपरमः, आकृतीनां वा परिसमाप्तिः' इति । मेखलकस्तु दूरादेव द्वारपाललोकेन प्रत्यभिज्ञाय- मानः 'तिष्ठतु तावत्क्षणमात्रमत्रैव पुण्यभागी' इति तमभिधायाप्रतिहतः पुरः प्राविशत् । प्रोक्तमधीयते पाराशरिणो यतयस्तैः । वर्णिभिर्ब्रह्मचारिभिः । सर्वप्रजेति । अत्र हि स्थित्वा यदि प्रजापतयो न सृज्येयुः तत्कथं सर्वे भावाः कारणभूता इव तत्र लक्ष्येरन् । अर्बुदं दशकोटयः । कोटिलक्षशतम् । इह तु बहुसंख्योपलक्षणार्थावर्बुदकोटिशब्दौ । परिसमाप्तिरन्तारम्भः । तिष्ठत्विति । विद्यायुक्ते कदाचिदनादरशङ्केत्येतदर्थं- माह—पुण्यभागीति । पतियों को सब प्रकार की प्रजाओं के निर्माण का स्थान था। तीनों लोकों के सार को इकट्ठा करके मानो कोई चौथा लोक बना दिया गया था। सैकड़ों महाभारत भी लिखे जाँय फिर भी उसके वैभव का वर्णन नहीं किया जा सकता । मानो हजारों सतयुगों ने अपने-अपने रहने के लिए वहां भवन बना लिया था । मानो करोड़ों स्वर्गों उसको शोभा बढ़ा रहे थे। करोड़ों की संख्या में राजलक्ष्मी ने आकर उसे मानों अपना आश्रय बना लिया था । बाण को आश्चर्य हुआ, उसके मन में हुआ—'इतने प्राणियों को उत्पन्न करते हुए प्रजापतियों को कैसे नहीं थकान हुई ? या पांचों महाभूत समाप्त क्यों न हुए ? परमाणुओं का विच्छेद क्यों न हुआ ? समय का अन्त या आयु का खात्मा या आकृतियों की परिसमाप्ति क्यों न हुई ?' इधर मेखलक को दूर से ही द्वारपालों ने पहचान लिया । 'पुण्यभागी आप क्षण भर यहीं ठहरें' बाण से यह कह मेखलक बेरोकटोक भीतर घुस गया ।