भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

द्वितीय उच्छ्वासः १०५

अथ स मुहूर्तादिव प्रांशुना, कर्णिकारगौरेण, वीध्रकञ्चुकच्छन्नवपुषा, समुन्मिषन्माणिक्यपदकबन्धबन्धुरवस्तबन्धकृशावलग्नेन, हिमशैल- शिलाविशालवक्षसा, हरवृषककुदकूटविकटांसतटेन, उरसा चपलहृषीक- हरिणकुलसंयमनपाशमिव हारं बिभ्रता, 'कथयतं यदि सोमवंशसंभवः सूर्यवंशसंभवो वा भूपतिरभूदेवंविधः' इति प्रष्टुमानीयताभ्यां सोमसूर्याभ्या- मिव श्रवणगताभ्यां मणिकुण्डलाभ्यां समुद्भासमानेन, वहद्वदनलावण्य- विसरवेणिकाक्षिप्यमाणेराधिक्रारगौरवाद्वोयमानमार्गेणेव दिनकृतः किरणैः प्रसालब्धया विकचपुण्डरीकमुण्डमालयेव दीर्घया दृष्ट्या दूरादेवानन्द- यता, नैष्ठुर्याधिष्ठानेऽपि प्रतिष्ठितेन पदे पदे प्रश्रयमिवावनम्रेण, मौलिना


अथेत्यादौ । ईदृशपुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचदिति संबन्धः । अन्तराले स्वतन्त्ररादिवर्णनामावादथेत्यादिना समनन्तरमेव निर्गमनेन पुनरादर एव प्रती- यते । अत आह—मुहूर्तादिवेति । पुरुषानुगतत्वेन चादर एव पोष्यते । वीध्रं निर्म- लम् । बन्धुरं शोभनम् । वस्तं सुवर्णपट्टिकाकटिसूत्रम् । तस्य बन्धेन निवेशनेन कृशमवलग्नं मध्यं यस्य तेन । हिमशैले । हिमग्रहणं राज्ञो धवलत्वात् । हरग्रहणं जराशौक्ल्यप्रतिपादनाय पूर्ववत् । हृषीकाणीन्द्रियाणि । आनीताभ्यामिति । आन- यने तस्य प्रमविष्णुता ध्वन्यते । यश्च स्रष्टुमानीयते स श्रवणं गच्छति । वेणिका


तब कुछ ही क्षण में मेखलक बाहर निकला उसके पीछे-पीछे एक दूसरा भी पुरुष था । वह लम्बा और कर्णिकार की भाँति पीतवर्ण का था । उसका शरीर निर्मल कंचुक से ढँका था । उसकी कमर चमकते हुए माणिक्य के पदकों वाली सुन्दर पेटी से बँध जाने के कारण पतली हो गई थी । उसकी छाती हिमालय की चट्टान के समान चौड़ी थी । शिव के वाहन वृषभ की पीठ के टाट के समान उसके दोनों कन्धे थे । वह अपने चंचल इन्द्रिय- हरिणों को बांध रखने के लिए पाश के समान अपने वृक्ष पर हार धारण किये हुए था । चन्द्र और सूर्य के समान मणिकुण्डल उसके कानों में शोभित हो रहे थे, मानों वे (चन्द्र और सूर्य) उन कानों से पूछ रहे थे कि 'यदि चन्द्रवंश में या सूर्यवंश में कोई हर्ष जैसा सम्राट् उत्पन्न हुआ हो तो उसे बताओ।' वह दूर ही से अपनी बड़ी-बड़ी आँखों द्वारा आनन्दित कर रहा था, उसकी आँखें खिले हुए पुण्डरीक की मानो मुण्डमाला थी, जिसे सूर्य की किरणों ने प्रसन्न होकर मानो अर्पित किया था, क्योंकि उसके मुख की लावण्यप्रभा के प्रवाह से वे किरणें बिल्कुल तिरस्कृत हो रही थीं, फिर भी सूर्य के अधिकार-गौरव को देख- कर उसने उनके लिए मार्ग दे दिया था । अत्यन्त निष्ठुर पद पर प्रतिष्ठित होने पर भी वह अपने झुके मस्तक से विनय की भाँति सफेद पगड़ी धारण किये था। उसके बायें हाथ में स्थूल