भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

१०६ हर्षचरितम् पाण्डुरमुष्णीषमुद्वहता, वामेन स्थूलमुक्ताफलच्छुरणदन्तुरत्सरुं करकिस- लयेन कलयता कृपाणम्, इतरेणापनीततरलतां ताडिनीमिव लतां शात- कौम्भीं वेत्रयष्टिमुन्मृष्टां धारयता पुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचत्— 'एष खलु महाप्रतीहाराणामनन्तरश्चक्षुष्यो देवस्य पारियात्रनामा दौवा- रिकः। समनुगृह्णात्वेनमनुरूपया प्रतिपत्त्या कल्याणाभिनिवेशी' इति। दौवारिकस्तु समुपसृत्य कृतप्रणामो मधुरया गिरा सविनयमभाषत— 'आगच्छत। प्रविशत देवदर्शनाय। कृतप्रसादो देवः' इति। बाणस्तु 'धन्योऽस्मि, यदेवमनुग्राह्यं मां देवो मन्यते' इत्युक्त्वा तेनोपदिश्यमान- मार्गः प्राविशदभ्यन्तरम्। अथ वनायुजैः, आरट्टजैः, काम्बोजैः, भारद्वाजैः, सिन्धुदेशजैः, पारसी- प्रवाहः। वामेनेति। तदा तस्य व्यापारानुपपत्तेः अपनीतेत्यादिनास्य नियम- विधायित्वं पोष्यते। उन्मृष्टामुत्तंसिताम्। अनेन भास्वरतैव पोष्यते। अनन्तरः प्रधानम्। चक्षुष्यः प्रियः। आगच्छतेत्यादौ बहुत्वनिर्देशेनादर एवास्यापाद्यते। अथेत्यादौ एवंविधैस्तुरङ्गैरारचितां मन्दुरां विलोकयन्दूरादिमधिष्ण्यागारम- पश्यदिति सम्बन्धः। वनायुजादीनि देशविशेषेणाश्वानां नामानि। शोणैरित्यादि- मोतियों की जड़ाऊ मूठ वाली तलवार था और दाहिनी हाथ में तरलता से रहित विद्युल्लता के समान; चमक चढ़ी सोने की वेत्रयष्टि थी। मेखलक ने कहा—'यह महाप्रतीहारों का मुखिया, महाराज का प्रिय, परियात्र नामक दौवारिक है। कल्याण में अभिनिवेश रखने वाले आप इसका उचित सम्मान करें। दौवारिक पारियात्र ने पास आकर प्रणाम किया और मधुर आवाज में विनयपूर्वक बोला—'आप आइए, और महाराज के दर्शन के लिए प्रवेश कीजिए, महराज आप पर प्रसन्न हैं। बाण ने कहा—'मैं धन्य हूँ, जो मुझे महाराज इस प्रकार अपने अनुग्रह के योग्य समझ रहे हैं।' यह कहकर पारियात्र के द्वारा मार्ग दिखाने जाने पर बाण ने भीतर प्रवेश किया। बाण ने भीतर प्रवेश करते ही अनेक राजवल्लभ तुरङ्गों की बनी हुई मन्दुरा (घोड़साल) देखीं। वहाँ कुछ वनायुज (वानाघाटी वजीरिस्तान में उत्पन्न) घोड़े, कुछ आरट्टज (वाहीक या पंजाब में उत्पन्न) घोड़े; कुछ काम्बोज (मध्य एशिया में वन्धु नदी के पामीर प्रदेश में उत्पन्न) घोड़े, कुछ भारद्वाज (उत्तरी गढ़वाल के) घोड़े, कुछ सिन्धुदेशज (सिंधसागर या थल दोआब के उत्पन्न) घोड़े, कुछ पारसीक (सासानी ईरान के) घोड़े थे। कुछ शोण (लालकुम्मैत), कुछ श्याम (मुदकी), कुछ श्वेत (सब्जा), कुछ पिञ्जर (समंद), कुछ हरित (नीलासब्जा),