भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 145

राणीवापयद्भिः कैश्चिदुरःस्थलदोलायमानेन्द्रनीलतरलप्रभापट्टैः स्वामि- कोपप्रशमनाय कण्ठबद्धकृपाणपट्टैरिव कैश्चिदुच्छ्वाससौरभभ्राम्यद्भ्रमर- पटलान्धकारितमुखैरपहृतलक्ष्मीशोकधृतलम्बश्मश्रुभिरिवान्यैः शेखरोड्डीय- मानमधुपमण्डलैः प्रणामविडम्बनाभयपलायमानमौलिभिरिव निर्जितै- रपि सुसंमानितैरिवानन्यशरणैरन्तरान्तरा निष्पततां विशतां चान्तर- प्रतीहाराणामनुमार्गप्रधावितानामर्थिजनसहस्राणामनुयायिनः पुरुषान श्रा- न्तैः पुनः पुनः पृच्छद्भिः 'भद्र ! अद्य भविष्यति भुक्त्वा स्थाने दास्यति दर्शनं परमेश्वरः, निष्पतिष्यति वा बाह्यां कक्षाम्' इति दर्शनाशया दिवसं नयद्भिर्भुजनिर्जितैः शत्रुमहासामन्तैः समन्तादासेव्यमानम्, अन्यैश्च प्रतापानुरागागतैर्नानादेशजैर्महामहोपालैः प्रतिपालयद्भिन्नरपतिदर्शनकाल- मद्ध्यास्यमानम्, एकान्तोपविष्टैश्च जैनैराहतैः पाशुपतैः पाराशरिभिर्वर्णिभिः सर्वदेशजन्मभिश्च जनपदैः सर्वाम्भोधिवेलावनवलयवासिभिश्च म्लेच्छ-


तितः' । चपलो वा । शेखरं मुण्डमालिकम् । मोलयः केशाः । निर्जितैः पुरस्कृत- न्यक्कृतैः, राजसेवाप्राप्तैः, संमानितैः पूजितैरिव । अनुयायिन इति । तेषां स्वयं सुलभत्वात् । जैनैः शाक्यैः । आर्हतैनंग्नक्षपणकैः । पाशुपतैः शैवभेदैः । पराशरेण


चँवर अर्पित कर रहे हों । कुछ के वक्ष पर लटकते हुए इन्द्रनील की प्रभा तरल हो रही थी मानो उन्होंने महाराज के क्रोध को शान्त करने के लिए अपने-अपने कण्ठ में कृपाण बाँध लिये थे । कुछ के मुख पर उच्छ्वास की सुगन्ध से भौंरे छा गये थे, मानों लक्ष्मी के अपहरण कर लिये जाने के शोक से उन्होंने बड़ी लम्बी दाढ़ी बढ़ा रखी थी । उनके मस्तक के ऊपर भौंरे मँडरा रहे थे, मानो प्रणाम करने के लिए झुकने के तिरस्कार के भय से उनके धम्मिल्ल उड़े जा रहे थे । वे पराजित थे, फिर भी सम्मानित के समान थे । उनका कोई दूसरा आश्रय नहीं था । बीच-बीच में अन्तःपुर से द्वारपाल निकलते तो उनके पीछे-पीछे अनेक याचक दौड़ पड़ते, आगे जानेवाले पुरुषों से ये शत्रुसामन्त बिना थकते पूछते रहते थे कि 'भद्र, सजाये जाते हुए मुक्तास्थानमण्डप में सम्राट् आज दर्शन देंगे या वे बाहरी आस्थानमण्डप में निकल कर आयेंगे ?' इस प्रकार सम्राट् के दर्शनों की आशा में दिन बिताते थे । भिन्न-भिन्न देशों के दूसरे राजे जो प्रताप अनुराग से पधारे हुए थे, महाराज के दर्शनों के अवसर की प्रतीक्षा में वहाँ विराजमान थे । एक ओर बौद्ध, जैन, शैव, संन्यासी, ब्रह्मचारी, अनेक देशों के लोग, समुद्रों के तटवर्ती जंगलों के निवासी म्लेच्छ और अनेक देशों के आये हुए राजदूत वहाँ वर्तमान थे । वह राजद्वार मानो प्रजा-