हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ हर्षचरितम् त्रैर्दोलायमानम्, अपि च हंसयूथायमानं करिकर्णशङ्खैः, कल्पलता- वनायमानं कदलिकाभिः, माणिक्यवृक्षकवनायमानं मायूरातपत्रैः, मन्दाकिनीप्रवाहायमाणमंशुकेः, क्षीरोदायमानं क्षौमैः, कदलीवनायमानं मरकतयूखैः, जन्यमानान्यदिवसमिव पद्मरागबालातपैः, उत्पद्यमाना- पराम्बरमिवेन्द्रनीलप्रभापटलैः, आरभ्यमाणापूर्वनिशमिव महानीलमयू- खान्धकारैः स्यन्दमानानेककालिन्दीसहस्रमिव गारुडमणिप्रभाप्रतानैः अङ्गारकितमिव पुष्परागरश्मिभिः, कैश्चित्प्रवेशमलभमानैरधोमुखैश्चरण- नखपतितवदनप्रतिबिम्बनिभेन लज्जया स्वाङ्गानीव विशद्भिः कैश्चिदङ्गु- लीलिखितायाः क्षितेर्विकीर्यमाणकरनखकिरणकदम्बव्याजेन सेवाचाम- कलेरियं कालेयी। सर्वत्राग्निकलिभ्यां ढक्। पद्मरागा इव बालातपास्तैः। महानीला गरुडमणयः। पुष्परागाश्च मणिभेदाः। कैश्चिदित्यादो शत्रुमहासामन्तैः समन्तादा- सेव्यमानमित्यन्वयः। सेवेत्यादि। त्वयेदानीं चामरग्रहणेन सेवनीय इति तेषां हि क्षितिः कलत्रमतस्तद्द्वारेण सेवनेच्छा। 'हारस्य यो मध्यमणिस्तरलंः स प्रको- उजले फूल चारों ओर खिल जाते हैं, मानों आकाश को मृणालसूत्रों से भर रहे थे। हाथी के कानों के शंख हंससमूह की भांति लग रहे थे। केले के खम्भे इस तरह लगाये गये थे कि राजद्वार कल्पलतावन के समान लग रहा था। नाचते हुए मोर के बह्रमण्डल की आकृति वाले मायूर आतपत्रों से वह स्थान माणिक्य के वृक्षों के वन के समान हो रहा था। वहाँ अंशुक इस तरह लहरा रहे थे कि आकाशगङ्गा का प्रवाह बन गया। क्षौम वस्त्रों से क्षीरसमुद्र का दृश्य उत्पन्न हो रहा था। मरकत मणियों की हरी-हरी किरणें इस तरह फैल गई थीं मानों वह केले का वन हो। पद्मराग मणियों की लाल-लाल किरणें उषाकाल की लाली के समान छिटक रही थीं मानों दूसरा दिन होने लगा हो। इन्द्रनीलमणियों की नीली प्रभा के फैलने से मानों दूसरा आकाश उत्पन्न हो गया ऐसा लग रहा था। महानील मणियों की किरणें इस तरह फैल रही थी मानों कोई अपूर्व रात्रि ही उत्पन्न होने वाली हो। गारुड मणियों की प्रभा इस प्रकार फैलती जा रही थी मानो यमुना के हजारों प्रवाह चल पड़े हों। पुष्पराग मणियों की रश्मियाँ अङ्गारे की भाँति लग रही थीं। भुजनिर्मित अनेक शत्रु महासामन्त वहाँ उपस्थित थे। कुछ तो भीतर प्रवेश नहीं पाने के कारण मुख नीचा किये हुए खड़े थे, चरण के नखों पर उनका मुख प्रतिबिम्बित हो रहा था मानो वे लज्जा के कारण अपने ही अङ्गों में सिमटते जा रहे थे। कुछ बैठे-बैठे अंगुलियों से जमीन पर लिख रहे थे, अपने नख के फैलते हुए किरणजाल से महाराज की सेवा में मानो