भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

द्वितीय उच्छ्वासः १०१ विवस्वतः प्रतापमापिबद्भिरिवातपं चन्द्रलोकमयमिव जीवलोकं जन- यद्भिः कुमुदमयमिव कालं कुर्वद्भिज्योत्स्नामयमिववासरं विरचयद्भिः फेन- मयीमिव दिवं दर्शयद्भिरकालकौमुदीसहस्राणीव सृजद्भिरुपहसद्भिरिव शातक्रतवीं श्रियं श्वेतायमानैरातपत्रखण्डैः श्वेतद्वीपायमानम्, क्षणदृष्ट- नष्टाष्टदिङ्मुखं च मुष्णद्भिरिव भुवनमाक्षेपोत्क्षेपदोलायितुं दिनं गतागता- नीव कारयद्भिरुत्सारयद्भिरिव कुनृपतिसम्पर्ककलङ्ककालीं कालेयीं स्थितिं विकचविशदकाशवनपाण्डुरदशदिशं शरत्समयमिवोपपादयद्भिर्बिसतन्तु- मयमिवान्तरिक्षमाविर्भावयद्भिः शशिकरुचोनां चलतां चामराणां सह- द्भिरिवेति । प्रतापस्योपहास एव समुचितो वैयर्थ्यात् । अथ च प्रतापपदेन भङ्ग्या विवस्वत आरोपितविजिगीषुव्यवहारत्वाच्छत्रुमनःसंतापकारि यश उक्तम् । आतपं प्रकाशम् । आपिबद्भिरिति । तस्य सर्वत एवातिदर्शनात् । जीवलोकमिति । यश्च जीवानां लोकस्तत्र कथं चन्द्रलोक इति विरोधः । कुमुदमयमिति । कुमुदमय- त्वाच्छुक्लं भवति न तु कालम् । कुमुदमयं च समयं कार्तिकादि । ज्योत्स्नेति । वासरे ज्योत्स्ना न संभवतीति विरोधः । एवं च दिवः फेनमयीत्वम् । जलदे हि फेनानामभावः । कौमुदी कुमुदिनी, कार्तिकी च ज्योत्स्ना । पूर्वं सामान्येनोक्ता इति । विशेषेण श्वेता इवाचरन्तः श्वेतायमानाः । तैस्तत्र तेषां स्वत एव श्वेतत्वाच्छ्वेत- पदेन कथमुपमानतेत्युच्यते । श्वेतगुणा इवाचरन्तः श्वेतायमानाः । तेन यथा श्वेतगु- णयोगादन्यत्किञ्चिच्छ्वेतेते तद्वदेतद्योगात् राजद्वारमिति । श्वेताः स्फटिका इत्यन्ये । केचित्तु ‘श्वेतमानैः’ इति पठन्ति । क्षणेत्यादौ चामराणां सहस्रैर्दोलायमानमित्यन्वयः । भी लगे हुए थे । गंगा के श्वेत सिकतिल तटों के समान उनके राजहंस की आकृतियाँ कढ़ी हुई थीं । मानो वे ग्रीष्मकाल पर विजय प्राप्त कर रहे थे, मानो सूर्य के प्रताप को हँस रहे थे, आतप को मानो पीते जा रहे थे, मानों जीवलोक को चन्द्रलोकमय बना रहे थे, काल को कुमुदमय बना रहे थे, दिन में चाँदनी ही चाँदनी फैला रहे थे, आकाश को मानों फेनमय दिखा रहे थे, असमय में हजारों चाँदनियों का निर्माण कर रहे थे; इन्द्र की सम्पत्ति का मानों उपहास कर रहे थे । चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल चलते हुए चँवर भी स्कन्धावार की शोभा बढ़ा रहे थे । आठों दिशाओं को क्षणभर में ही स्पष्ट कर देते और क्षण भर में ढक लेते मानों इस प्रकार त्रिभुवन का ही अपहरण करने लगे हों । ऊपर नीचे डोलते हुए चामरों ने सूर्य की किरणों को क्रम से छोड़ते-रोकते हुए मानों दिन का आजा-जाना लगा दिया था । कुत्सित राजाओं द्वारा कलंकित कलियुग के आचारों को मानों वे झाड़ रहे थे । शरत्काल की छटा को उत्पन्न कर रहे थे जिनमें काश के उजले-