हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० हर्षचरितम् पूरैः सरक्तोत्पलैरिव रक्तशालिशालेयैरनवरतझणझणायमानचारुचामीकर- घुरुघुरुकमालिकैर्जत्करञ्जवनैरिव रणितशुष्कबीजकोशीशतैः श्रवणोपान्त- प्रेङ्खत्पञ्चरागवर्णोर्णाचित्रसूत्रजूटजटाजालैः कपिकपोलकपिलैः क्रमेलककुलैः कपिलायमानम्, अन्यत्र शरज्जलधरैरिव सद्यःस्रुतपयःपटलधवलतनुभिः कल्पपादपैरिव मुक्ताफलजालकजायमानालोकलुप्तच्छायामण्डलैनारायण- नाभिपुण्डरीकैरिवाश्लिष्टगरुडपक्षैः क्षीरोदोद्देशैरिव द्योतमानविकटविद्रुम- दण्डैः शेषफणाफलकैरिवोपरिस्फुरत्स्फीतमाणिक्यखण्डैः श्वेतगङ्गा- पुलिनैरिव राजहंसोपसेवितैरभिभवद्भिरिव निदाघसमयमुपहसद्भिरिव लायमानमित्यन्वयः । वराटिकाः श्वेतिकाः । शालीनां भवनं क्षेत्रं शालेयम् । 'व्रीहिशाल्योर्ढक्' । बीजकोशी शिम्बिका । क्रमेलका उष्ट्राः । अन्यत्रेत्यादिनाऽऽत- पत्रखण्डैः श्वेतायमानमित्यन्वयः । सद्य इत्याद्यभिप्रायेण शरद्ग्रहणम् । स्रुतं निर्गतम् । पयः क्षीरम्, जलं च । पटलवत्तेन च धवला तनुराकारो येषाम् । अन्यत्र, —धवलाश्च ते तनवः, क्षीणाश्च ते । पुण्डरीकग्रहणेनाकारसदृशत्वमप्युच्यते । गरुडपक्षा रत्नभेदाः, गरुडस्य चाङ्गरुहाः । क्षीरोदेति । शुक्लतया राजहंसाः मुख्यनृपाः रक्तचञ्चुचरणा राजहंसाः । निदाघस्य तिरस्करणादभिभवद्भिरिवेत्युक्तम्-उपहस- के घोड़ों की मानों ईर्ष्या से वे स्वयं अपनी चामरमाला को पंख बनाकर आकाश में उड़ जाना चाहते थे । अन्यत्र ऊँटों ने राजद्वार को कपिल वर्ण में परिणत कर दिया था। कुछ ऊँट भेजे गये थे, कुछ भेजे जा रहे थे, कुछ भेजे गये थे, फिर वापिस आ गये थे । उनके मुँह के चारों ओर कौड़ियाँ गूँथ कर पहना दी गई थीं जो मानों बहुत योजन पार करने पर उनकी संख्या गिनने के लिए अक्षरों की माला थी और वे कौड़ियों पर इस तरह लगतीं मानों सायंकाल के आतप के टुकड़े हों । ऊँटों के कानों में लाल चंवरियों के फूल लगे थे मानों लाल वर्ण वाले धान के खेतों में लाल कमल उत्पन्न हों । सोने के बने घुँघुरुरों की माला हमेशा उनके गले में झनझन आवाज करती थी, ऐसा लगता था जैसे सूखे हुए करंज-वनों में उनकी गुठलियों के बीज बज रहे हों । उनके कानों के पास पंचरंगी ऊन के फुन्दने लटक रहे रहे थे । वे वानर के कपोल की भाँति कपिल वर्ण के थे । अन्यत्र उजले-उजले अनेक छत्र उस प्रदेश को श्वेत द्वीप बना रहे थे । वे छत्र पानी बरस जाने के बाद बिल्कुल सफेद वर्ण वाले शरत् काल के मेघ के समान थे । कल्पवृक्षों की भाँति उनमें मोतियों की झालरें लगी थीं, जिनसे उत्पन्न आलोक के द्वारा छाया मिट गई थी। उनमें गारुड रत्न पिरोये गये थे जैसे विष्णु के नाभि कमलों में गरुड़ के पंख लगे रहते हैं । उनके दण्ड विद्रुम के बने थे, मालूम होता था वह क्षीर समुद्र का एक भाग हो गया हो । जैसे शेषनाग के फनों पर माणिक्य के टुकड़े चमकते रहते हैं उसी प्रकार इनमें