हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः ९९ कुतूहलोपनीतैश्च नागवीथीपालप्रेषितैश्च पल्लीपरिवृढढौकितैश्च स्वेच्छायुद्ध- क्रीडाकौतुकाकारितैश्च दूतसंप्रेषणप्रेषितैश्च दीयमानैश्चाच्छिद्यमानैश्च मुच्य- मानैश्च यामावस्थापितैश्च सर्वद्वीपविजिगीषया गिरिभिरिव सागरसेतुबन्ध- नार्थमेकीकृतैर्ध्वजपटपटुपटहशङ्खचामराङ्गरागरमणीयैः पुष्याभिषेकदिव- तैरिव कल्पितैर्वारणेन्द्रैः श्यामायमानम्, अनवरतचलितखुरपुटप्रहतमृद- ङ्गैश्च नर्तयद्भिरिव राजलक्ष्मीमुपहसद्भिरिव सृक्विपुटप्रसृतफेनाट्टहासेन जवजडजङ्घां हरिणजातिमाकारयद्भिरिव संघट्टहेतोर्हर्षहेषितेनोच्चैरुच्चैः- श्रवसमुत्पतद्भिरिव दिवसकररथतुरगरुषा यक्षायमाणमण्डनचामरमालैर्ग- गनतलं तुरङ्गैरस्तरङ्गायमाणम्, अन्यत्र प्रेषितैश्च प्रेष्यमाणैश्च प्रेषितप्रति- निवृत्तैश्च बहुयोजनगमनगणनसंख्याक्षरावलीभिरिव वराटिकावलीभिर्घ- टितमुखमण्डनकैरस्तारकितैरिव संध्यातपच्छेदैररुणचामरकारचितकर्ण- षणम् । डिण्डिमः पटहः । विक्षेपः करः । नागवीथी हस्तिभूः । पल्ली शबरवसतिः । परिवृढः स्वामी । आकारितैराह्वानैः । 'आच्छिद्यमानैरपह्रियमाणैः । यत्र दिने पुष्यनक्षत्रे राजा स्नाति तद्दिनं पुष्याभिषेकाख्यम् । श्यामायमानं कालत्वमाप- द्यमानम् । अथ च दिवसः श्यामायति । रात्रिवदाचरतीति वक्रोक्तिः । अभिषेक- दिनानि च ध्वजादिरम्याणि । अनवरतेत्यादौ । तुरङ्गैरस्तरङ्गायमाणमिति संबन्धः । मृदोऽङ्गं मृदङ्गश्च मुरजः । सृक्विण्योष्ठपर्यन्तौ । अन्यत्रेत्यादो—क्रुमेलककुलैः कपि- पट्टबन्ध के लिए लाये गये, कुछ धौसे चढ़ाने के लिए लाये गये, कुछ नये पकड़े हुए, कुछ कर रूप में प्राप्त, कुछ उपहार में मिले, कुछ (सम्राट् के) प्रथम दर्शन क कुतूहल में लाये गये, कुछ नागवीथी या नागवन के अधिपतियों द्वारा भेजे गये, कुछ शबर बस्तियों के सरदारों द्वारा भेजे हुए, कुछ गजयुद्ध की क्रीड़ाओं और खेल-तमाशों के लिए बुलवाये गये या स्वेच्छा से दिये गये, कुछ दूत भेजने से भेजे गये, कुछ दिये गये, कुछ बलपूर्वक छीने गये, कुछ बंधन से मुक्त हुए और कुछ पहरे के लिए रखे गये थे, मानों समस्त द्वीपों पर विजय पाने की इच्छा से समुद्रों में पुल बांधने के लिए पहाड़ के पहाड़ लुट गये हों, ध्वजपट, पटह, शंख, चामर, अंग- राग आदि से सजे हाथी दीख पड़े, मानों पुष्य अभिषेक के दिन हों। वहाँ घोड़े लहरों के समान मचल रहे थे। उनके चंचल खुरों की टाप हमेशा मृदंग की आवाज में जमीन पर पड़ रही थी, मानों राजलक्ष्मी को नचा रहे थे। थूथन तक बहते हुए मुँह के गाज के अट्टहास से वे मानों वेग में विजड़ित जाँघ वाले हरिणों का उपहास कर रहे थे । प्रसन्नता से इस तरह हिनहिना रहे थे मानों होड़ के लिए इन्द्र के घोड़े उच्चैःश्रवा को पुकार रहे हों। सूर्य के रथ