भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 140

९८ हर्षचरितम् गोलाङ्गूललिह्यमानमधुगोलचलितसरघासंघातैः, रोमाञ्चितमिव दग्ध- स्थलीरूढस्थूलाभीरुकन्दलशतैः, शनैश्चण्डिकायतनकाननमतिक्रम्य मल्ल- कूटनामानं ग्राममगात् । तत्र च हृदयनिर्विशेषेण भ्रात्रा सुहृदा च जग- त्पतिनाम्ना संपादितसपर्यः सुखमवसत् । अथापरेद्युरुत्तीर्य भगवतीं भागीरथीं यष्टिगृहकनाम्नि वनग्रामके निशामनयत् । अन्यस्मिन्दिवसे स्कन्धावारमुपमणिपुरमन्वजिरवति कृतसन्निवेशं समाससाद । अतिष्ठच्च नातिदूरे राजभवनस्य । निर्वर्तितस्नानाशनव्यतिकरो विश्रान्तश्च मेखलकेन सह याममात्रा- वशेषे दिवसे भुक्तवति भूपुजि प्रख्यातानां क्षितिभुजां बहून्शिविरसंनि- वेशान्वीक्षमाणः शनैः शनैः पट्टबन्धार्थमुपस्थापितैश्च डिण्डिमधिरोहणा- याहूतैश्चाभिनवबद्धैश्च विक्षेपोपार्जितैश्च कौशलिकायतैश्च प्रथमदर्शन-


वितमिवेत्युत्प्रेक्षा । जिह्वैव लता, दीर्घत्वात् । गोलाङ्गूलः कृष्णमुखो वानरः । मधुगोलं माक्षिककरण्डः । सरघा मधुमक्षिकाः । अभीरुः शतावरी । कन्दलानि नवनालानि । भ्रात्रेति चन्द्रसेनेन । हृदयेत्याद्यभिप्रायेण सुखमित्युक्तम् । उपमणिपुरं पत्तनभेदम् । अन्वजिरवति नदीभेदकटे । संनिवेशो गृहादिरचना । निर्वर्तितेत्यादौ राजद्वारमीदृशमगमदिति संबन्धः । निर्वर्तितेत्यादि । राज- दर्शनेऽकातरत्वमात्मनः प्रतिपादयति । वारेन्द्रैः श्यामायमानमिति राजद्वारविशेषे-


तकलीफदेह था, वन के प्रवेश-वृक्षों पर कात्यायनी की मूर्तियाँ खुदी हुई थीं जिन्हें पथिक नमस्कार करते थे । वह वन सूख गया था, फिर भी श्वापद जन्तुओं की लपलपाती जीभों की हजारों लताएँ उसे मानों पल्लवित कर रही थीं । भालू और लंगूर मधुमक्खियों के छत्ते को चाटने लगते तो वे भन्नाकर उड़ने लगतीं मानों वन इस दृश्य से पुलकित था । दावान्नि से जली हुई वनभूमि में सतावर के मोटे पौधे इस तरह निकल आये थे मानों वह जंगल रोमा- ञ्चित हो उठा हो । मल्लकूट ग्राम में बाण के अभिन्नहृदय भाई और मित्र जगत्पति ने उसकी आवभगत की और वह सुखपूर्वक ठहरा । दूसरे दिन बाण ने गङ्गा पार कर यष्टिगृहक नाम के वन गाँव में रात बिताई । अन्य दिन राप्ती ( अजिरवती ) के किनारे मणिपूर नामक ग्राम के समीप पड़ी हुई छावनी मे पहुँचा और राजभवन के पास ही ठहरा । बाण ने स्नान-भोजन आदि सम्पन्न करके विश्राम किया और जब एक पहर दिन रहा और महाराज भी भोजन कर चुके तब मेखलक के साथ वह राजाओं के अनेक शिविरों को देखता हुआ धीरे-धीरे राजद्वार के पास आया । राजद्वार बड़े-बड़े हाथियों से श्यामायमान था, कुछ