भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

द्वितीय उच्छ्वासः ९७ दिव भगवत्या महाश्वेतया मालत्याख्यया कृतसकलगमनमङ्गलः, दत्ता- शीर्वादो बान्धववृद्धाभिः, अभिनन्दितः परिजनजरतीभिः वन्दितचर- णैरभ्यनुज्ञातो गुरुभिः, अभिवादितैराघ्रातः शिरसि कुलवृद्धैः, वर्धित- गमनोत्साहः शकुनैः, मौहूर्तिकमतेन कृतनक्षत्रदोहदः, शोभने मुहूर्ते, हरितगोमयोपलिप्ताजिरस्थण्डिलस्थापितमसितेतरकुसुममालापरिक्षिप्तकण्ठं दत्तपिष्टपञ्चाङ्गुलपाण्डुरं मुखनिहितनवचूतपल्लवं पूर्णकलशमीक्षमाणः, प्रणम्य कुलदेवताभ्यः कुसुमफलपाणिभिरप्रतिरथं जपद्भिर्निजद्विजैरनु- गम्यमानः, प्रथमचलितदक्षिणचरणः, प्रीतिकूटान्निर्यगात् । प्रथमेऽहनि तु घर्मकालकष्टं निरुदकं निष्पत्रपादपविषमं पथिकजन- नमस्क्रियमाणप्रवेशपादपोत्कीर्णकात्यायनीप्रतियातनं शुष्कमपि पल्लवित- मित्र तृषितश्वापदकुललम्बितलोलजिह्वालतासहस्रैः पुलकितमिवाच्छभल्ल- त्यन्ये । दत्तेत्यादिभागो बान्धववृद्धामिप्रायेण समुच्चित एव । अभिनन्दित इति । प्रतिपदं द्वयमूल्यम् । जरत्यो वृद्धाः । आघ्रातः शिरसि चुम्बितः । मोहूर्तिका गणकाः । नक्षत्रदोहदं प्रतिनक्षत्रप्राशनम्, नक्षत्रविषयोऽभिलाषो वा । अजिर- मङ्गनम् । स्थण्डिलं भूः । परिक्षिप्तो वेष्टितः । पिष्टपञ्चाङ्गुलमाज्कोक्तामिः । पञ्च- भिरङ्गुलीभिर्मङ्गल्याय दोयते । अप्रतिरथं प्रास्थानिकं मन्त्रम् । निजेत्यादिना स्वस्य दातृत्वमुक्तम् । उत्कीर्णा निखाता । कात्यायनी दुर्गा । प्रतियातना प्रतिमा । काननत्वात्पल्ल- की छोटी बहन की भांति माता के समान स्नेह से भीने हृदयवाली, साक्षात भगवती महाश्वेता मालती ने प्रस्थान-समय के समस्त मङ्गलाचरण किये। सभी वृद्धाओं ने आशीर्वाद दिया और परिवार की वृद्धाओं ने अभिनन्दन किया। पूजितचरण गुरुओं ने जाने की अनुमति दी और अभिवादित कुलवृद्धों ने मस्तक सूँघा। शकुनों से जाने का उत्साह बढ़ा। फिर ज्योतिषी के अनुसार नक्षत्र-देवताओं को प्रसन्न किया। इस प्रकार शुभ मुहूर्त में हरित गोबर से लिपे हुए आँगन के चौतरे पर स्थापित पूर्ण कलश—जिसके कण्ठ में श्वेत फूलों की माला लपेट दी गई थी, जो पिसान के पंचांगुल थापों से उजला था एवं जिसके मुख में नये आम के पल्लव डाल दिये गये थे—को देखता हुआ, कुलदेवताओं को प्रणाम करके, हाथ में फल-फूल लिये हुए और अप्रतिरथ सूक्त के मन्त्रों का पाठ करते हुए अपने पुरोहित ब्राह्मणों द्वारा अनुगत होकर बाण दाहिना पैर पहले चलाकर प्रीतिकूट से निकल गया। पहले दिन चण्डिका वन पार किया और मल्लकूट नामक गाँव में पड़ाव किया। चण्डिका- वन में घाम का कष्ट होने लगा, वहां पानी का अभाव था, पत्रहीन वृक्षों के कारण वह वन ७ ह०