भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

अवश्यं गन्तव्यञ्च। सर्वथा भगवान्भवानीपतिर्भुवनपतिर्गतस्य मे शर- णम्, सर्वं साम्प्रतमाचरिष्यति, इत्यवधार्य गमनाय मतिमकरोत्। अथान्यस्मिन्नहन्युत्थाय, प्रातरेव स्नात्वा, धृतधवलदुकूलवासाः, गृहीताक्षमालः, प्रास्थानिकानि सूक्तानि मन्त्रपदानि च बहुशः समावर्त्य देवदेवस्य विरूपाक्षस्य क्षीरस्नपनपुरःसरां सुरभिकुसुमधूपगन्धध्वजबलि- विलेपनप्रदीपकबहुलां विधाय परमया भक्त्या पूजाम्, प्रथमहुततरलति- लत्वग्विघटनचटुलमुखरशिखाशेखरं प्राज्याज्याहुतिप्रवर्धितदक्षिणार्त्तिषं भगवन्तमाशुशुक्षणिं हुत्वा, दत्त्वा द्युम्नं यथाविद्यमानं द्विजेभ्यः, प्रदक्षि- णीकृत्य प्राङ्मुखीं नैचिकीम्, शुक्लाङ्गरागः, शुक्लमाल्यः, शुक्लवासाः, रोचनाचित्रदूर्वाग्रपल्लवग्रथितगिरिकर्णिकाकुसुमकृतकर्णपूरः, शिकासक्तसि- द्धार्थकः, पितुः कनीयस्या स्वस्रा मात्रेव स्नेहार्द्रहृदयया श्वेतवाससा साक्षा- श्यामा रात्रिः, योषित्त्व च। मुखमारम्भः, वदनं च। निर्निमित्तेत्याद्यभिप्रायेण वक्ष्यति। अवश्यं गन्तव्यं चेत्यादि। 'काकुः स्त्रियां विकारो यः शोकभीत्यादिभिर्ध्वनेः'। इह च लक्षणया वक्रोक्तिः। सांप्रतं युक्तम्। अथेत्यादौ। अन्यस्मिन्नहनि प्रीतिकूटाद्निरगादिति संबन्धः। प्रस्थानं प्रयोजनं येषां तानि प्रास्थानिकानि सूक्तानि, वेदोक्ता मन्त्रविशेषाः। विरूपाक्षस्त्र्यक्षः। प्राज्यं भूरि। आज्यं घृतम्। द्युम्नं धनम्। यथाविद्यमानमित्यनेन निर्लोभतोक्ता। नैचिकीं वराङ्गीम्, होमधेनुं वा, शुक्लां वा। गिरिकर्णिकाश्वखुरी माङ्गल्यौषधिः। सिद्धार्थकाः सर्षपाः। स्वस्रा भगिन्या। महाश्वेता देवताविशेषः। रविस्त्यदेवते- भगवान् शंकर तेरी शरण हैं, वहीं जाने पर सब भला करेंगे। यही सोचकर चलने का इरादा पक्का कर दिया। दूसरे दिन बाण उठा, प्रातःकाल ही स्नान कर लिया। श्वेत दुकूल पहनकर हाथ में अक्षमाला ली। प्रास्थानिक सूक्तों और मन्त्रों को बार-बार दुहराया और देवों के देव भग- वान् शंकर को दूध से स्नान कराके सुगन्धित फूल, धूप की गन्ध, ध्वज, भोग, विलेपन, प्रदीप आदि सामग्री के साथ बड़ी श्रद्धा-भक्ति से अर्चना की। अग्नि में आहुति दी। पहली बार तिल की आहुति पड़ते ही अग्नि की शिखाएँ चटकने लगीं और अधिक घी की आहुति पड़ते ही दाहिनी ओर बढ़ गई। अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को दक्षिणा दी। पूर्व की ओर खड़ी हुई उत्तम गौ की प्रदक्षिणा की। श्वेत चन्दन, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किया। गोरोचना लगाकर दूबनाल में गुथे हुए श्वेत अपराजिता के फूलों का कर्णफूल कान में लगाया, चोटी में पीली सरसों रखी। पिता