भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः १२३ वातिलोहितौ सकलनृपतिमौलिमालास्वतिपीतं पद्मरागरत्नातपमिव वमन्तौ सर्वतेजस्विमण्डलास्तमयसंध्यामिव धारयन्तावशेषराजककुसुम- शेखरमधुरसस्रोतांसीव स्रवन्तौ समस्तसामन्तसीमन्तोत्तंसस्रक्सौरभ- भ्रान्तभ्रमरमण्डलैरमित्रोत्तमाङ्गैरिव मुहूर्तमप्यविरहितौ संवाहनतत्परायाः श्रियो विकचरक्तपङ्कजवनवासभवनानीव कल्पयन्तौ जलजशङ्खमीन- मकरसनाथतलतया कथितचतुरम्भोधिभोगचिह्नाविव चरणौ दधा- नम्, दिङ्नागदन्तमुसलाभ्यामिव विकटमकरमुखप्रतिबन्धबन्धुराभ्यामु- द्धेललावण्यपयोधिप्रवाहाभ्यामिव फेनाहितशोभाभ्यां कलाचन्दनद्रुमा- भ्यामिव भोगिमण्डलशिरोरत्नरश्मिरञ्जयमानमूलाभ्यां हृदयारोपितभूभार- धारणमाणिक्यस्तम्भाभ्यामूरुदण्डाभ्यां विराजमानम्, अमृतफेनपिण्ड- पाण्डुना मेखलामणिमयूखखचितेन नितम्बबिम्बव्यासङ्गिना विमल- पयोधौतेन नेत्रसूत्रनिवेशशोभिनाधरवाससा वासुकिनिर्मोकेणेव मन्दरं द्योतमानम्, अघनेन सतारागणेनोपरिकृतेन द्वितीयाम्बरेण भुव- नागभेदः । पुण्डरीकाक्षमिवि राज्ञी विशेषणम् । तेजस्विनो वीराः, आदित्याश्च । जलजेत्यादीनि महाराजविशेषणानि लक्षणानि । एवमादि च संभवति । मकर- मुखं जानुसंधिः, मकरमुखचिह्नित्तान्तकपोलश्च । उद्वेलतया लावण्यस्य समुच्छ- लद्रूपत्वमाह । फेनो रससंतानः, डिण्डीरश्च । भोगिनो नृपाः, सर्पाश्च । फेनवत्तैश्च पाण्डु । मेखला रशना, पर्वतमध्यभूमिश्च । पयो जलम्, क्षीरं च । नेत्रसूत्रं पट्टसूत्रम्, मन्थनरज्जुश्च । अघनेन, छातेन, अनभ्रेण च । ताराः सूत्रबिन्दवः नक्ष- समस्त तेजस्वियों (वीरों अथवा आदित्यों) के अस्त हो जाने के कारण मानो संध्या को धारण कर रहे थे, समस्त राजाओं के सिर की पुष्परचित माला के मधुरस के प्रवाह को मानो बहा रहे थे, समस्त सामन्तों के केशविन्यास की माला की सुगन्ध में लुभाए हुए भौंरे शत्रुओं के सिर के रूप में मानो क्षणभर भी इन चरणों को नहीं छोड़ते; सेवा में लीन लक्ष्मी के निवास के लिए खिले हुए लाल कमलों के भवनों को मानो बना रहे थे, तलवे में कमल, शंख, मछली और मकर के चिह्न थे जिनसे व्यक्त होता था कि उन्होंने चारों समुद्रों के उपभोग के चिह्नों को प्राप्त किया था। उनकी जांघें दिग्गज के दंतरूपी मुसलों के समान थीं, उद्वेल लावण्य के समुद्र के दो प्रवाहों की भाँति विशाल मकरमुखों (जानुसन्धियों, पक्ष में मकर के मुखों) के प्रति- बन्ध के कारण निम्नोन्नत, फेर से शोभित थीं एवं चन्दन के वृक्षों की भांति भोग-मण्डल (धनिकसमूह वृक्ष में सर्पसमूह) के सिर के रत्नों की किरणों से जिनका मूल भाग रंजित हो रहा था तथा सम्राट् के हृदय पर आरोपित पृथ्वी के भार के धारण के लिए माणिक्य-स्तम्भ थीं।