भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

१२४ हर्षचरितम् नाभोगमिव भासमानम्, इभपतिदशनमुसलसहस्रोल्लेखकठिनमसृणे- नापर्याप्ताम्बरप्रथिम्ना विविधवाहिनीसंक्षोभकलकलसंमर्दसहिष्णुना कैलास- मिव महता स्फटिकतटेनोरुणोरःकपाटेन विराजमानम्, श्रीसरस्वत्यो- रुरोवदनोपभोगविभागसूत्रेणेव पतितेन शेषेणेव च तद्भुजस्तम्भविन्यस्त- समस्तभूभारलब्धविश्रान्तिसुखप्रसुप्तेन हारदण्डेन परिवलितकन्धरम्। जीवितावधिगृहीतसर्वस्वमहादानदीक्षाचीरेणेव हारमुक्ताफलानां किरण- निकरेण प्रावृतवक्षःस्थलम्, अजजिगीषया बालैर्भुजैरिवापरैः प्ररोहद्भि- बर्हूपधानशायिन्याः श्रियाः कर्णोत्पलमधुरसधारासंतानैरिव गलद्भिर्भुज- जन्मनः प्रतापस्य निर्गमनमार्गैरिवाविर्भवद्भिररुणैः केयूररत्नकिरणदण्डै- रुभयतःप्रसारितमणिमयपक्षवितानमिव माणिक्यमहीधरम्, सकल- त्राणि च। अम्बरं वासः, नभश्च। इभपतीत्यादिना साधारणम्। अपर्याप्तमम्बरं वासो यस्य तादृक्प्रथिमा यस्य, अम्बरं च खम्। वाहिनी सेना, नदी च। अन्यपर्वतसाधारयेऽपि छायावत्त्वादुन्नतत्वाच्च कैलासमिवेत्युक्तम्। हारेत्यादिना उरुत्वं काठिन्यमाह। परिवलिता। ‘परिवेष्टिता—’ इति पाठे व्याप्तेत्यर्थः। अजो हरिः। भुजेत्यादिना सेनादिकृतं नयादिकृतं च प्रतापं व्यवच्छिनत्ति। माणिक्य- वासुकि सर्प केंचुल से मन्दर पर्वत की भांति वह अपने अधोवस्त्र से जो अमृत के फेनपिण्ड की भांति उज्ज्वल, मेखला की मणियों की किरणों से खचित, नितम्ब भाग से लगा हुआ, विमल जल से धुला हुआ, रेशम के पुटकों से शोभित (मकर के पक्ष में, अमृत के फेन पड़ने से उज्ज्वल मेखला भाग की मणिकिरणों से खचित, निर्मल क्षीण से धुला हुआ एवं मन्थनरज्जु के निवेश से शोभित) था शोभा प्राप्त कर रहे थे। ऊपर धारण किये गये, झीने (अघन) सूत्रबिन्दुओं से कड़े उत्तरीय वस्त्र से (पक्ष में घन अर्थात् मेघ से रहित, तारागण से युक्त) आकाश से भुवन के आभोग की भांति वे शोभित हो रहे थे। जैसे कैलास पर्वत का स्फटिक तट ऐरावत के दांतों के हजारों प्रहार से कठिन और चिकना हो गया है और आकाश के लिए जिसका विस्तार पर्याप्त नहीं एवं विविध नदियों के कोलाहलपूर्ण संमर्द को जो सहता है उसी प्रकार सम्राट् का विशाल उरःकपाट भी गजों के दशनों के घात-प्रतिघात से कठिन और कोमल वस्त्र, के लिए अपर्याप्त प्रथिमा युक्त एवं विविध सेनाओं के कोलाहल में भी क्षुब्ध न होने वाला था। उनका हारदंड कंधे से गिर कर लटक रहा था, मानों वह लक्ष्मी और सरस्वती के क्रम से वक्ष और मुख के उपभोग का विभाग-सूत्र रखा गया था, अथवा मानो शेषनाग सम्राट् की भुजाओं पर सारे पृथिवी के भार को रख कर विश्राम की नींद ले रहे हों। हार में पिरोई हुई मुक्ताओं की किरणें फैलकर उनके वक्ष में लिपट रही थीं मानो सम्राट् ने जो प्रति पांचवें वर्ष सर्वस्वदक्षिण महादान दिये हैं उन्हीं के दीक्षावस्त्र हों। उनके विजायठ के