भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 167

[द्वितीय उच्छ्वासः] १२५

लोकालोकमार्गार्गलेन चतुरुदधिपरिक्षेपखातशातकुम्भशिलाप्राकारेण सर्वराजहंसबन्धवज्रपञ्जरेण भुवनलक्ष्मीप्रवेशमङ्गलमहामणितोरणेनाति- दीर्घदोर्दण्डयुगलेन दिशां दिक्पालानां च युगपदायतिमपहरन्तम्, सोदर्यलक्ष्मीचुम्बनलोभेन कौस्तुभमणेरिव मुखावयवतां गतस्याधरस्य गलत्ता रागेण पारिजातपल्लवरसेनेव सिञ्चन्तं दिङ्मुखानि, अन्तरान्तरा सुहृत्परिहासस्मितैः प्रकीर्यमाणविमलदशनशिखाप्रतानैः प्रकृतिमूढाया राजश्रियः प्रज्ञालोकमिव दर्शयन्तम्, मुखजनितेन्दुसन्देहागतानि कुमुदिनीवनानीव प्रेषयन्तम्, स्फुटस्फटिकधवलदशनपङ्किकृतकुमुद- वनशङ्काप्रविष्टां शरज्ज्योत्स्नामिव विसर्जयन्तम्, मदिरामृतपारिजात- गन्धगर्भेण भरितसकलककुभा मुखामोदेनामृतमथनदिवसमिव सृज-


मुत्कृष्टो मणिः। चतुर्णामुदधीनां संबन्धी परिक्षेप एव खातं परिखा यस्य स ताह- ग्दाढार्चाच्छिलाप्राकार इव तेन। परिखां कृत्वान्तरे प्राकारो दीयते इति स्थितिः।


रत्नों की दण्डाकार अरुण किरणें उनके दोनों ओर फैल रही थीं मानो चतुर्भुज विष्णु को जीतने की इच्छा रखने वाले सम्राट् के दो और हाथ उद्भिन्न हो रहे हों, अथवा विष्णुमुल्य सम्राट् की भुजाओं को उपधान बनाकर सोने वाली लक्ष्मी के कर्णोत्पल का मधुरस धारारूप में प्रवाहित होकर चू रहा हो, अथवा मानो उनकी भुजाओं से उत्पन्न होने वाले प्रताप के निकलने के लिए मार्ग आविर्भूत हो रहे हों, इस प्रकार वे उन किरणदंडों से मणिमय पक्षवितान को फैलाये हुए माणिक्यपर्वत के समान थे। वे अपने दोनों अतिदीर्घ भुजदण्डों से दिशाओं के विस्तार और दिक्पालों के प्रताप को एक काल में हर ले रहे थे, मानो उनके वे भुजदण्ड समस्त लोकालोक पर्वत के मार्ग के अर्गलादंड हों, मानो चारो समुद्र के घेरे की खाई में सुवर्ण चट्टानों को जोड़कर बनाये गये प्राकार हों; समस्त राजसमूहरूपी हंसों के रहने के लिए वज्रमय पिंजड़े हों; भुवनलक्ष्मी के प्रवेश के अवसर पर मंगलार्थ लगाये जाने वाले बड़े- बड़े मणिमय तोरण हों। मानो उनका कौस्तुभमणि के समान अधर अपनी बहन लक्ष्मी को चूमने के लिए मुख का अवयव बन गया हो; ऐसे अधर से पारिजात-पल्लव के रस के समान द्रवित होते हुए राग से मानो वे दिशाओं को सींच रहे थे। बीच-बीच में मित्रों के साथ हँसी मजाक के प्रसङ्ग में सम्राट् हँस पड़ते थे तो उनके दांतों की निर्मल किरणें चारों ओर फैल जाती मानो प्रकृतिमूग्धा राजलक्ष्मी को प्रज्ञा का आलोक दिखा रहे हों अथवा उन किरणों के रूप में मुख को चन्द्र समझ कर पहुँचे हुए कुमुदवनों को मानो वे लौटा रहे थे, स्फटिक के समान जड़े हुए दांतों को कुमुदवन समझ कर प्रविष्ट हुई शारदी ज्योत्स्ना को मानो वापस कर रहे थे। उनके मुख से मदिरा, अमृत और पारिजात के मुखवास की मिली हुई सुगन्ध