भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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१२६ Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri हर्षचरितम्

न्तम्, विकचमुखकमलकर्णिकाकोशेनानवरतमापीयमानश्वाससौरभमि- वाधोमुखेन नासावंशेन, चक्षुषः क्षीरस्निग्धस्य धवलिम्ना दिङ्मुखान्यपूर्वं- वदनचन्द्रोदयोद्वेलक्षीरोदोत्प्लावितानीव कुर्वाणम्, विमलकपोलफलकप्रति- बिम्बतां चामरग्राहिणीं विग्रहिणीमिव मुखनिवासिनीं सरस्वतीं दधानम्, अरुणेन चूडामणिशोचिषा सरस्वतीर्ष्याकुपितलक्ष्मीप्रसादनलग्नेन चरणालक्तकेनेव लोहितायत ललाटतटम्, आपाटलांशुतन्त्रीसंतानवल- यिनीं कुण्डलमणिकुटिलकोटिबालवीणामनवरतचलितचरणां वादय- तामुपवीणयतामिव स्वरव्याकरणविवेकविशारदम्, श्रवणावतंसमधुकर- कुलानां कलक्व णितमाकर्णयन्तम्, उत्फुल्लमालतीमयेन राजलक्ष्म्याः कचग्रहलीलालग्नेन नखज्योत्स्नावलयेनेव मुखशशिपरिवेषमण्डलेन मुण्ड-


राजहंसा राजोत्तमाः, हंसेभेदाश्च । आयतिदैर्घ्यम्, प्रतापरथ । कर्णिका कोशः, चक्रं च । आपीयमानं श्वाससौरभं यस्य तम् । अधोमुखेनेति । अनेन सुलक्ष्यत्वं सौरभस्य तथाऽऽपीयमानानुकृति दर्शयति । अंशुरेव तन्त्रीसंतानः स एव वलया- कारत्वाद्वलयं विद्यते यस्यास्ताम् । कुण्डलमणिकुटिलकोटिमेव बालवीणां सप्त- तन्त्रीकां विपञ्चीं वादयताम् । अनवरतेत्यादिना व्यापारसादृश्येनोक्तम् । वद- ( वादय ) तामिति । वीणायोपगायतामुपवीणयतामिति गानस्य प्राधान्यं प्रतिपा-


समस्त दिशाओं में भर गई थी मानो अमृतमथन के दिन को बना रहे थे । सम्राट् का खिले हुए मुख कमल के बीजकोश के सदृश अधोमुख नासावंश था जिससे मानो वे निरन्तर सुगंध से भरी सांस ले रहे थे । क्षीर के समान स्निग्ध अपनी आंखों की सफेदी द्वारा अपूर्वमुखरूपी चन्द्र के उदित होने से उद्वेल क्षीरसमुद्र द्वारा मानो दिशाओं को उत्प्लावित कर रहे थे । उनके निर्मल कपोलफलक पर समीप में खड़ी चामरग्राहिणी (चंवर डुलाने वाली स्त्री) प्रति- बिम्बित हो रही थी मानो शरीरिणी होकर मुख में निवास करने वाली सरस्वती को वे धारण कर रहे थे । उनके चौड़े ललाट पर चूडामणि की अरुण किरणें छिटक रही थीं, मानो सरस्वती की ईर्ष्या से कुपित हुई लक्ष्मी के प्रसादन के लिए पैर पड़ते हुए इनके ललाट पर उसका आलता लग गया हो । उनके कर्णावतंस पर बैठकर भौंरे कुण्डलमणि की बाल वीणा के लाल- वर्ण वाले किरणरूपी तारों पर स्वर का विस्तार और विवेक करते हुए अव्यक्त-मधुर जो गा रहे थे उसे वे ध्यान से सुन रहे थे । उनके बालों में मुंडमाला बंधी थी जिसमें खिले हुए मालती के फूल थे, मानो कचग्रह के अवसर पर राजलक्ष्मी के नखों की कुछ किरणें वहाँ फँस कर रह गई हों, वह उनके मुख-चन्द्र के चारों ओर परिधि थी । उनके शिखंडा-