भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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१२२ Digitized by Arya Samaj Fहर्षचरितम्Chennai and eGangotri अगोचरे गुणानामभूमौ सौभाग्यानामविषये वरप्रदानानामशक्य आशि- षाममार्गे मनोरथानामतिदूरे देवस्यादिश्युपमानानामसाध्ये धर्मस्या- दृष्टपूर्वे लक्ष्म्या महत्त्वे स्थितम्, अरुणपादपल्लवेन सुगतमन्थरोरुणा वज्रायुधनिष्ठुरप्रकोष्ठपृष्ठेन वृषस्कन्धेन भास्वद्विम्बाधरेण प्रसन्नावलो- कितेन चन्द्रमुखेन कृष्णकेशेन वपुषा सर्वदेवतावतारमिवैकत्र दर्शयन्तम्, अपि च मांसलमयूखमालामलिनितमहीतले महति महार्हे माणिक्य- मालामण्डितमेखले महानीलमये पादपीठे कलिकालशिरसीव सलीलं विन्यस्तवामचरणम्, आक्रान्तकालियफणाचक्रवालं बालमिव पुण्ड- रीकाक्षम्, क्षौमपाण्डुरेण चरणनखदीधितिप्रतानेन प्रसरता महीं महादेवीपट्टबन्धेनेव महिमानमारोपयन्तम्, अप्रणतलोकपालकोपेने- तीति विरोधः । अरुणो लोहितः, अनूरुश्च । शोभनं गमनं ययोस्तौ मन्थरावूरू यस्य । बुद्धश्च सुगतः । वज्राख्यमायुधं तद्वन्निष्ठुरं कठोरं प्रकोष्ठस्य पृष्ठं यस्य तेन । इन्द्र- श्वाम्य वज्रमायुधम् । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । वृषो दान्तः, धर्मश्च । भास्वद्भास्वरम्; रविश्च भास्वान् । बिम्बं फलभेदः, मण्डलं च । अवलोकितं वीक्षि- तम्, बुद्धिभेदश्चावलोकितः । कृष्णः कालः, हरिश्च कृष्णः । कलिकालइति । कलि- कालस्य मलिनत्वादेवमुत्प्रेक्षा । वामपादेन पराभवनीयत्वमेव पोष्यते । कालियो लक्ष्मी का उत्कर्ष था जो गुणों का अगोचर, सौभाग्य का अभूमि, वरदान का अविषय, आशी- र्वचनों का अशक्य, मनोरथों का अमार्ग, भाग्य से भी अतिदूर, उपमानों का अविषय एवं धर्म का असाध्य था। अपने शरीर से समस्त देवताओं के अवतार को प्रकट कर रहे थे, उनके पादपल्लव अरुण (लाल, सूर्य का सारथी अरुण), सुगत (बुद्ध) अर्थात् सुन्दर गमन करने वाले और मन्दगामी दोनों ऊरु, हाथ के गट्टे वज्र के समान (वज्रायुध = इन्द्र) कड़े, वृष (बैल, धर्म) के समान कंधे, चमकते हुए (भास्वत् = सूर्य) बिम्बाधर, दृष्टिपात (अवलो- कितेश्वर) प्रसन्न, चन्द्र के सदृश मुख एवं केश काले (कृष्ण) थे। इन्होंने अपना बायाँ पैर महानील मणि के विशाल, बहुमूल्य, स्थूल प्रभाजाल से पृथ्वी को कलित करने वाले एवं माणिक्यसमूह से मण्डित मध्यभाग वाले पादपीठ पर मानों कलिकाल के सिर पर रखा था। अथवा वे बालक श्रीकृष्ण के सदृश थे जिन्होंने कालिया नाग के फनों पर आक्र- मण किया था। क्षौम वस्त्र के समान उनके चरणों के नखों की रश्मियाँ फैलती थीं मानो पृथिवी को पट्टबंध द्वारा राजमहिषी के पद पर प्रतिष्ठित कर रहे थे। सम्राट् के दोनों चरण प्रणत न होने वाले लोकपालों पर क्रोध के कारण मानो अत्यन्त लाल थे। समस्त नरपतियों के मुकुटों में अधिक पान किये हुए पद्मराग मणि की प्रभा को मानो वमन कर रहे थे, CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.